के.पी. मलिक
भारत जैसे लोकतंत्र में प्रधानमंत्री सिर्फ एक राजनीतिक दल का नेता नहीं होता, वह राष्ट्र की सामूहिक चेतना, भरोसे और उम्मीदों का प्रतीक माना जाता है। उसकी अपील में केवल प्रशासनिक शक्ति नहीं, बल्कि नैतिक वजन भी होता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब देश संकट में पड़ा, जनता ने प्रधानमंत्री की बात को आदेश नहीं बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य मानकर स्वीकार किया। कभी युद्धकाल में सोना दान किया गया, कभी अनाज बचाने के लिए व्रत रखे गए, कभी आर्थिक संकट में त्याग को राष्ट्रभक्ति समझा गया।
लेकिन आज तस्वीर बदलती दिख रही है। जब प्रधानमंत्री जनता से ‘सोना मत खरीदो’, ‘कम खर्च करो’, ‘त्याग करो’ जैसी अपील करते हैं तो सोशल मीडिया पर समर्थन से ज्यादा व्यंग्य दिखाई देता है। सवाल यह नहीं कि लोग मजाक क्यों उड़ा रहे हैं। असली सवाल यह है कि क्या देश में प्रधानमंत्री पद का नैतिक इकबाल कमजोर पड़ गया है? और अगर हां, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
सिर्फ जनता क्यों?
लोकतंत्र में भरोसा भाषणों से नहीं, अनुभवों से बनता है। जनता त्याग तब करती है, जब उसे लगता है कि सत्ता भी त्याग कर रही है। लेकिन यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि हर संकट का बोझ सिर्फ उसी के कंधे पर डाला जा रहा है जबकि सत्ता अपने प्रचार, इवेंट और वैभव में कोई कमी नहीं कर रही तो अपील का असर खत्म होने लगता है। यही आज की सबसे बड़ी समस्या है।
बीते कुछ वर्षों में आम आदमी ने लगातार महंगाई, बेरोजगारी, टैक्स के दबाव और घटती आय का सामना किया है। पेट्रोल-डीजल महंगा हुआ, खाद्य पदार्थ महंगे हुए, शिक्षा और स्वास्थ्य की लागत बढ़ी। ऐसे माहौल में जब सरकार जनता से फिर ‘संयम’ और ‘त्याग’ मांगती है तो लोगों के मन में स्वाभाविक सवाल उठता है कि आखिर त्याग सिर्फ जनता ही क्यों करे? सत्ता क्यों नहीं? यहीं से राजनीतिक नेतृत्व की विश्वसनीयता पर चोट शुरू होती है। लोकतंत्र में जनता केवल शब्द नहीं देखती, वह सत्ता का आचरण भी देखती है। यदि सरकार एक तरफ जनता से मितव्ययिता की अपील करे और दूसरी तरफ विशाल प्रचार अभियानों, महंगे आयोजनों और राजनीतिक इवेंट्स पर खुलकर खर्च करे, तब संदेश कमजोर पड़ जाता है। जनता को उस समय अपील नहीं, विरोधाभास दिखाई देता है।
इसके पीछे एक और बड़ा कारण यह भी है कि राजनीति का अत्यधिक ‘इवेंट मैनेजमेंट’ में बदल जाना। आज शासन कम और छवि निर्माण ज्यादा दिखाई देता है। हर नीति को भावनात्मक पैकेजिंग में लपेटकर पेश किया जाता है, लेकिन जमीन पर परिणाम कमजोर दिखते हैं। जब लगातार बड़े-बड़े दावे किए जाएं और आम आदमी की जिंदगी में अपेक्षित सुधार न दिखे तो धीरे-धीरे भाषणों का असर कम होने लगता है। फिर वही स्थिति आती है जहां प्रधानमंत्री की अपील भी मीम और ट्रोल का विषय बन जाती है।
सोशल मीडिया ने इस अविश्वास को और तेज किया है। पहले सत्ता की बात एकतरफा जनता तक पहुंचती थी। अब जनता तुरंत प्रतिक्रिया देती है। लोग पुराने वादे याद दिलाते हैं, आंकड़े निकालते हैं, विरोधाभास पकड़ते हैं। लोकतंत्र में यह बुरा नहीं है, बल्कि जवाबदेही का हिस्सा है। लेकिन जब व्यंग्य सम्मान पर भारी पड़ने लगे तो यह संकेत होता है कि जनता और नेतृत्व के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ रही है।
उल्टा पड़ा महिमामंडन
इस स्थिति के लिए केवल जनता को दोष देना आसान होगा, लेकिन ईमानदारी से देखें तो सबसे बड़ी जिम्मेदारी खुद राजनीतिक व्यवस्था की है। वर्षों तक राजनीति ने व्यक्तित्व पूजा को बढ़ावा दिया, नेताओं को ‘अचूक’ और ‘महानायक’ की तरह प्रस्तुत किया। लेकिन जब जमीनी समस्याएं बढ़ीं और अपेक्षाएं टूटीं तो वही महिमामंडन उल्टा पड़ने लगा। लोकतंत्र में सम्मान कमाया जाता है, लगातार प्रचार से स्थायी नहीं बनाया जा सकता।
यह भी सच है कि भारतीय समाज पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक और सवाल पूछने वाला हो चुका है। अब जनता केवल भावनात्मक अपीलों से संतुष्ट नहीं होती। वह पूछती है कि आर्थिक संकट क्यों आया? नीतिगत गलतियां किसकी थीं? चुनावी लाभ के लिए जरूरी पैâसले टाले क्यों गए? अगर सरकार जनता से त्याग मांग रही है तो क्या सत्ता ने भी अपने विशेषाधिकारों में कटौती की?
प्रधानमंत्री पद का सम्मान केवल संवैधानिक शक्ति से नहीं चलता, बल्कि नैतिक विश्वास से चलता है। और नैतिक विश्वास तब बनता है जब जनता को लगे कि नेता उसके साथ खड़ा है, उसके ऊपर नहीं। जब जनता को लगे कि संकट साझा है, केवल उस पर थोपा नहीं गया।
आज यदि प्रधानमंत्री की अपील पर लोग गंभीर होने के बजाय व्यंग्य कर रहे हैं तो यह केवल सोशल मीडिया की बदतमीजी नहीं है। यह उस गहरे अविश्वास का संकेत है, जो धीरे-धीरे व्यवस्था और नागरिकों के बीच पनप रहा है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति है, क्योंकि जब जनता अपने सर्वोच्च निर्वाचित पद की बात को गंभीरता से लेना बंद कर दे तो केवल व्यक्ति नहीं, संस्थाओं की साख भी कमजोर होने लगती है।
इसलिए सवाल सिर्फ इतना नहीं कि ‘जनता प्रधानमंत्री की बात क्यों नहीं मान रही?’ असली सवाल यह है कि क्या राजनीति ने खुद अपनी विश्वसनीयता इतनी खो दी है कि अब अपीलों में नैतिक शक्ति बची ही नहीं? और अगर ऐसा है तो यह किसी एक नेता की नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र की चेतावनी है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
