मुख्यपृष्ठस्तंभविजय-विमर्श :  सत्ता को अब नैतिक संकोच की आवश्यकता नहीं रही?

विजय-विमर्श :  सत्ता को अब नैतिक संकोच की आवश्यकता नहीं रही?

विजयशंकर चतुर्वेदी

पश्चिम बंगाल में २०२६ विधानसभा चुनाव की प्रक्रिया का संचालन करने वाले मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल (१९९० बैच आईएएस) को चुनाव परिणाम आने के महज दो दिन बाद नई भाजपा-नीत सरकार ने मुख्य सचिव नियुक्त कर दिया। यह केवल एक प्रशासनिक नियुक्ति नहीं है; यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और सत्ता के नैतिक व्यवहार से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। लोकतंत्र केवल संविधान, नियमों और प्रक्रियाओं से संचालित नहीं होता; वह उन अदृश्य मर्यादाओं पर भी टिकता है जिन्हें सत्ता स्वयं पर लागू करती है। जब शासन इन मर्यादाओं से दूरी बनाने लगे, तब संस्थाओं की वैधानिक शक्ति बनी रह सकती है, लेकिन उनकी नैतिक विश्वसनीयता धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है।
संस्थागत निष्पक्षता पर प्रश्न
यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण, नागरिकता संबंधी आशंकाओं और प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर पहले से ही विवाद और अविश्वास का वातावरण मौजूद था। ऐसे परिदृश्य में चुनाव प्रक्रिया की निगरानी करने वाले अधिकारी का तत्काल राज्य के सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर पहुंचना स्वाभाविक रूप से सवाल पैदा करता है।
यहां प्रश्न किसी व्यक्ति की क्षमता, अनुभव या कानूनी पात्रता का नहीं है। प्रश्न उस संस्थागत दूरी का है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में आवश्यक मानी जाती है। चुनावी प्रशासन से जुड़ी भूमिका केवल तकनीकी दायित्व नहीं होती; वह सार्वजनिक विश्वास का संवेदनशील क्षेत्र भी होती है। इसलिए चुनावी प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और प्रत्यक्ष सत्ता-संरचना के बीच एक नैतिक दूरी बनाए रखना लोकतांत्रिक शुचिता का हिस्सा माना जाता रहा है।
सत्ता के लालच में बदलती राजनीतिक संस्कृति
इस तरह के निर्णय अक्सर अपने तात्कालिक प्रशासनिक अर्थ से कहीं बड़े राजनीतिक संकेत देते हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा की यह पहली सरकार है और उसने डेढ़ दशक पुराने तृणमूल शासन को समाप्त किया है। इसलिए राज्य का पूरा राजनीतिक वातावरण पहले से ही अत्यधिक प्रतीकात्मक और संवेदनशील है। ऐसे में यह नियुक्ति एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया भर नहीं रह जाती; यह सत्ता के आत्मविश्वास और उसके राजनीतिक दृष्टिकोण का सार्वजनिक प्रदर्शन भी बन जाती है।
इससे यह संदेश उभरता है कि वर्तमान सत्ता-राजनीति में संस्थागत मर्यादाओं, संवैधानिक परंपराओं और सार्वजनिक संकोच की उपयोगिता लगातार कम होती जा रही है। राजनीतिक शक्ति स्वयं में इतनी निर्णायक मान ली गई है कि उसके सामने नैतिक संतुलन की आवश्यकता गौण दिखाई देने लगती है। यह प्रवृत्ति किसी एक दल तक सीमित नहीं मानी जानी चाहिए, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में इसका सबसे स्पष्ट और आक्रामक रूप दिखाई देता है।
लोकतंत्र में प्रतीकों का भी महत्त्व
लोकतंत्र केवल औपचारिक प्रक्रियाओं का ढांचा नहीं है; वह प्रतीकों, धारणाओं और सार्वजनिक मनोविज्ञान पर भी आधारित होता है। कई बार कोई निर्णय कानूनी रूप से पूरी तरह वैध होता है, फिर भी वह व्यापक असहजता पैदा करता है। कारण यह है कि लोकतंत्र में जनता केवल यह नहीं देखती कि क्या हुआ; वह यह भी देखती है कि वह वैâसे और किस समय हुआ।
