लोकमित्र गौतम
ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत के साथ रूस का अस्पष्ट रवैया और पिछले चार सालों में पाकिस्तान के साथ साझा सैन्य अभ्यास से लेकर गैस पाइपलाइन बिछाने तक की योजना बनाना तथा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को व्रैâमिलिन में आमंत्रित करना, शायद रूस को भारत पर यह कूटनीतिक दबाव कुछ कम लग रहा था इसलिए अब उसने तालिबान सरकार को मान्यता देकर रूस, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के एक और खतरनाक गठजोड़ की रूपरेखा प्रस्तुत की है।
गौरतलब है कि तालिबान का जहां एक धड़ा काफी पहले से हमारे साथ दोस्ताना संबंधों के लिए हाथ-पैर मार रहा था, वहीं इसका हक्कानी धड़ा भारत का विरोध और रूस, पाकिस्तान व अफगानिस्तान के गठजोड़ की वकालत करता रहा है। हालांकि, रूस खुले तौर पर तो ऐसा नहीं करेगा कि भारत के खिलाफ पाकिस्तान और अफगानिस्तान के साथ गठजोड़ बनाता दिखे, मगर न दिखने से क्या होगा? अगर वह इन दोनों देशों के साथ मजबूत संबंधों की तिकड़ी बनाता है तो यह अपने आपमें भारत के खिलाफ एक बड़ा रणनीतिक मोर्चा होगा। यही नहीं जिस तरह से रूस ने दुनिया का पहला देश बनते हुए अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को मान्यता दी है, उससे साफ है कि वह हर हाल में अफगानिस्तान को अपना मजबूत सहयोगी बनाना चाहता है। जिस तरह से अफगानिस्तान में एक बड़े तबके की हमदर्दी पाकिस्तान के साथ है, उसके कारण रूस और अफगानिस्तान का यह गठजोड़ स्वाभाविक रुप से पाकिस्तान के साथ भी मजबूत रिश्ते बनाएगा। इससे साफ है कि रूस का तालिबान सरकार को मान्यता देना भारत पर एक बड़ा कूटनीतिक दबाव है।
कूटनीतिक अकेलापन
हालांकि, भारत पिछले एक साल से तालिबान के साथ सकारात्मक संपर्क में है और पहलगाम की घटना के बाद अफगानिस्तान ने जिस तरह से इसका विरोध किया था, उससे साफ लग रहा था कि वह हमारे प्रति हमदर्दी रखता है। लेकिन यह भी साफ है कि भारत ने आजतक तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है और हाल-फिलहाल में तालिबान सरकार को मान्यता देने का हमारा कोई इरादा भी नहीं है। लेकिन अब रूस ने जिस तरह से तालिबान सरकार को मान्यता दे दी है और अफगानिस्तान से होकर पाकिस्तान तक तेल और गैस आपूर्ति की पाइप लाइन बिछाने पर गंभीर चर्चा के मोड़ पर आ गया है, उससे साफ है कि हमें भी रूस, पाक और अफगान तिकड़ी को भारत के खिलाफ मजबूत कड़ी बनने से रोकने के लिए तालिबान के साथ दोस्ती को और मजबूत करना होगा, नहीं तो तालिबान अभी हमारे साथ अपने रिश्तों के भविष्य की उम्मीद में जिस तरह से पाकिस्तान के साथ तटस्थ रवैया इख्तियार किया हुआ है, वह उससे पलटकर दोस्ताना मोड में आ जायेगा और भारत के साथ विरोधी गठजोड़ की मुद्रा अख्तियार कर लेगा।
गौरतलब है कि तालिबान सरकार को मान्यता देना भारत की फिलहाल अफगान नीति के विपरीत है। लेकिन रूस द्वारा तालिबान को मान्यता देने से हम पर यह दबाव बढ़ गया है कि हम भी अगर अफगानिस्तान को मान्यता न भी दें तो भी उसके साथ गहरे और अर्थपूर्ण संबंध बनाएं, नहीं तो वह अपने यहां से आईएसआई और पाक समर्थित आंतकवादी गुटों को हमारे खिलाफ हर तरह का खेल खेलने के लिए छूट दे देगा। वास्तव में रूस द्वारा तालिबान को मान्यता देना भारत की सुरक्षा चिंताओं को हिंदुस्थान के सबसे पुराने दोस्त द्वारा दरकिनार किया जाना है। इससे भारत एक तरह से इस पूरे क्षेत्र में कूटनीतिक अकेलेपन का शिकार हो गया। इस जख्म पर नमक छिड़कने का आनन-फानन में काम पाकिस्तान द्वारा तालिबान सरकार को मान्यता देना होगा। हालांकि, वह इस समय एक ऐसी दुविधा में फंस गया है कि वह रूस के पलड़े में बैठे या अमेरिका के, क्योंकि व्हाइट हाउस द्वारा पाकिस्तानी सेना अध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर की मेजबानी करने के बाद अब पेंटागन ने पाकिस्तान के वायु सेना प्रमुख जहीर अहमद बाबर सिद्धू की आगवानी की है।
