संजय राऊत
`देवेंद्र फडणवीस द्वारा लाया गया जन सुरक्षा कानून लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात है। वामपंथी विचारों वाले लोगों से डरकर फडणवीस ने यह कानून दैत्य की तरह निर्माण किया। आज देश को सबसे बड़ा खतरा दक्षिणपंथियों से है। समाज के हितों के विरुद्ध काम करने वाली सरकार के खिलाफ विद्रोह करने का अधिकार सभी को है!’
कुछ व्यक्ति, संस्थाएं और राजनेता लोकतांत्रिक होने का दिखावा करते हैं, लेकिन जब असली परीक्षा आती है तो इन लोगों का असली चरित्र सामने आ जाता है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भारी बहुमत के बल पर जन सुरक्षा कानून विधानसभा में मंजूर करवा लिया। ‘अर्बन नक्सलवादी’ विचारों वाले लोगों को रोकने और उनकी घेराबंदी करने के लिए ‘जन सुरक्षा विधेयक’ लाया गया है, फडणवीस का ऐसा कहना समझ से परे है। उन्होंने जन सुरक्षा कानून उन लोगों में दहशत पैदा करने के लिए पारित करवाया, जो सरकार और उनके प्रिय पूंजीपति मित्रों की गतिविधियों पर सवाल उठाते हैं। हमारे मित्र राजू परुलेकर ने चंद शब्दों में इस कानून की धज्जियां उड़ा दीं। यह कानून पूंजीपति गौतम अडानी और उनके वित्तीय साम्राज्य की रक्षा करने के लिए लाया गया है। अडानी के खदान उद्योग का साम्राज्य चंद्रपुर से लेकर छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगलों तक फैला हुआ है। जंगलों में रहने वाले आदिवासी और वनवासी इस घुसपैठ का विरोध कर रहे हैं। जंगलों में काम करने वाले लोग और उनके नेता आदिवासियों के अधिकारों व जंगलों की सुरक्षा के लिए लड़ रहे हैं। अडानी के साम्राज्यवाद का विरोध करने वाले सभी लोगों को नए ‘अडानी सुरक्षा’ कानून के तहत गिरफ्तार किया जाएगा और कई महीनों तक जेल में रखा जाएगा। फडणवीस द्वारा इसी उद्देश्य से यह काला कानून लाया गया है। धारावी पुनर्वास परियोजना दुनिया का सबसे बड़ा जमीन घोटाला है। मूल धारावीवासियों को उनकी जगह से उजाड़ दिया जाएगा और अपने अधिकारों के लिए लड़ने वाले धारावीकरों और उनके नेताओं को ‘अर्बन नक्सली’ करार देकर ‘अडानी सुरक्षा’ कानून के तहत जेल में डाल दिया जाएगा। महाराष्ट्र विधानसभा में एक उद्योगपति की संपत्ति की सुरक्षा के लिए एक विशेष कानून पारित किया जाता है और सत्ताधारी दल के मराठी विधायक अपनी खुली आंखों से लोकतंत्र और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की हत्या होते देखकर विजयी मुद्रा में बेंच बजाते हैं। यह तस्वीर भयावह है।
कानून क्यों?
