मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिमाटी के गीत : अवधी लोकगीतों का गुलदस्ता

माटी के गीत : अवधी लोकगीतों का गुलदस्ता

राजेश विक्रांत

कवयित्री सत्यभामा सिंह जिया की पुस्तक माटी का गीत अवधी लोकगीतों का एक सुंदर सा गुलदस्ता है जो हमें ग्रामीण परंपराओं व उत्सवों की महक से सराबोर करता है। भारतवर्ष में लोकगीतों की एक परंपरा है और हिंदू धर्म में जीवन के 16 संस्कार बताए गए हैं। इन 16 संस्कारों के लेकर लोग कवियों ने अद्भुत ढंग के गीत रचे हैं। इसी कड़ी में एक नाम है कवयित्री सत्यभामा सिंह जिया का, जिनकी पुस्तक माटी के गीत को एड राजीव मिश्र मधुकर के प्रकाशन संस्थान प्रतीक पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है।
माटी के गीत में विभिन्न प्रकार के लोकगीत हैं। इसमें कजरी, फगुआ, होली गीत, देवी गीत, विवाह गीत, लचारी, नकटा, बन्ना, गारी, सोहर, जच्चा बच्चा, उठान आदि हैं। मानव जीवन की जितनी परंपराएं हैं, जितने संस्कार हैं, जितने प्रमुख उत्सव हैं उन सब को लेकर कवयित्री ने गीत रचे हैं। जैसे सावन, पर्यावरण, स्त्री शिक्षा, झूला, सती माता, ननदी, होली गीत, बारात निकालने का गीत, सागर खनाई, माड़व छवाई के अवसर पर गाया जाने वाला गीत, शादी की बधाई का गीत, शादी की तैयारी गीत, दही गुड़ करते समय गारी, मंडप में गारी, कोहबर की गारी, बेटी की शादी का गीत, नवजात पुत्र के धरती जगाने का गीत, आदि शामिल है।
माटी के गीत में परंपरा और आधुनिकता का एक खूबसूरत संगम दिखता है इसकी शुरुआत चंद्रयान पर एक लोकगीत से होती है-
सखी चाँद पर भी झंडा फहराय दिया/ परचम लहराय दिया ना..एक बार गए चूक, दूजे बार कुछ न सूझ तीजे बार देखा डंका बजाय दिया परचम लहराय दिया ना.. बढ़ल इसरो का रफ्तार, भयल सपना साकार। चंद्रयान-तीन गौरव बढ़ाय दिया परचम लहराय दिया ना..सारी नारी का अभिमान। बनी रीतू जी महान। चाँद पर अपना विक्रम पहुंचाय दिहा। झंडा फहराय दिहा न।।

कवयित्री ने एक पर्यावरण कजरी के माध्यम से पर्यावरण के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। इस कजरी में नदी पेड़ पहाड़ आदि का महत्व बताया गया है। स्त्री शिक्षा पर भी एक गीत है जिसके माध्यम से एक छोटी बालिका के ऊंचे सपनों की उड़ान का भाव प्रस्तुत किया है जो अपने पिता से पढ़ने की याचना करती है-
पापा हमके स्कुलवा पहुंचाई दा नमवा लिखाई दा ना।। नमवा लिखाई दा बस्ता मंगाई दा। बस्ता मंगाई दा नमवा लिखाई दा। पापा नया ड्रेसवा बनवाई दा। नमवा लिखवाई दा ना।। स्कुलवा जइबे अंग्रेजी पढ़बई, अंग्रेजी पढ़बै, विद्यालय जइबई। एबीसीडी हमके समझाइ दा। नमवा लिखाई दा ना।। पढ़ लिख के पापा कलक्टर बन जईबई… कलक्टर बन जइबे, खेतवा छोड़उबई गऊँआ का नउआं लिखवाई दा ना।।पापा हमके विद्यालय पहुंचाई दा ना।। नमवा लिखाई दा ना।।
कवियत्री सत्यभामा सिंह जिया मूल रूप से जौनपुर उत्तर प्रदेश से संबंधित हैं। और केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक के रूप में सेवानिवृत हुई है। उनकी प्रमुख कृतियां इंद्रधनुष, स्पर्श चेतना का तथा साझा संकलनों में काव्य धारा, जगमगाते खद्योत, लरजते आंसू व शब्द सिंधु गजल हैं। माटी के गीत के जरिए कवयित्री ने ढेर सारे भूले बिसरे लोकगीतों को जबान दी है और पाठकों को लोक का स्वाद मुहैया कराया है।

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