डॉ. हरि जोशी
किसका साहस जो किसी प्रगतिशील को कल्प्रिट बता दे? यहां-वहां क्यों भटकना, अपने पटना की है घटना। बात कपोल कल्पित नहीं। कविवर को रासलीला प्रिय थी, कर डाली, पौरुष का प्रदर्शन किया। उनका इतिहास बड़ा प्रेरक, पहले आर्थिक अपराधों में, इस बार रास लीला में लिप्त। प्रगतिशील जो हैं? मेरे वाम अंग आ जाओ का सफल क्रियान्वयन किया। गड़बड़ यह हुई कि कविता के अधुनातन कृष्ण कन्हैया की रासलीला पकड़ी गई। जानकार बताते हैं ऐसी लीलाएं करने में वह दक्ष हैं। उस दिन की बदमाश रासलीला, छुप नहीं पाई।
ज्ञानीजन बताते हैं, अन्य कलाओं में भी वह निपुण हैं। कंचन और कामिनी दोनों को हस्तगत करने में तो निष्णात हैं। वामपंथियों ने इन्हें सिरमौर घोषित किया था, अब दूर कर दिया। गाली-गलौज लिखना, फिर लेखन को व्यवहार में ढालना, वामपंथ का भूषण है। हिंदी जगत अधुनातन कृष्ण कन्हैया को पाकर गौरवान्वित हुआ। उनका स्पष्टीकरण स्वीकार्य, वह निर्दोष हैं, जो कुछ किया है, चेली ने ही किया है। इस सद्कर्म में उनका कोई योगदान नहीं।
जानकार बताते हैं, आर्थिक अपराधों में भी एक-दो बार फंस चुके हैं। ऐसी दुर्लभ कलाओं का कार्यान्वयन पहले किसने किया, जिनमें ये पारंगत हैं? मुझसे ऐसी क्या दुश्मनी थी जब तक मैं भारत में रहा, इनका अवतरण नहीं हुआ था, अन्यथा उनके दर्शन कर मैं कृतकृत्य हो जाता? यहां अमेरिका में बैठे हुए भारत के इस स्थापित कलाकार के सन्दर्भ में पढ़कर गौरवान्वित हूं? भारत भूमि पर नई-नई कलाओं में पारंगत ऐसे कलाकार कम कहां? इनसे प्रेरणा लेकर अनगिनत खड़े होंगे। इस खिलाड़ी की रासलीला जब वायरल हो गई, कल्पित नहीं रही, तब आधुनिक कृष्ण कन्हैया घटना को नकारते फिर रहे हैं, अंतर्राष्ट्रीय अदालतों से नोटिस भिजवा रहे हैं कि उस प्रसंग को उठाया ही क्यों जा रहा है? सच भी है, गलती उनकी नहीं, सहयोगी गोपी की थी। वैसे मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की। कोई तो उनकी बात पर विश्वास करे? वह बार-बार आश्वस्त कर रहे हैं, जो कुछ करा धरा है वह चेली का है, इसमें उनका कोई दोष नहीं है। सच भी है, कल्पित कुछ भी नहीं, सब कुछ वास्तविक है। प्रमाण में वह कह सकते हैं क्या ऐसे वह अकेले ही खिलाड़ी हैं? इतिहास साक्षी है, पहले भी विभिन्न मठ और महंत इस दिशा में सक्रिय रहे हैं, इसीलिए तो जगह-जगह चेलों की अपेक्षा चेलियों की आवभगत अधिक होती है। भोपाल का उदाहरण दे सकते थे। भारत भवन में तब भी एक रास रचैया थे। वहां भी चेलों से अधिक, चेलियों को प्राथमिकता दी जाती थी। तत्कालीन कन्हैया ने जब गुल खिलाया तो वह चेली विरोधी मुद्रा में आ गई। अगले दिन वह संदिग्ध परिस्थितयों में मृत पाई गई। तब के मठाधीश कोई हीने-सीने प्रशासक या खिलाड़ी तो थे नहीं? पहुंचे हुए प्रगतिशील कवि थे। जाके संग दस बीस हैं ताको नाम महंत। हिंदी साहित्य में पुरस्कार दाता, राज्य के संस्कृति सचिव, साहित्यिक पत्रिकाओं के संचालक, कवि सम्मेलनों के आयोजक, ऐसे अनगिनत कलाकार अधुनातन कन्हैयाओं के रूप में सक्रिय हैं। इन मठाधीशों की ख्याति उनके चेले देश-विदेश में घूम-घूम कर बढ़ा रहे हैं। चेलों से अधिक चेलियों को प्रवेश इसीलिए ही तो दिया जाता है, क्योंकि ऐसा करने से मठों में रौनक बनी रहती है। कविता लिखने की प्रेरणा साथ में रहती हैं। चेलियों की आवभगत अन्यथा क्यों?
