मनोज जरांगे-पाटील ने कहा है कि ‘एकनाथ शिंदे एक भले इंसान हैं।’ बेशक, जरांगे-पाटील ऐसा कह रहे हैं तो शिंदे अच्छे इंसान नहीं बन जाते। इसके लिए अच्छे इंसानों की परिभाषा बदलनी होगी या फडणवीस को अच्छे इंसानों की परिभाषा पर एक और उप-समिति बनानी होगी। जरांगे-पाटील मुंबई आए और आरक्षण के मुद्दे पर भूख हड़ताल और आंदोलन किया। वे सफल रहे। मुख्यमंत्री फडणवीस ने मराठा आंदोलन को संयमित तरीके से संभाला। हालांकि, हर तरफ से उन पर गालियों की बौछार हो रही थी, लेकिन यह मानना होगा कि मुख्यमंत्री फडणवीस विचलित नहीं हुए और अंतत: उन सभी मांगों को स्वीकार कर लिया जिन्हें स्वीकार किया जा सकता था और पाटील और उनके हजारों समर्थकों के अपने गांव लौटने का मार्ग प्रशस्त किया। जरांगे-पाटील ने मराठा आरक्षण के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी। जरांगे-पाटील निश्चित रूप से एक भले इंसान हैं। अगर उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया होता तो मराठा समुदाय कुछ हासिल नहीं कर पाता। इसलिए इस लड़ाई में जरांगे-पाटील का श्रेय बहुमूल्य है, लेकिन यह श्रेय जितना जरांगे को है, उतना ही राज्य के मुख्यमंत्री को भी है। मुख्यमंत्री ने समाधान निकाला और आंदोलन सुखद ढंग से समाप्त हुआ। उच्च न्यायालय द्वारा जरांगे को मुंबई छोड़ने की समय-सीमा दिए जाने के बाद, किसी के पास कुछ नहीं बचा था। अगर पाटील के समर्थक विरोध करने की कोशिश करते तो यह उच्च न्यायालय की अवमानना होती और एक और कानूनी पचड़ा पैदा हो जाता इसलिए मुख्यमंत्री फडणवीस ने आनन-फानन में प्रदर्शनकारियों की अधिकांश मांगें मान लीं। अंतत: मुख्यमंत्री सरकार ही है। मंत्री आदि कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, सरकार मुख्यमंत्री के आदेश पर चलती है। इसका मतलब यह नहीं कि शिंदे, अजीतदादा पवार आदि लोगों को कम आंका जाए, लेकिन शिंदे को अच्छा बताते हुए, मनोज जरांगे-पाटील ने देवेंद्र फडणवीस के बारे में
अतिजहालत भाषा
का इस्तेमाल किया। इन सभी मामलों में मुख्यमंत्री आलोचना के बड़भागी साबित हुए और अन्य लोग ‘अच्छे’ बन गए। यह समझ से परे है। सवाल अच्छे आदमी का नहीं, बल्कि उसकी विचारधारा का है। मराठा समुदाय के आंदोलन के अवसर पर महाराष्ट्र के गांव देहातों से मराठी युवा इकट्ठा हुए। चार-पांच दिनों तक मुंबई की सड़कों और समुद्र किनारे घूमे । उन्होंने गांव से लाई गई चटनी और रोटी सड़क पर बैठकर खाई इसलिए दक्षिण मुंबई के धनिक मंडल ने अब आपत्ति जताई है और उस धनिक मंडल के प्रतिनिधि, सांसद मिलिंद देवड़ा ने मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखा है और आंदोलन के संबंध में अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। सांसद देवड़ा ने दक्षिण मुंबई के मंत्रालय क्षेत्र में ‘पियानो’ बजाया कि भविष्य में किसी भी आंदोलन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। सांसद देवड़ा अमित शाह द्वारा प्रायोजित शिंदे समूह के सांसद हैं और इसीलिए उन्होंने दक्षिण मुंबई में मराठी जनों के आंदोलन का इस तरह विरोध किया। सांसद कहते