-मोदी सरकार ने बढ़ाई आरटीआई की कीमत
-कांग्रेस बोली- छीना जा रहा है जनता का अधिकार
सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र में अब सूचना हासिल करना आम लोगों के लिए मुश्किल बनाया जा रहा है। सरकार जवाबदेही और पारदर्शिता से बचने के लिए सूचना के अधिकार पर आर्थिक और प्रशासनिक बंदिशें लगा रही है। राज्य सरकार ने १२ जून २०२६ को जारी जीआर में स्पष्ट किया है कि अब सूचना अधिकार के तहत जानकारी मांगनेवालों को कारण भी बताना होगा। इतना ही नहीं, अब सूचना को लेकर अपने अधिकार की बात करनेवालों को कीमत भी ज्यादा चुकानी होगी।
जी हां, आरटीआई आवेदन के लिए मात्र १० रुपए शुल्क लेती है, अब यह लगभग तीन गुना हो जाएगी। साथ ही अपील के लिए शुल्क होगा। सरकार की ओर से आरटीआई कानून के तहत शुल्क बढ़ाकर और नए प्रतिबंधात्मक प्रावधान लागू कर आम नागरिकों के अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। ऐसा आरोप विपक्ष ने लगाया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन का आरोप है कि आरटीआई आवेदन, प्रथम अपील, द्वितीय अपील तथा सूचना उपलब्ध कराने के शुल्क में की गई भारी बढ़ोतरी से आम नागरिकों के लिए सूचना प्राप्त करना महंगा हो जाएगा। महाराष्ट्र सरकार लोगों से अधिक शुल्क वसूलने की गलत नीति अपना रही है।
`सबसे बड़ा विवाद उस प्रावधान को लेकर खड़ा हुआ है, जिसमें आरटीआई आवेदनकर्ता से सूचना मांगने का उद्देश्य बताने की बात कही गई है। सपकाल ने कहा कि यह प्रावधान सीधे तौर पर केंद्रीय कानून के विपरीत है।
आरटीआई कार्यकार्ता अनिल गलगली ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार के नए आरटीआई नियम सूचना के अधिकार की मूल भावना के विपरीत दिखाई देते हैं। जानकारी मांगने के लिए कारण बताना, शुल्क बढ़ाना और प्रक्रिया को अधिक जटिल बनाना नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।’
`आरटीआई कार्यकर्ता कमलाकर शिनॉय ने कहा कि सरकार पारदर्शिता कम करने और आम नागरिकों के सूचना के अधिकार को सीमित करने का प्रयास कर रही है। जो पूरी तरह से अवैध है। कानूनी रूप से सरकार आरटीआई एक्ट में छेड़छाड़ नहीं कर सकती है।’
`आईटीआई कार्यकर्ता जीतेंद्र घाडगे ने कहा कि यह सरकार मनमानी कर रही है। तमाम भ्रष्टाचार और खामियों को छुपाने का एक प्रयास है। आईटीआई कार्यकर्ता समाज में अधिकारियों और सरकार की गलतियों को जनता के सामने लाने का काम करते हैं। सरकार इस पर दबाव बना रही है।’
