मेडिकल एडमिशन के लिए आयोजित ‘नीट’ परीक्षा का पेपर इस साल भी लीक होने के कारण केंद्र सरकार की बची-खुची साख की धज्जियां एक बार फिर बीच चौराहे पर उड़ गई हैं। ३ मई को हुआ ‘नीट’ का पेपर परीक्षा से पहले ही लाखों रुपयों में बाजार में खुलेआम बेचा गया। देशभर के अमीर विद्यार्थियों के अभिभावकों ने बिचौलियों और दलालों के माध्यम से उसे खरीदा। जब देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा के प्रश्नपत्र की देशभर में बिक्री हो रही थी, तब सरकारी तंत्र चैन की नींद सो रहा था। कुछ ईमानदार छात्रों ने ही इस पेपर लीक का भंडाफोड़ किया, जिसके कारण सरकार पर ‘नीट’ परीक्षा रद्द करने की नौबत आ गई। ‘एनटीए’ के महानिदेशक महोदय ने कहा है कि यह परीक्षा दोबारा आयोजित करते समय हम छात्रों से फिर से पंजीकरण शुल्क (रजिस्ट्रेशन फीस) नहीं लेंगे। २२ लाख विद्यार्थियों पर ‘माई-बाप’ सरकार का यह बहुत बड़ा उपकार ही माना जाना चाहिए! शहरी छात्रों को छोड़ दें, तो ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले युवक-युवतियों को सौ-दो सौ किलोमीटर की दूरी तय करके परीक्षा केंद्रों तक आना पड़ता है। उसके लिए यात्रा का खर्च, ठहरने का खर्च और ऊपर से कड़ी मेहनत कर रात-रातभर जागकर दी गई परीक्षा को दोबारा नए सिरे से देना, इसका लाखों विद्यार्थियों पर कितना मानसिक तनाव पड़ेगा, क्या इसका अंदाजा एनटीए और केंद्र सरकार के शिक्षा विभाग को है? ‘नीट’ यानी डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले देश के लाखों युवाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण परीक्षा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने इस परीक्षा का सचमुच तमाशा बनाकर रख दिया है। ‘नीट’ की परीक्षा आयोजित करने वाली नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) में ही कहीं न कहीं बड़ा छेद हो गया है, जिसे भरने के बजाय सरकार केवल दिखावे की कार्रवाई करती है। एनटीए में बैठे गद्दार, शिक्षा का बाजार सजाने वाले कुछ कोचिंग क्लास के संचालक और सरकार के कुछ लोग, इन सबने मिलकर ‘नीट’ परीक्षा के पेपर की खरीद-बिक्री का बाजार सजा रखा है। इस साल भी परीक्षा से एक सप्ताह पहले ही नीट का पेपर
खुलेआम बेचा
गया और देशभर में करोड़ों रुपयों का कारोबार हुआ। एक के द्वारा खरीदा गया पेपर आगे दूसरे को दोगुने दाम पर बेचा गया। टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से लेकर इंस्टाग्राम और व्हॉट्सऐप ग्रुप्स तक पर ‘गेस पेपर’ के नाम से नीट के पेपर धड़ल्ले से उपलब्ध थे। हफ्ताभर पहले जब इस पेपर लीक की भनक लगी थी, तभी यदि एनटीए ने ऐन वक्त पर पेपर बदल दिया होता, तो परीक्षा का व्यापार करने वाले ‘सौदागर’ औंधे मुंह गिर जाते। लेकिन एनटीए ने ऐसा न करते हुए ‘नीट’ परीक्षा को जबरदस्ती आगे बढ़ाया। क्या इसके पीछे कोई ऐसी साजिश थी कि शोर नहीं मचा तो अपराध पच जाएगा और करोड़ों का लेन-देन भी बच जाएगा? एक तरफ सरकार जनता को किफायत बरतने की सलाह देती है और दूसरी तरफ पेपर लीक की गलती के कारण दोबारा हजार-पांच सौ करोड़ खर्च करके नए सिरे से परीक्षा लेती है, इसे क्या कहा जाए? २०१७, २०२१, २०२४ और अब २०२६ में भी ‘नीट’ का पेपर लीक हुआ है। बार-बार होने वाले इस पेपर लीक के पीछे एक बड़ा आर्थिक गणित छिपा है; लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार उसे खोदकर निकालना ही नहीं चाहती। निजी मेडिकल कॉलेजों में एक-दो करोड़ रुपए खर्च करके ‘पेमेंट सीट’ लेने के बजाय, यदि २५-३० लाख में ‘नीट’ का लीक पेपर खरीद लिया जाए, तो आपके सवा करोड़ रुपए बच जाएंगे, ऐसा गणित पेपर लीक रैकेट के अपराधी विद्यार्थियों के माध्यम से संपन्न अभिभावकों तक पहुंचाते हैं। इस पूरे खेल में मध्यस्थ की भूमिका कुछ विशिष्ट निजी कोचिंग क्लासेस निभाते हैं। इन क्लासेस को भी अपनी दुकानें चलाने के लिए ‘देखो हमारे छात्रों ने वैâसे शत-प्रतिशत अंक प्राप्त किए!’ जैसे विज्ञापन करने होते हैं। ‘विद्यार्थी’ रूपी ‘ग्राहकों’ को अपनी ओर खींचने के लिए होर्डिंग्स लगाकर अगले साल का शैक्षणिक बाजार गर्म करना होता है। इसी उद्देश्य से पेपर लीक करने के लिए ‘नीट’ की परीक्षा लेने वाली ‘एनटीए’ और जहां ये पेपर छपते हैं, उन प्रेस तक उनके अपने
गुर्गे तैनात
किए जाते हैं। इस साल भी यही हुआ। महाराष्ट्र के नासिक, अहिल्यानगर, पुणे, लातूर के साथ-साथ केरल से लेकर हरियाणा, बिहार, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर तक पेपर लीक के तार जुड़े हुए दिख रहे हैं। देशभर में करीब ५ लोगों को सीबीआई ने गिरफ्तार किया। ‘नीट’ के पेपर बार-बार लीक होते हैं और सरकार यह मामला जांच के लिए सीबीआई को सौंप देती है, देशभर में छापे पड़ते हैं, गिरफ्तारियां होती हैं, पुरानी परीक्षा रद्द कर नई परीक्षा ली जाती है। समय बीतने पर पेपर लीक मामले के सभी आरोपी जमानत पर छूट जाते हैं। अगली ‘नीट’ परीक्षा के समय फिर से सरकार की कस्टडी में पेपर के पैर निकल आते हैं। पेपर लीक करने वाले अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं और ‘नीट’ परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों के लिए बेहद कड़े नियम बनाए गए हैं, ऐसा इस सरकार का कामकाज है। परीक्षार्थी छात्र ढीले-ढाले कपड़े ही पहनें, बूट न पहनें, पायजामा ही पहनें, घड़ी और जैकेट या बहुत जेबों वाली पोशाक नहीं चलेगी, पीने के पानी की बोतल पारदर्शी होनी चाहिए ऐसे एक नहीं, अनेक नियम विद्यार्थियों के लिए हैं। लेकिन परीक्षा की पारदर्शिता का क्या? यह एक सीधा सा नियम सरकार क्यों नहीं मानती? ऐसा सवाल अब देश के तमाम युवा छात्र वर्ग और अभिभावकों को सरकार का गिरेबान पकड़कर पूछना चाहिए। ‘फोड़ा-फोड़ी’ (तोड़-फोड़) यह चार अक्षरों का शब्द वर्तमान केंद्र सरकार का मूलमंत्र बन गया है। सरकारें तो क्या, यह सरकार विद्यार्थियों की परीक्षाएं भी बिना ‘फोड़ा-फोड़ी’ के नहीं ले सकती। मेडिकल प्रवेश की ‘नीट’ परीक्षा में हुए पेपर लीक ने इसे एक बार फिर सिद्ध कर दिया है। २२ लाख से अधिक विद्यार्थियों द्वारा दी गई ‘नीट’ परीक्षा सरकार ने रद्द कर दी। वह अब छात्रों को दोबारा देनी होगी। पेपर की खरीद-बिक्री में शामिल न रहने वाले ईमानदार छात्रों को यह तमाशा और मानसिक प्रताड़ना क्यों सहनी चाहिए? ‘नीट’ का पेपर क्यों लीक हुआ? इस प्रश्न का उत्तर देने के बजाय शिक्षा मंत्री कन्नी काट रहे हैं। यह मामला ऐसा है कि सरकार को ही उल्टा लटका देना चाहिए। यदि पेपर लीक से वाकई कोई संबंध नहीं है, तो सरकार भाग क्यों रही है? लाखों विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों का यही सवाल है!
