चिट्ठियां

सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं थीं,
अरमान समेटे होती थीं चिट्ठियां।
दिल के जज़्बात से भीगी हुई,
मीठी जुबां सी होती थीं चिट्ठियां।
कभी इजहार-ए-इश्क बनकर,
कभी मां का दुलार थीं चिट्ठियां।
हर दूरी को मिटा देने वाली,
ख़ास असर देती थीं चिट्ठियां।
अफसोस, इस डिजिटल युग में,
खो गईं वो धीमी सी कहानियां।
बचपन, रिश्ते, यादें, लम्हे,
सब संजोए रखती थीं चिट्ठियां।
सरकारी आदेशों की भाषा बनकर,
भावों से खाली हो गईं चिट्ठियां।
व्हॉट्सऐप की रफ़्तार में खोकर,
बहुत याद आती हैं वो चिट्ठियां।
-मुनीष भाटिया
मोहाली

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