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संपादकीय : देवेंद्र की ‘रुदाली’

त्रिभाषाई अनिवार्यता का बट्टा सरकार के माथे मारकर महाराष्ट्र में मराठी एकता की आवाज आसमान तक गूंज उठी है। महाराष्ट्र के दुश्मनों को इस बात की पीड़ा होना स्वाभाविक है कि इस अवसर पर ‘ठाकरे बंधु’ एक हो गए हैं और मराठीजनों का तमाम रंग एक हो गया है। भारत ने वर्ली के ‘डोम’ हॉल में और उसके बाहर मराठी एकता का एक शानदार नजारा देखा। यदि यह समारोह शिवतीर्थ पर आयोजित किया गया होता तो भी यह मराठी उत्साह के सामने छोटा पड़ जाता, लेकिन कुछ कम नसीब लोगों को यह मराठी उत्सव सहन नहीं हुआ। कुछ को चोट लगी, कुछ को मतली आई, कुछ को जलन हुई। कुछ लोग ऐसे बड़बड़ाने लगे जैसे उन्होंने भांग चढ़ा ली हो। कुछ सो गए और अभी तक नहीं जागे हैं। मुख्यमंत्री फडणवीस ने इन सभी विकारों का एक साथ अनुभव किया और मराठी एकता के प्रति ईर्ष्या रोग से पीड़ित हो गए। फडणवीस ‘ठाकरे’ के नेतृत्व में एकत्र मराठी मेले को ‘रुदाली’ कहते हैं। उन्होंने यह टिप्पणी विट्ठल के पंढरपुर में की। उन्होंने कहा कि मेले में मराठी का विजयोत्सव नहीं था, बल्कि ‘रुदाली’ थी। जिन्हें मराठीजनों की विजय गर्जना ‘रुदाली’ यानी रोना-धोना लगता है ऐसी सोच के मुख्यमंत्री महाराष्ट्र की गद्दी पर बैठे हैं। ‘रुदाली’ शब्द मूल मराठी भाषा का नहीं है। उन्होंने यह शब्द हिंदी शब्दकोष से उधार लिया है। राजस्थान, हरियाणा, बुंदेलखंड, मध्य प्रदेश आदि क्षेत्रों में ‘रुदाली’ एक तरह की प्रथा है। अगर किसी के घर में कोई दुखद घटना जैसे मृत्यु हो जाती है तो वहां (अमीर लोगों के घर) महिलाओं को पैसे देकर रोने, छाती पीटने और विलाप करने के लिए बुलाया जाता है। वे पैसे लेकर रोती हैं और चली जाती हैं। फडणवीस का ‘मराठी’ जीत का जश्न मनानेवाली मराठी अस्मिता की तुलना मौत के समय पैसे लेकर रोने वाली महिलाओं से करना
राज्य की एक त्रासदी
से कम नहीं। पूरा महाराष्ट्र खुश था कि मराठी लोग त्रिभाषाई अनिवार्यता के खिलाफ एकजुट हुए और ठाकरे बंधुओं ने उनका नेतृत्व किया, लेकिन श्री फडणवीस ने मराठी जीत पर ‘रुदाली’ का वमन करने का काम किया है, यह उनकी निराशा और हताशा है। इसका मतलब है कि मराठी एकता फडणवीस को स्वीकार्य नहीं है और उन्हें इस बात का दुख है कि मराठी एकता के कारण ही उन्हें त्रिभाषाई अनिवार्यता कानून को रद्द करना पड़ा इसलिए उनके लिए मराठी जीत को ‘रुदाली’ मानना ​​स्वाभाविक है। फडणवीस और उनकी पार्टी के पास प्रचंड धन संपत्ति है। यह लूट का माल है इसलिए वे मोदी की सभाओं में रोने, हंसने और तालियां बजाने के लिए लोगों को किराए पर ला सकते हैं। एक असल स्वाभिमानी मराठी माणुस इस स्वाभिमान की बिक्री के झमेले में नहीं पड़ता। वह मराठी भाषा, मराठी साहित्य, मराठी