मनोज कुमार अग्रवाल वरिष्ठ अधिकारी हैं और सरकार का यह तर्क भी अपनी जगह मौजूद है कि नियुक्ति वरिष्ठता तथा प्रशासनिक अनुभव के आधार पर की गई है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में कुछ प्रश्न केवल प्रशासनिक नहीं होते। चुनावी प्रक्रिया की निगरानी करने वाले अधिकारी को तत्काल सत्ता-संरचना में सर्वोच्च प्रशासनिक भूमिका मिलना स्वाभाविक रूप से संदेह और अटकलों को जन्म देता है, भले ही उसके समर्थन में नियम मौजूद हों।
यही कारण है कि अनेक परिपक्व लोकतंत्रों में चुनावी संस्थाओं से जुड़े अधिकारियों और प्रत्यक्ष राजनीतिक सत्ता के बीच एक ‘कूलिंग-ऑफ दूरी’ जैसी अनौपचारिक परंपराएं महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति पर आरोप लगाना नहीं होता, बल्कि संस्थाओं को सार्वजनिक संदेह से बचाए रखना होता है। लोकतंत्र में विश्वास केवल निष्पक्षता से नहीं बनता; वह प्रक्रिया की विश्वसनीयता की सामूहिक अनुभूति से बनता है।
विश्वास का संकट सबसे बड़ा संकट
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति चुनाव नहीं, बल्कि चुनावों पर जनता का भरोसा होता है। चुनाव आयोग, मुख्य निर्वाचन अधिकारी और प्रशासनिक तंत्र केवल संवैधानिक व्यवस्थाएं नहीं हैं; वे उस विश्वास-शृंखला के केंद्रीय स्तंभ हैं जिस पर लोकतांत्रिक वैधता टिकी रहती है। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि सत्ता और संस्थाओं के बीच की सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं, तो संकट केवल राजनीतिक नहीं रहता; वह संस्थागत विश्वास के क्षरण में बदल जाता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं हमेशा कानून के सहारे ही नहीं बचतीं। कई बार वे आत्मसंयम, मर्यादा और सार्वजनिक शुचिता की उन परंपराओं से सुरक्षित रहती हैं, जिन्हें संविधान में अलग से लिखा नहीं जाता। जब सत्ता इन अनकहे संतुलनों की आवश्यकता महसूस करना बंद कर देती है, तब संस्थाएं औपचारिक रूप से कायम रहते हुए भी भीतर से कमजोर होने लगती हैं।
संवैधानिक व्यवस्था का नैतिक पक्ष
विपक्षी दलों ने इस नियुक्ति को ‘कृपा के बदले पुरस्कार’ कहा है, जबकि भाजपा इसे नियम-सम्मत प्रशासनिक निर्णय बता रही है। दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक तर्क रख सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र में कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं, जो कानूनी बहस से आगे जाकर सार्वजनिक नैतिकता के दायरे में प्रवेश कर जाते हैं।
भारत की सबसे बड़ी ताकत केवल उसका संविधान नहीं, बल्कि दशकों में निर्मित उसकी संस्थागत विश्वसनीयता रही है। यह भरोसा अदालतों, चुनावों, प्रशासन और संवैधानिक प्रक्रियाओं के प्रति जनता की दीर्घकालिक आस्था से बना है। इसलिए भारत जैसे लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं होता; संस्थाओं को ऐसी दूरी और संतुलन भी बनाए रखना पड़ता है जिससे जनता का विश्वास अप्रभावित रहे।
क्योंकि अंतत: लोकतंत्र कानून से कम और भरोसे से अधिक चलता है।
(विजयशंकर चतुर्वेदी वरिष्ठ पत्रकार, कवि और लेखक हैं। वे सामाजिक मुद्दों तथा भू-राजनीतिक मामलों पर नियमित लेखन करते हैं।)

 

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