मुख्यपृष्ठस्तंभ”खाना, खजाना और खजाना छीनती प्यास”

”खाना, खजाना और खजाना छीनती प्यास”

भरतकुमार सोलंकी

क्या आपने कभी सोचा है कि जो व्यंजन हम टीवी पर देख-देखकर ललचाते हैं, उनकी शुरुआत कहां से होती है? क्या वह सिर्फ किसी शेफ की रसोई से होती है या खेत में बहती उस पसीने की धार से, जहां किसान धरती मां को सींचकर वह अनाज पैदा करता है, जो हमारे थाली में सजता है?
मास्टरशेफ इंडिया, खाना खजाना, द ग्रेट इंडियन रसोई या फिर “राजा, रसोई और अन्य कहानियां” जैसे शो हर घर में उत्सुकता से देखे जाते हैं। वे न केवल मनोरंजन देते हैं, बल्कि टेलीविजन चैनलों की टीआरपी भी आसमान पर पहुंचा देते हैं। उनके पीछे बड़े-बड़े ब्रांड्स, करोड़ों के विज्ञापन और अंतरराष्ट्रीय स्तर के व्यंजन होते हैं। लेकिन क्या आपने कभी देखा है कि इन शो के किसी भी प्रायोजक ने इस बात का जिक्र किया हो कि जिस मिट्टी और पानी से यह अनाज पैदा होता है, उसकी हालत क्या है?
क्या उन चमचमाते किचन सेट्स और रंगीन प्लेटों के पीछे किसी ने कैमरा घुमा कर यह दिखाया है कि जिस किसान ने वह दाल, चावल, मसाले, सब्जी उगाई है, उसके गांव में पीने का पानी तक नहीं है? क्या उन शो में कभी उस धरती का जिक्र हुआ है, जो हर दिन सूखती जा रही है, जिससे अगली पीढ़ी का खाना शायद सिर्फ शोपीस बनकर टीवी स्क्रीन पर ही दिखाई दे?
क्या शो के बीच चलने वाले विज्ञापनों में कभी किसी जल प्रबंधन योजना की बात हुई है? क्या किसी प्रायोजक ब्रांड ने यह संकल्प लिया है कि वह अपने मुनाफे का कुछ अंश खेतों तक पानी पहुंचाने में लगाएगा?
पानी सिर्फ पीने के लिए नहीं, बल्कि खाने के लिए भी जरूरी है। मिट्टी की नमी के बिना न गेहूं उगता है, न मसाले महकते हैं। लेकिन अफसोस, इन शो में दिखाई देने वाली हर रेसिपी में सब कुछ होता है-केवल ‘पानी’ की कहानी नहीं होती।
क्या यह समय नहीं आ गया है, जब सरकार और इन बड़े-बड़े फूड शो के प्रायोजक मिलकर यह संकल्प ले कि वे जल संरक्षण और प्रबंधन को अपने शो के माध्यम से राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाएंगे? क्या दर्शकों को स्वाद के साथ-साथ संवेदना भी नहीं परोसी जानी चाहिए?
क्या अब वो दौर नहीं आ गया है जब “मास्टरशेफ” से लेकर “खाना खजाना” तक हर शो के पीछे यह प्रश्न गूंजे-”जब खेतों में पानी नहीं बचेगा तो प्लेटों में पकवान कहां से आएंगे?”
अब हमें मिट्टी को नमन करने की जरूरत है।
अब हमें जल को प्रणाम करने की जरूरत है।
अब हमें स्वाद से आगे सोचने की जरूरत है।
आपकी थाली में जो स्वाद हैं, वो खेत की मिट्टी और किसान की प्यास से पैदा होते हैं।
कभी उस प्यास की भी कहानी टीवी पर दिखाई दे-क्या यह ज़्यादा जायज नहीं होगा?

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