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सम-सामयिक : करीब तीस करोड़ बच्चे तकलीफ में…शांति का नोबेल चाहनेवाले ट्रंप को ये बच्चे क्यों याद नहीं आते?

मनोज वार्ष्णेय

डोनाल्ड ट्रंप को शांति का नोबेल नहीं मिला, यह खबर पूरी दुनिया के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो गई। लेकिन जिस शांति के नाम पर डोनाल्ड ट्रंप नोबेल मांग रहे हैं, उसके पीछे हुए युद्ध में कितने बच्चे अनाथ हो गए या मारे गए, इसके लिए कोई चिंतित नहीं है। कोई चिंतित इस बात पर भी नहीं है कि युद्ध के दौरान कितने बच्चों की जिंदगी बर्बाद हो गई, इस बात पर कहीं बहस तक नहीं हो रही है। नोबेल की चाह रखने वाले ट्रंप ने बच्चों के लिए कभी कोई स्पेशल आर्थिक पैकेज दिया है, कहीं उनकी समस्या वैâसे खत्म हो, इस पर किसी राष्ट्र से बात की हो या फिर खुद उन्होंने युद्ध की रोटी में अपने हित पचाते राष्ट्राध्यक्षों को यह कहा हो कि वह बच्चों के स्कूल या अस्पताल के आसपास हमला नहीं करें? फिलहाल, बच्चों की जिंदगी केवल युद्ध ही नहीं, इंटरनेट और भ्रष्टाचार भी बर्बाद कर रहे हैं।
चिंता का सबब
वर्ष २०२५ के दसवें महीने में चार खबरों ने दुनिया में बच्चों की दशा-दिशा कितनी खराब है, यह भी बता दिया है। इन चार खबरों के संदेश बहुत भयानक और शर्मसार करने वाले हैं। जो चार घटनाएं हैं, वे ये समझाने के लिए काफी हैं कि बच्चों के लिए अभी भी हम सिर्फ सोच रहे हैं, ऐसा कुछ नहीं कर रहे, जिससे वे भविष्य में एक उन्नत दुनिया की नींव रख सकें। भारत में भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। यहां के विद्यालयों, खासकर सरकारी विद्यालयों की छतें गिर जाती हैं और दर्जनों बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं। अस्पतालों में उन्हें जो दवाएं दी जा रही हैं वह इतनी खतरनाक हैं कि सांस आने के रास्ते सुगम होने के स्थान पर सांस हमेशा के लिए जिस्म को छोड़कर चली जाती है। विद्यालय में शिक्षक द्वारा बच्चे को उल्टा लटकाकर पीटना और इन सबसे बढ़कर सुपरस्टार के दामाद तथा बॉलीवुड के स्टार अक्षय कुमार की बेटी से साइबर अपराधी न्यूड फोटो मांगते हैं। सोचिए ये घटनाएं वो हैं, जो हमें चौंकाती तो हैं, पर चिंतित नहीं करती। अगर करती तो इन घटनाओं के सूत्रधार-जिम्मेदार खुलेआम नहीं घूमते।
दुनिया का हाल बहुत खराब है। युद्धविराम का श्रेय ले रहे ट्रंप इस बात का कभी कोई कदम क्यों नहीं उठाते कि रूस-यूक्रेन के यु़द्ध में हजारों बच्चे मारे गए या घायल हुए। इजरायल-हमास के बीच चल रही जंग में बीस हजार से अधिक बच्चे मारे गए और कम से कम इतने ही घायल हैं। पूरी दुनिया इस बात से परेशान है कि डिजिटल स्कैम बढ़ रहे हैं, लेकिन सिवाय एक-दो उपाय के अतिरिक्त कोई ऐसा काम नहीं हो रहा, जिससे दुनिया के बच्चे साइबर क्रिमनलों की साजिशों के शिकार नहीं हों। इसके अतिरिक्त तस्करी के लिए बच्चों को किडनैप करना, उनसे भीख मंगवाना, तस्करी में उनका उपयोग करना, अब ये सब बातें चिंता का सबब नहीं रहीं। हालात ये हैं कि अब बच्चे पूरी दुनिया में कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं।
नीली रोशनी का जहर
इंटरनेट किस तरह से बच्चों की जिंदगी को लील रहा है, यह बात सभी को पता है। वे रील में अपना समय खपाते हैं, मोबाइल के गेम में इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें मोबाइल ड्रगिस्ट (एडिक्ट) कहा जाने लगा है। नीले फीते का जहर इंटरनेट पर उन्हें यौन अपराध करने के लिए उकसाता है।
कुल मिलाकर साइबर अपराध के हजारों तरीके उनकी नसों में मोबाइल की नीली रोशनी बहा रहे हैं। आज के बच्चों की बोलचाल की भाषा इतनी भ्रष्ट हो गई है कि वे घर में भी सम्मान क्या होता है और वैâसी भाषा बोलनी चाहिए, भूल चुके हैं। अगर देखा जाए तो इंटरनेट ने उनकी जिंदगी को नरक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जबकि बच्चों के पालनहार अपनी ही समस्याओं में उलझे हुए हैं और उनके नेता अपने लिए शांति और खुशहाली का नोबेल पुरस्कार का सपना देख रहे हैं। इंटरनेट में किस तरह इन दिनों बच्चे ऑनलाइन गेमिंग में व्यस्त हैं, यह उनकी आड़ में नोट कमाने वाले और उनके शोषण की तरह-तरह की कल्पना करनेवाले ही जानते हैं। ऐसे लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि वे जिन मासूमों को ठग रहे हैं, डरा रहे हैं या फिर उनकी जिंदगी से खेल रहे हैं, उसके मायने क्या हैं? जब अक्षय कुमार की बेटी तक से नंगी फोटों की मांग होती है, तब भी ऑनलाइन गेमिंग को बढ़ावा देने वाले स्टार या विज्ञापन से नोट कमाने और उसकी निंदा करने के बारे में कतई नहीं सोचते। इससे ज्यादा शर्मसार करने वाली और क्या बात होगी? जरा सोचिए जब किसी देश में सुपरस्टार माने जानेवाले किसी शख्स के बच्चे तक सुरक्षित नहीं हैं, दुनियाभर को सुरक्षा का पाठ पढ़ाने वाले सुपरस्टार को किसी भुक्तभोगी की तरह सार्वजनिक रूप से अपना दुखड़ा सुनाना पड़ता है। तब सोचिए आम लोगों के बच्चों की क्या हालत होगी? यह अकारण नहीं है कि आज दुनिया का हर बच्चा ऑनलाइन यौन उत्पीड़न का शिकार है।
जिम्मेदार कौन?
बच्चों की जिंदगी सबसे अधिक युद्ध क्षेत्रों में नारकीय हो चुकी है। जब भी कहीं, किसी पर हमला होता है तो उस क्षेत्र में बच्चों को अपने माता-पिता और संरक्षकों के साथ पलायन करना पड़ता है। ऐसे में बिना युद्ध का हिस्सा हुए भी बच्चे विस्थापन और पलायन की पीड़ा क्या होती है, वो भुगत रहे होते हैं। युद्ध के डर और उससे उपजी समस्याओं-बीमारियों के कारण इन इलाकों के बच्चों का स्वास्थ्य बिना युद्ध का हिस्सा हुए भी युद्ध जैसी स्थितियों का हो जाता है।