माओवादी विचारों वाले लोगों को गिरफ्तार करने के लिए जन सुरक्षा कानून बनाया गया, देवेंद्र फडणवीस का ये बयान समझ से परे है। भारतीय विदेश मंत्री इस समय माओवादी चीन के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने के लिए चीन गए हुए हैं और चीन के सभी माओवादी नेताओं से मिल रहे हैं। क्या अब फडणवीस जयशंकर को माओवादी मानेंगे? ‘‘लोकतांत्रिक संस्थाओं में घुसो और अराजकता पैâलाओ, ऐसा सीधा संदेश माओवादियों ने उनके वैâडर को दिया है। ये माओवादी किन संस्थाओं में घुसे हैं, यह पता लगाया जाएगा और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी,’’ ऐसा श्री. फडणवीस ने कहा है। फडणवीस का मानना है, ‘‘माओवादियों ने गांधीवादी संस्थाओं में घुसपैठ कर ली है।’’ फडणवीस का यह बयान पूरी तरह से उनके दिवालियापन को दर्शाता है। फडणवीस का आक्षेप है कि ‘जन सुरक्षा विधेयक’ को पढ़े बिना ही विरोध जारी है। लेकिन सच्चाई यही है कि जन सुरक्षा अधिनियम, आपातकाल में लागू ‘मीसा’ कानून का ही दूसरा रूप है। यह कानून वामपंथी विचारधारा में व्याप्त ‘उग्र’ अर्थात कट्टर लोगों को संवारने के लिए है। यह सब किसलिए? फिर फडणवीस का नव-हिंदुत्ववादियों जैसी उभरती हुई अतिवादी दक्षिणपंथी विचारधारा पर आक्षेप क्यों नहीं है? फडणवीस कहते हैं, ‘‘गांधीवादी संस्थानों में माओवादी सेमिनार आयोजित करते हैं।’’ तो फडणवीस जी, गांधी जी अब इतने प्रिय हो गए हैं तो गांधी जी की हत्या करनेवाले नाथूराम गोडसे का खुलेआम महिमामंडन करनेवाले ‘कट्टर दक्षिणपंथियों’ के खिलाफ आप क्या कार्रवाई करेंगे? गोडसेवादी गांधी की मूर्ति पर गोलियां चलाकर हत्या करते हैं। आप इस कड़वाहट को कैसे खत्म करेंगे? श्यामाप्रसाद मुखर्जी भाजपा के गुरुदेव माने जाते हैं। गांधी की हत्या के बाद, श्यामाप्रसाद मुखर्जी गांधी की हत्या के आरोपियों की मदद के लिए ‘धन’ जुटा रहे थे। उस समय सरदार पटेल ने मुखर्जी को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई थी। उन्हीं सरदार पटेल की एक भव्य प्रतिमा अब भाजपा ने अहमदाबाद में स्थापित की। नहीं, करना पड़ा। अब हमें यह समझने की जरूरत है कि ये ‘कट्टर दक्षिणपंथी’ किस विचारधारा को मानते हैं। इन सभी ‘कट्टर दक्षिणपंथी’ मंडली का स्वतंत्रता संग्राम में कोई सहभाग नहीं था। स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े आंदोलन ‘भारत छोड़ो’ अथवा ‘चले जाओ’ का भाजपा के गुरुवर्य (कट्टर दक्षिणपंथी) श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने विरोध किया था। जब सुभाषचंद्र बोस आजाद हिंद सेना के साथ भारत की ओर बढ़ रहे थे, तब मुखर्जी सुभाषचंद्र के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की भूमिका पर अड़ गए थे। जब मुखर्जी बंगाल में जनसभा करते थे, तब सुभाषचंद्र बोस के फॉरवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ता उन पर पत्थर फेंकते थे, लेकिन नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में इंडिया गेट के सामने उन्हीं सुभाषचंद्र बोस की एक प्रतिमा स्थापित की। बोस के फॉरवर्ड ब्लॉक की विचारधारा ‘कट्टर वामपंथी’ थी और मोदी को वर्तमान में बोस प्रिय हैं। जब सरदार पटेल भारत की संविधान सभा में अनुच्छेद ३७० को मंजूरी दे रहे थे, तब कट्टर दक्षिणपंथी मुखर्जी ने इसके विरोध में एक शब्द भी नहीं कहा। जब डॉ. आंबेडकर संसद में हिंदू कोड बिल पारित करना चाहते थे, तब मुखर्जी ने डॉ. आंबेडकर का अपमान किया। उन्होंने असंसदीय शब्दों का प्रयोग किया और हिंदू कोड बिल को पारित नहीं होने दिया। मुखर्जी की विचारधारा कट्टर दक्षिणपंथी थी और यह आज भी अशांति और अस्थिरता पैदा करने का अवसर देती है। दूसरी बात, किसी को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, किसी को क्या कपड़े पहनने चाहिए, इस पर अतिवादी कार्रवाई करना और मॉब लिंचिंग करना ‘अर्बन नक्सलवाद’ का ही एक रूप है। ‘लव जिहाद’ के नाम पर हत्या करना और दंगों का माहौल बनाना ‘अर्बन नक्सलवाद’ है। फडणवीस के जन सुरक्षा कानून में इसके बारे में क्या कहा गया है? फडणवीस को ऐसी ‘दक्षिणपंथी’ अतिवादी विचारधारा को भी जन सुरक्षा कानून में शामिल करना चाहिए। ये कट्टर दक्षिणपंथी लोग देश की आजादी और सामाजिक आंदोलन में कभी नहीं थे। वे महाराष्ट्र के संघर्ष में भी नहीं थे। इसके विपरीत, कॉ. श्रीपाद अमृत डांगे, कॉ. रणदिवे, सेनापति बापट, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकउल्लाह खान, सुभाषचंद्र बोस (कांग्रेस से होने के बावजूद), सुखदेव जेल गए और फांसी भी चढ़ गए। पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने वालों में ‘कट्टर वामपंथी’ स्वामी कुमारनंद सबसे आगे थे। मेरठ बम कांड, काकोरी कांड और अंडमान जेल में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन में, मोदी-फडणवीस की विचारधारा के लोग कहीं नहीं थे। जो भी थे, वे सभी ‘कट्टर वामपंथी’ थे। यहां तक कि संयुक्त महाराष्ट्र के संघर्ष में भी शाहिर अमरशेख, अन्नाभाऊ साठे, कॉ. गंगाधर रेड्डी, क्रांतिवीर नाना पाटील, कॉ. श्रीपाद अमृत डांगे ये सब वामपंथी विचारधारा वाले कट्टर लोग थे। इसीलिए आज श्री. फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हैं।
राजनीतिक बदला!
