सामना संवाददाता / नई दिल्ली
चीन इंडिया के मैन्युफैक्चिंरग सेक्टर को तबाह करना चाहता है। इसी के तहत उसने हिंदुस्थान पर ‘किलर स्ट्राइक’ की है, लेकिन मोदी सरकार के पास चीन की कोई काट नहीं है।
चीन की मंशा भारतीय अर्थव्यवस्था की जड़ों में सेंध लगाने की है। चीन को आभास हो गया है कि भारत दुनिया की दूसरी फैक्ट्री बनने की तरफ तेजी से बढ़ रहा है और उसकी चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। अपनी इसी चिंता से निपटने के लिए चीन ने भारत मैन्युफैक्चिरिंग को सुस्त करने की रणनीति बनाई है। साथ ही भारत में काम कर रहे अपने नागरिकों को वापस बुलाने का फरमान भी जारी कर दिया है। चीन ने भारत की तेजी से बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग ताकत कम करने के लिए कच्चे माल और उपकरणों की आपूर्ति कम कर दी है। चीन जानबूझकर इसकी डिलिवरी में देरी कर रहा है। ड्रैगन ने कई जरूरी मशीनरी और उपकरणों की डिलिवरी को लटका दिया है। चीन के नागरिक नागरिक भारत की ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों में काम कर रहे हैं। इसमें एप्पल के प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनी फॉक्सकॉन भी शामिल है। चीन ने न सिर्फ अपने कुछ नागरिकों को भारतीय फैक्ट्रियों से वापस बुलाने का आदेश दिया है, बल्कि भारत को ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के निर्माण में उपयोग होने वाले रेयर अर्थ यानी मैग्नेट के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।
ओप्पो, वीवो और शाओमी पर भी संकट
चीन की इस चाल का असर आईफोन के निर्माण पर ही नहीं, बल्कि भारत में अपने प्रोडक्ट बनाने वाली चीनी मोबाइल कंपनियों पर भी दिखेगा। चीन की मोबाइल कंपनियां ओप्पो और वीवो बड़े पैमाने पर अपने उत्पादन भारत में करती हैं। वैसे तो इन कंपनियों के पास चीनी कर्मचारियों की संख्या काफी कम है, लेकिन उन्हें चिंता है कि अगर चीन ने ऐसा कदम उठाया तो इसका उन पर क्या असर होगा।
भारत से बदला ले रहा चीन
सूत्रों का कहना है कि चीन यह चालबाजी भारत से बदला लेने के मकसद से कर रहा है, क्योंकि उसके कॉरपोरेट कर्मचारियों को भारत में आसानी से वीजा नहीं मिल रहा है। सरकार इस मामले पर एक विस्तृत रिपोर्ट मांग रही है, ताकि इस मुद्दे को संकट बनने से पहले ही हल किया जा सके। सरकार नहीं चाहती कि भारत के निर्यात में प्रमुख भूमिका निभाने वाले एप्पल के उत्पादन पर कोई ज्यादा संकट आए।
