मुख्यपृष्ठस्तंभपूर्वांचल पॉलिटिक्स : तारीफ के बहाने सियासी निशाने

पूर्वांचल पॉलिटिक्स : तारीफ के बहाने सियासी निशाने

हिमांशु राज

आजकल बृजभूषण शरण सिंह द्वारा अखिलेश यादव की तारीफ के पीछे व्यक्तिगत और रणनीतिक कारण समझ में आते हैं। सबसे पहले उन्होंने अखिलेश की धार्मिक पहचान को सामने रखा, यह दावा करते हुए कि वे `श्रीकृष्ण के खानदान से जुड़े हैं’ और हाल ही में एक भव्य मंदिर बनवाया है। इसके जरिए उन्होंने अखिलेश पर लगने वाले `धर्म-विरोधी’ आरोपों को कमजोर करने की कोशिश की। बृजभूषण शरण सिंह ने स्पष्ट किया कि अखिलेश के विवादित बयान `राजनीतिक मजबूरी’ की वजह से हैं, न कि उनकी व्यक्तिगत मान्यताओं के कारण। दूसरा, इटावा में एक कथावाचक के साथ हुई घटना पर दोनों नेताओं की सहमति ने भी इस प्रशंसा को बल दिया। बृजभूषण शरण सिंह ने घटना की निंदा करते हुए कहा कि जाति के आधार पर कोई आलोचना गलत है, जिस पर अखिलेश भी पहले मुखर हो चुके थे। इस साझा रुख ने दोनों के बीच एक अप्रत्यक्ष समझ दिखाई। तीसरा, बृजभूषण शरण सिंह ने स्वीकार किया कि यह टिप्पणी अनायास ही निकल गई, `यह बात मुझे यहां नहीं कहनी चाहिए थी, सच मेरे मुंह से निकल गया।’ यह बयान संतकबीरनगर में एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम में दिया गया, जो औपचारिक संदर्भ से हटकर था। राजनीतिक स्तर पर यह कदम विपक्ष में फूट डालने या भविष्य के गठजोड़ की संभावना का संकेत भी दे सकता है। इसके जवाब में अखिलेश यादव के बयान, `बृजभूषण शरण के नेता जी (मुलायम सिंह यादव) से बहुत अच्छे संबंध थे’ ने इस पारस्परिकता को ऐतिहासिक आधार दिया। यह संदर्भ १९९० के दशक से जुड़ा है, जब मुलायम सिंह यादव ने बृजभूषण शरण सिंह को वैâबिनेट मंत्री बनाया था और १९९१ में टाडा केस में उनकी रिहाई में सहायता की थी। अखिलेश का यह उल्लेख न केवल पारिवारिक राजनीतिक विरासत को पुनर्जीवित करता है, बल्कि वर्तमान में बृजभूषण शरण सिंह की प्रशंसा के प्रति कूटनीतिक स्वीकृति भी दर्शाता है। हालांकि, बृजभूषण की टिप्पणी ने बीजेपी समर्थकों में असहमति पैदा की है। कई लोगों का मानना है कि `मजबूरी’ का तर्क धर्म-विरोधी बयानों को सही नहीं ठहराता। वहीं सपा के लिए यह चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यह उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि और हिंदू-मुस्लिम समीकरण के बीच द्वंद्व पैदा कर सकता है। अखिलेश का जवाबी बयान उनकी हिंदू वोट बैंक की ओर रुझान दिखाता है, लेकिन इससे मुस्लिम समर्थकों में आशंका भी उभर सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह आदान-प्रदान २०२७ के यूपी चुनावों में गैर-बीजेपी गठबंधन की संभावना को रेखांकित करता है, खासकर जब बृजभूषण शरण सिंह का बीजेपी से दूर जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं। कुल मिलाकर, यह पारस्परिक प्रशंसा यूपी की जटिल राजनीति में एक सोची-समझी रणनीतिक गतिशीलता को दर्शाती है, जहां ऐतिहासिक रिश्ते और वर्तमान हित अप्रत्याशित गठजोड़ों की भूमिका तैयार कर रहे हैं।

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