पिछले दस सालों में यह किसी पाकिस्तानी वायु सेना प्रमुख का पेंटागन दौरा था। इसके पहले २०१३ में पाक वायु सेना प्रमुख ताहिर बट्ट अमेरिका गए थे। जाहिर है कि अमेरिका, पाकिस्तान को एक के बाद दूसरा सरप्राइज देकर उसका भाव इसलिए बढ़ा रहा है कि पाकिस्तान, रूस के खेमे में न जाए। क्योंकि रूस के खेमे में जाने का मतलब चीन के खेमे का भी होना है। लेकिन असली बात यह है कि भारत इन दोनों बड़े देशों के कूटनीतिक दबाव के लिए बनाये जा रहे गठबंधनों के बीच पिस रहा है। भारत रूस के साथ तब पूरी दृढ़ता के साथ खड़ा रहा है, जब उसके यूक्रेन हमले के बाद लगभग पूरी दुनिया का रूख उसके खिलाफ हो गया था और रूस पर पश्चिमी आर्थिक प्रतिबंध पहले के कई गुना ज्यादा कड़े कर दिए गए थे। रूस से जितना पारंपरिक रूप से तेल खरीद रहे थे, तब हमने उससे तीन गुना ज्यादा खरीदा और रूस की दम तोड़ती अर्थव्यवस्था को स्थायित्व दिया। रूस ने भारत की इस हिम्मत के लिए कई बार सार्वजनिक रूप से हमारे साथ अपनी दोस्ती की मजबूती का इजहार भी किया है। लेकिन जबसे भारत ने क्वाड में अपनी मजबूत भूमिका रेखांकित करने की कोशिश की है, ताकि इस कूटनीतिक रणक्षेत्र में चीन को चुनौती दी जा सके, तबसे अप्रत्यक्ष रूप से रूस का रवैया हमको सबक सिखानेवाला हो गया है, क्योंकि इस दौरान चीन ने रूस के साथ अपनी गलबहियां बहुत मजबूत कर ली हैं।
फायदा कम नुकसान ज्यादा
दरअसल, सच्चाई यह है कि रूस अगर यूक्रेन के साथ लगातार हथियार और गोला-बारूद के मामले में २० साबित हो रहा है तो इसमें चीन और उत्तर कोरिया की प्रमुख भूमिका है। बहरहाल, अपने-अपने हितों को लेकर जिस तरह से चीन, रूस और पाकिस्तान ने आपसी गठजोड़ की जो बिसात बिछाई है, अब अफगानिस्तान भी अगर उस बिसात का मजबूत हिस्सा बन गया तो भारत इस समूचे क्षेत्र में बिल्कुल अलग थलग पड़ जाएगा।
हाल के सालों में हमने अपनी विदेश नीति में दृढ़तापूर्वक अपने हितों को साधने वाले निर्णय भले लिए हों, लेकिन जिस तरह से पहले एक के बाद एक पड़ोसी और अब दशकों का आजमाया हुआ घनिष्ठ दोस्त रूस हमारे खिलाफ रणनीतिक गठजोड़ का भागीदार बन गया है, उससे तो यही लग रहा है कि हमें अपने हितों की इस साहसिक विदेश नीति का फायदा मिलने की जगह कई गुना ज्यादा नुकसान हो गया है। हालांकि, रूस ने जिस तरह से अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को मान्यता दी है, उससे दुनिया में दबाव तो जरूर बढ़ेगा और रूस के कुछ बेहद नजदीकी देश जैसे चीन, उत्तर कोरिया और सेंट्रल एशिया के कुछ देश भी तालिबान सरकार को मान्यता देने की कोशिश करेंगे, साथ ही पाकिस्तान लपककर भारत पर दबाव बनाते इस गठजोड़ का हिस्सा बनने के लिए तालिबान को गले लगा सकता है।
लेकिन शेष दुनिया के लिए अभी तालिबान को मान्यता देना इतना आसान नहीं होगा। इससे भी बड़ी बात यह है कि रूस ने रणनीतिक दांव के चलते भले तालिबान को गले लगा लिया हो, लेकिन उसकी नैतिक साख मिट्टी में मिल गई है। पुतिन को अभी भी कई सरकारें और वहां के लोग पुराना कामरेड मानने की ही गलती करते रहे हैं। लेकिन जिस तरह से पुतिन ने स्त्री विरोधी और धार्मिक रूप से उन्मादी तालिबान सरकार को मान्यता दी है, उससे सबकी आंखें खुल गई हैं कि पुतिन अपने फायदे के लिए किसी भी गधे-घोड़े को अपना बाप बनाने से परहेज नहीं करते। पुतिन की अब यह हरकत तालिबान के लालच को कई गुना ज्यादा बढ़ा देगी और जो तालिबान सरकार अभी तक भारत से अप्रत्यक्ष रूप से रिश्ता बढ़ाने के लिए हमारे इर्द-गिर्द मंडरा रहा था, वही तालिबान सरकार अब ऐसा करने के लिए हम पर पाकिस्तान के नजदीक जाने का दबाव बना सकता है। क्योंकि रूस द्वारा मान्यता दिए जाने से उसका मनोबल कई गुना बढ़ गया है और रूस का यह दांव भारत पर भारी पड़ रहा है।
(लेखक विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में वरिष्ठ संपादक हैं)
