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गन्ना, चीनी और सत्ता के खेल में आखिर फायदा किसका? …गन्ने के नए कानून के बहाने किसानों पर नियंत्रण कर रही है सरकार?

के. पी. मलिक

भारत को चीनी उत्पादक और पश्चिमी यूपी को यूं ही “शुगर बाउल” नहीं कहा जाता। यहां गन्ना सिर्फ फसल नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जातीय समीकरण और राजनीतिक सत्ता का आधार है। मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, बागपत, सहारनपुर, बिजनौर और बुलंदशहर जैसे जिलों में गन्ने की खेती लाखों परिवारों की आजीविका तय करती है। यही वजह है कि जब भी गन्ने से जुड़ा कोई कानून बदलता है, उसका असर सिर्फ खेत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पंचायत से लेकर विधानसभा तक महसूस किया जाता है।

दरअसल केंद्र सरकार गन्ना किसानों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के नाम पर करीब छह दशक पुराने शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर 1966 को बदलकर नया शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर 2026 का मसौदा लेकर आई है, जिस पर 20 मई तक सुझाव मांगे गए हैं। नए मसौदे में चीनी मिलों के लिए गन्ना खरीद के 14 दिनों के भीतर किसानों को पूरा भुगतान करना अनिवार्य किया गया है। तय समय में भुगतान नहीं होने पर बकाया राशि पर 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का प्रावधान भी रखा गया है।

लेकिन सरकार द्वारा प्रस्तावित इस नए मसौदे को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। कई किसान नेताओं का कहना है कि यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि “गन्ना किसानों के संविधान” को बदलने की कोशिश है। क्योंकि पिछले लगभग 60 वर्षों से यही व्यवस्था गन्ने की खरीद, मूल्य निर्धारण, आपूर्ति और चीनी मिलों की जिम्मेदारियों को तय करती रही है।

सबसे बड़ा सवाल इस प्रक्रिया को लेकर उठ रहा है। आरोप है कि मसौदा तैयार करने और चर्चा में सरकारी अधिकारियों और उद्योग से जुड़े लोगों को शामिल किया गया, लेकिन किसानों को इससे बाहर रखा गया। किसान संगठनों का कहना है कि जिस कानून का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ेगा, उनकी राय लिए बिना बदलाव क्यों किया जा रहा है?

सरकार और उद्योग जगत का तर्क है कि चीनी उद्योग संकट में है। चीनी उत्पादन में गिरावट आ रही है, मिलों को पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण गन्ना नहीं मिल रहा, एथेनॉल नीति के कारण उत्पादन ढांचा बदल रहा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। दूसरी ओर किसान पक्ष का कहना है कि असली समस्या कृषि नीति, बीज और शोध व्यवस्था की विफलता है। यदि बेहतर गन्ना बीज समय पर नहीं मिलेगा, सिंचाई लागत लगातार बढ़ती रहेगी और भुगतान महीनों तक अटका रहेगा, तो किसान आखिर इस खेती में क्यों बना रहेगा?

पश्चिम यूपी का किसान केवल खेत की कमाई पर निर्भर नहीं रहता। कई इलाकों में गुड़ बनाने वाले कोल्हू और छोटी खांडसारी इकाइयां किसानों की आय का सहारा हैं। यदि नई व्यवस्था बड़े उद्योगों के पक्ष में जाकर इन स्थानीय संरचनाओं को कमजोर करती है, तो इसका असर केवल आय पर नहीं बल्कि पूरे ग्रामीण सामाजिक ढांचे पर पड़ेगा।

गन्ना किसानों की सबसे बड़ी समस्या वर्षों से भुगतान को लेकर रही है। कई बार किसानों का पैसा महीनों और वर्षों तक अटका रहता है। कानून में ब्याज का प्रावधान जरूर है, अदालतें आदेश भी देती रही हैं, लेकिन अधिकांश किसानों तक ब्याज नहीं पहुंचता। सवाल यह भी है कि आखिर ऐसी स्वचालित व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जाती, जिसमें तय समय सीमा के बाद ब्याज सीधे किसान के खाते में पहुंच जाए?

यह मुद्दा आर्थिक होने के साथ-साथ राजनीतिक भी है। पश्चिम यूपी की राजनीति लंबे समय से गन्ने के इर्द-गिर्द घूमती रही है। चौधरी चरण सिंह की किसान राजनीति से लेकर राष्ट्रीय लोकदल की सामाजिक पकड़ तक, गन्ना हमेशा सत्ता समीकरण का केंद्र रहा है। भाजपा ने भी पिछले एक दशक में पश्चिम यूपी में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए गन्ना भुगतान और चीनी मिलों को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है।

लेकिन यदि किसानों के भीतर यह धारणा मजबूत होती है कि नई व्यवस्था मिल मालिकों के पक्ष में झुकी हुई है, तो इसका असर चुनावी राजनीति पर भी पड़ सकता है। खासकर ऐसे समय में, जब खेती की लागत बढ़ रही है, नौजवान खेती छोड़ रहे हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले से दबाव में है।

सरकार की प्राथमिकता अब केवल चीनी उत्पादन तक सीमित नहीं रही। एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के कारण गन्ना अब ऊर्जा अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर तेल आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है। इसका लाभ उद्योग को मिलता दिखाई दे रहा है, लेकिन किसान पूछ रहा है कि जब मिलों की कमाई बढ़ रही है तो उसका भुगतान समय पर क्यों नहीं हो रहा?

दरअसल यह पूरा विवाद एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है कि भारत की कृषि नीतियां आखिर किसके लिए बन रही हैं — किसान के लिए, उद्योग के लिए या बाजार के लिए? यदि नई व्यवस्था में किसान की भागीदारी कमजोर होती है, भुगतान सुरक्षा मजबूत नहीं होती और छोटे किसानों की वैकल्पिक संरचनाएं खत्म होती हैं, तो यह सुधार नहीं बल्कि ग्रामीण शक्ति संतुलन का पुनर्गठन होगा।

फिलहाल सबसे बड़ी जरूरत यही है कि इस मसौदे को केवल सरकारी फाइलों तक सीमित न रखा जाए। इसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाया जाए और किसान संगठनों, सहकारी समितियों, कृषि विशेषज्ञों तथा उपभोक्ताओं से व्यापक संवाद किया जाए। क्योंकि गन्ना केवल चीनी नहीं बनाता, बल्कि पश्चिम यूपी की राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था की धुरी भी है। और उस धुरी को बिना संवाद के बदलना भविष्य में बड़े असंतोष को जन्म दे सकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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