मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री के अलईपुरा स्थित मंदिर में दर्शन पूजन के लिए श्रद्धालुओं की उमड़ी भारी भीड़
उमेश गुप्ता / वाराणसी
आदिशक्ति की उपासना का पावन पर्व नवरात्रि 22 सितंबर से आरंभ हो गया है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विशेष पूजा का विधान है। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के साथ ही मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मां दुर्गा की साधना भक्तों को शक्ति और आत्मबल प्रदान करती हैं। सोमवार को शारदीय नवरात्र के प्रथम दिन अलईपुरा स्थित माता शैलपुत्री के दरबार में दर्शन पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, यहां मंगला आरती के बाद से भक्तों की लंबी कतार देखने को मिली, जो पूरे दिन बनी रही इस बीच मां के जयकारे से पूरा मंदिर प्रांगण गूंजे मान रहा।भक्तों की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के प्रबंध किए थे। इसके अलावा भी नगर के प्रमुख देवी मंदिरों में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी गई।

मान्यता है कि मां शैलपुत्री की आराधना करने से सांसारिक सुख और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और साधक उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ता है।
मां शैलपुत्री के बारे में पौराणिक कथा है कि माता शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना गया है। पूर्व जन्म में वे राजा दक्ष की कन्या सती थीं, जिन्होंने भगवान शिव से विवाह किया था। दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में शिव का अपमान देख सती ने आत्मदाह कर लिया। इसके बाद भगवान शिव ने क्रोधित होकर यज्ञ ध्वस्त कर दिया और सती के शरीर को लेकर विचरण करने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के 51 अंग विभक्त किए, जो शक्तिपीठ कहलाए। इसके उपरांत सती ने हिमालय के घर जन्म लेकर शैलपुत्री के रूप में अवतार लिया।
पूजन के दौरान इस मंत्र का जाप करने से मां शैलपुत्री की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नमः।