फडणवीस का महाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा २०२४ कानून सुरक्षा के नाम पर सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवी संस्थाओं, अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाले संगठनों और नागरिकों की स्वतंत्रता छीन लेगा। फडणवीस की सरकार अपनी मर्जी से ‘गैरकानूनी संगठन’, ‘गैरकानूनी कार्य’ की परिभाषा तय करेगी और सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डालने के नाम पर संगठनों पर प्रतिबंध लगाएगी। शासक की गलत नीतियों का विरोध करना अपराध माना जाएगा। भाषण, लेखन, कार्टून, सोशल मीडिया पर तीखी भाषा को ‘गैरकानूनी कार्य’ माना जाएगा और ‘मीसा’ कानून की तरह जेल भेजा जाएगा। मंत्रियों के भ्रष्टाचार और गौतम अडानी द्वारा सरकारी संपत्ति लूटने के मामले में बोलना, आंदोलन करना अपराध माना जाएगा। फडणवीस का ‘जन सुरक्षा’ अधिनियम एक भयानक दैत्य है। वर्तमान में कई सामाजिक और गैर-सरकारी संगठन जंगलों में आदिवासी गांवों में काम कर रहे हैं। वे असंगठित मजदूरों के अधिकारों के लिए सरकार के खिलाफ लड़ रहे हैं। इनमें से ज्यादातर गैर-सरकारी संगठनों ने लोकसभा चुनावों में तानाशाही प्रवृत्ति के खिलाफ प्रचार किया। ‘मोदी नहीं चाहिए’ की भूमिका अख्तियार की। महाराष्ट्र में ये सभी संगठन श्री. शरद पवार और उद्धव ठाकरे की बैठकों में शामिल हुए। इससे भाजपा के लिए खतरा निर्माण हुआ। इसी आक्रोश से इन संगठनों को सबक सिखाने के लिए महाराष्ट्र में नागरिक स्वतंत्रता का गला घोंटने वाला ‘जन सुरक्षा’ कानून लाया गया। फडणवीस नक्सलवाद के खिलाफ बोलते हैं। नक्सलवाद भयंकर असमानता और अन्याय से उपजता है। ऐसे में इस अतिवादी प्रवृत्ति को खत्म करने का एकमात्र उपाय इस असमानता को खत्म करना है। ऐसे कानून बनाने से यह प्रवृत्ति खत्म नहीं होगी।
अंत में यही कहूंगा कि कोई भी सरकार यदि समाजहितों के विरुद्ध होगी तो ‘समाज’ में विद्रोह पैदा करने का अधिकार हर एक को है। यह अधिकार ही हर देश में राष्ट्रीय आंदोलन की बुनियाद है। देश में स्वतंत्रता की लड़ाई इसी सिद्धांत पर लड़ी गई थी। इंदिरा गांधी के खिलाफ जयप्रकाश नारायण का आंदोलन इसी सिद्धांत पर चलाया गया था। समाज में विद्रोह नहीं होना चाहिए, ‘जन सुरक्षा’ कानून का यह सिद्धांत राष्ट्रविरोधी और लोकतंत्र विरोधी है।
अपने ही पापी कर्मों से सरकार डर गई है। लोग इस सरकार को उखाड़ न फेंके, इसीलिए दक्षिणपंथियों (जो कायर हैं) ने वामपंथियों के खिलाफ इस कागजी हथियार का इस्तेमाल किया है।
