डाॅ. रवीन्द्र कुमार
हाल के दिनों में एक केस खबर बनी थी, जिसमें एक महामहिम के घर से जलते हुए नोट बरामद हुए थे। उनका कहना था कि यह उनका घर है ही नहीं, बल्कि आउट हाउस है। अब आउट हाउस में होने वाली किसी गतिविधि के लिए वे कैसे जिम्मेवार हो जाते हैं। बात सही भी है। वडोदरा में एक अधिकारी के घर के आउट हाउस से शराब की भट्टी पकड़ी गई थी। अधिकारी महोदय का कहना था कि पहला, तो वे शराब पीते नहीं है ये बात सारा शहर जानता है, दूसरे आउट हाउस में कौन क्या कर रहा है? उनको कैसे पता चलेगा? जब पता नहीं चलेगा तो जिम्मेवारी भी उनकी नहीं।
इसी तर्ज पर अब पता चला है कि पुलिस ने कोर्ट में शिकायत ही कर दी है कि एक जज साब, जो है सो, अपने जिम जाने का खर्च हम पुलिस वालों से उठवाते हैं। जिम जाएं वो और जिम का बिल भर-भर के पतले हो रहे हैं पुलिस वाले। मुझे पता नहीं इस बात के लिए जज साब क्या बचाव देंगे। मसलन वह कह सकते हैं कि उनके कोर्ट में वादी, प्रतिवादी किसी न किसी हैसियत में लोकल पुलिस की इनवाॅलमेंट रहती है। अब एक स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य दिमाग रहता है। अतः पुलिस के लिए यह जरूरी है कि उनके केस के टाइम पर जज साब का माइंड स्वस्थ्य रहे। नहीं तो क्या नहीं हो सकता। पुलिस वाले भी यही सब सोच- सोच कर बिल भरते रहे। यह एक प्रकार कि रियायत थी जो कि जज साब अपने इगलास में पुलिस को देते होंगे। अन्यथा पुलिस को इंन्सल्ट करने के लिए जज साब के पास बहुत से उपकरण होते हैं। मैंने स्वयं एक केस में देखा कि केस की बात तो बाद में, जज साब ने पुलिस वाले भाई साब को इसी बात पर खींच दिया कि तुम्हारी यूनिफ़ाॅर्म कहां है? पहनकर क्यों नहीं आए? तब उस पुलिस भाईसाब ने बताया कि हम खुफिया पुलिस हैं और हमें यह छूट है, फिर उन्होंने दूसरा गोला दागा। ये एक लूज पेपर लहराते हुए क्या घूम रहे हो? किसी फाइल कवर में लाना चाहिए। ये कोई तरीका है ? ये क्या तरीका है? आदि-आदि। पुलिस ने कहा भी है कि जज साब अपने इगलास में पुलिस को अपमानित करने से बाज नहीं आते थे।
इतना ही नहीं पुलिस का यह भी कहना है कि जज साब के यहां रोज सुबह पुष्प (फूल) जाते हैं। पूजा जज साब के यहां होती है, मगर फूलों का महीने के महीने बिल हम पुलिस वाले देते हैं। अब यह तो ज्यादती हो गई बेचारे पुलिस वालों को कोई पुन्य भी नहीं मिल रहा होगा, अब भगवान को क्या पता चल रहा होगा कि फूल निकटवर्ती थाने से आए हैं। अतः इसका कुछ पुण्य तो एस. एच.ओ. महोदय और उनकी टीम को भी दिया जाए। आखिर महीने भर का अकेले फूलों का बिल तीन हज़ार आता है।
अब जब जिम ने जज साब का जिस्म फिट कर दिया तो जज साब को और भी सूझने लगा। जैसे कि क्यों न क्रिकेट खेला जाए। फौरन से पेश्तर थाने में खबर करा दी गई कि जज साब अब से क्रिकेट भी खेला करेंगे। अतः उनके लिए मेरठ से तुरंत क्रिकेट के बल्ले और ग्लव्ज का इंतजाम किया जाए। बिल था कोई 21 हज़ार रुपए का। बस यही एक पल था, जब पुलिस ने बल्ले-बल्ले कहने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने बात की नजाकत को समझते हुए। सुना है जज साब का ट्रांसफर कर दिया है दूसरे कोर्ट में। पता नहीं अब उनकी पूजा का क्या होगा? क्या पूजा पुष्पविहीन हो जाएगी या वो जो एक भजन है “पूजा की मैं बिधि न जानू…प्रभु जी मेरे अवगुण चित्त न धरो” तर्ज पर चलती रहेगी। क्रिकेट का क्या होगा? उन ग्लव्ज का क्या? और तो और जिम की मेम्बरशिप का क्या होगा ? इन सबसे बढ़ कर एक सवाल जज साब की बॉडी का क्या होगा?