हैं कि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है, औद्योगिक और व्यावसायिक कार्यालयों आदि का स्थान है। सांसद का यह भी कहना है कि दुनिया के किसी भी बड़े राजधानी शहर में इस तरह के आंदोलन की इजाजत नहीं है, लेकिन देवड़ा का यह कहना पूरी तरह गलत है। अमेरिकी लोग राष्ट्रपति ट्रंप की तानाशाही के खिलाफ सड़कों पर उतर आए और १,६०० जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए। शिकागो, एक व्यापारिक शहर और राज्य, इस आंदोलन का मुख्य केंद्र था। अटलांटा, सेंट लुइस, कैलिफोर्निया, मैरीलैंड और न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन में भी लोग ट्रंप के खिलाफ सड़कों पर उतरे। इतना ही नहीं, अमेरिकी लोकतंत्र के प्रतीक माने जानेवाले ‘कैपिटल हिल’ भवन में भी राष्ट्रपति ट्रंप के समर्थकों ने आंदोलन के नाम पर हिंसा की थी। कई यूरोपीय देशों की राजधानियों में भी
हमेशा ही आंदोलन
होते हैं। राजधानी के शहरों में आंदोलन करना लोकतंत्र द्वारा नागरिकों को दिया गया अधिकार है इसलिए नागरिकों को मुंबई आकर विरोध प्रदर्शन नहीं करना चाहिए, खासकर दक्षिण मुंबई में, जहां अमीरों के बंगले हैं, वहां पर आंदोलन आदि पर प्रतिबंध लगाने की मांग करना सभी मराठी बंधुओं के साथ अन्याय है। संयुक्त महाराष्ट्र की लड़ाई की सबसे बड़ी आग दक्षिण मुंबई से ही भड़की थी। उस समय मराठी मानुसों का मोर्चा ‘फोर्ट’ में शुरू हुआ था और मोरारजी ने ‘फोर्ट’ के मोर्चे पर ही गोलीबारी की थी। दक्षिण मुंबई में सबसे अधिक १०६ शहीद हुए। उन शहीदों का स्मारक भी दक्षिण मुंबई में ही है। महात्मा गांधी ने दक्षिण मुंबई से ही अंग्रेजों के खिलाफ ‘भारत छोड़ो’ का नारा दिया था। मराठी मानुस, मजदूरों और मिल मजदूरों का पसीना और खून यहीं बहा था इसलिए दक्षिण मुंबई में अमीरों के महल बने, लेकिन शिंदे सेना के सांसद देवड़ा कहते हैं कि मराठी लोगों को दक्षिण मुंबई में विरोध प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, देवड़ा यह भी कहते हैं, ‘आंदोलन के कारण आर्थिक राजधानी नहीं थमनी चाहिए।’ श्रीमान देवड़ा, भयानक बम धमाकों के बाद भी मुंबई नहीं रुकी। यही मुंब्ाई की विशेषता है। आंदोलन से मुंबई नहीं रुकेगी, लेकिन मोदी-शाह की कठपुतली बने उद्योगपति मुंबई को निगलने की कोशिश कर रहे हैं। यह एक गंभीर मुद्दा है। इन अमीर लोगों की कठपुतलियों के लिए मुंबई कुछ भी हो, लेकिन मुंबई सबसे पहले महाराष्ट्र की राजधानी है। मुंबई पर पहला अधिकार मराठी मानुस का है। शिंदे की पार्टी पर मालिकाना हक अमित शाह का है इसलिए शिंदे के कायर सांसद मुंबई पर मराठी लोगों के ‘स्वामित्व’ को स्वीकार नहीं करते हैं। उन्हें शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे का नाम लेने का कोई अधिकार नहीं है। अगर शिंदे एक भले इंसान हैं जैसा कि जरांगे-पाटील कहते हैं तो इस भले इंसान को अपने मराठी-द्वेषी सांसद को हटा देना चाहिए। क्योंकि उन्होंने मराठा समुदाय के आंदोलन, मुंबई में मराठी लोगों के एकीकरण का विरोध किया था। क्या यह भला इंसान अपने सांसद के खिलाफ यह कार्रवाई करेगा?