इतिहास और उसके मर्दाना बाना से पूरे दिल से प्यार करता है। ‘रुदाली’ महाराष्ट्र की परंपरा नहीं है और यह मराठी भाषा की संस्कृति भी नहीं है। छत्रपति शिवाजी की मराठी भाषा को ‘रुदाली’ कहना हुतात्मा चौक के सामने खड़े होकर ‘जय गुजरात’ का नारा लगाने जैसा है। ऐसे नारे लगानेवाले लोग फडणवीस की कैबिनेट में हैं और फडणवीस ‘जय गुजरात’ का नारा लगानेवालों को बढ़ावा दे रहे हैं। संयुक्त महाराष्ट्र संघर्ष की ‘रणगर्जना’ थी ‘रुदाली’ नहीं जैसा कि फडणवीस कहते हैं। मराठी भाषा, मराठी साहित्य और कला की
परंपरा इस तरह तेजस्वी
है कि महाराष्ट्र सरस्वती के दरबार की वीणा झंकार को सदैव अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले शाहीर की डफली का साथ मिला है। आज का मराठी माणुस इसी तेजस्वी और स्वाभिमानी परंपरा का सच्चा वारिस है। एक ओर भागवत ग्रंथ लिखकर भक्ति रस की वर्षा करनेवाले, दूसरी ओर रामायण लिखकर महाराष्ट्र में मुगल आक्रमण के खिलाफ गुप्त रूप से लड़ने की वीर भावना जागृत करनेवाले एकनाथ महाराज की मराठी भाषा और साहित्य की परंपरा है। मराठी भाषा और मराठी जनता के लिए किसी भी अत्याचार को सहन करनेवाले और फिर से लड़ने के लिए तैयार रहनेवाले ज्ञानेश्वर, तुकाराम, छत्रपति शिवाजी महाराज, छत्रपति संभाजी की यही परंपरा मराठी भाषा की परंपरा है। अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ अपनी प्रतिभा की नंगी तलवार चमकानेवाले कवि गोविंद, ‘केसरी’ कार तिलक, कवि विनायक, स्वातंत्र्यवीर सावरकर, शिवराम महादेव परांजपे, काकासाहेब खाडिलकर, अण्णाभाऊ साठे, शाहीर अमरशेख, आचार्य अत्रे और कार्टून के जरिए महाराष्ट्र के दुश्मनों को घायल करनेवाले और मराठीजनों पर होनेवाले अन्याय के खिलाफ ‘शिवसेना’ की स्थापना करनेवाले बालासाहेब ठाकरे की परंपरा ही महाराष्ट्र की परंपरा है। चूंकि भाजपा और उसके साथी इस परंपरा में कहीं भी फिट नहीं बैठते इसलिए वे महाराष्ट्र की मर्दानगी को ‘रुदाली’ कहकर तुच्छ बना रहे हैं। नरेंद्र मोदी की ‘रुदाली’ पिछले दस वर्षों से देश में चल रही है। इतनी बड़ी सत्ता प्राप्त करने के बाद भी पंडित नेहरू व गांधी परिवार के नाम पर ठीकरा फोड़नेवाला और अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए रोना रोनेवाला ऐसा कोई दूसरा ‘रुदाली’ नहीं होगा। जब मोदी रोने लगते हैं तो देश में दूसरों का रोना-धोना शुरू हो जाता है और देश में दुख का माहौल बन जाता है। भारत जैसे महान देश के मर्दाना गर्जना को ‘रुदाली’ बना दिया इसलिए अगर मुंबई में मराठी मर्दों का उफान देवेंद्र फडणवीस को ‘रुदाली’ लगता है, तो उन्हें अपनी ‘रुदाली’ जारी रखनी चाहिए! फडणवीस की ‘रुदाली’ महाराष्ट्र और मराठीजनों की आवाज नहीं है!

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