वह हिंसा के उस घिनौने रूप से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर रू-बरू होते हैं और यह बात उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए भावनात्मक संकट का शिकार बना डालती है। इसके नुकसान स्वरूप बच्चे न सिर्फ गरीबी झेलते हैं, बल्कि शिक्षा से भी वंचित रहते हैं और मासूमियत तो बचपन में ही उनसे हमेशा-हमेशा के लिए छिन जाती है।
बच्चों की मुसीबतें कितनी ज्यादा हैं अगर यह देखना है, तो गाजा या फिर किसी दूसरे युद्ध क्षेत्र में वितरित होने वाले भोजन या दवाओं के समय मचने वाली भगदड़ और छीना-झपटी के दृश्यों को देखिए। युद्ध से एक और समस्या बच्चों के समक्ष आती है, जो उनके यौन शोषण का कारण बनती है। बेघर हुए बच्चों के पालनहार जब जिंदगी की जद्दोजहद में व्यस्त होते हैं, उसी समय घात लगाए बैठे शिकारी बच्चों को यौन हिंसा का शिकार बना डालते हैं। वास्तव में युद्धग्रस्त क्षेत्रों में सबसे बुरी हालत बच्चों की होती है। उस पर तुर्रा यह कि शांति के प्रयास के लिए नोबेल की मांग हो या फिर युद्ध रुकवाने का श्रेय लेने की बात हो, रोज-रोज ये बातें बहस का विषय बनती हैं। बस अगर कोई चीज बहस के दायरे में आने से बची रहती है तो यह कि बच्चों की इस बुरी स्थिति के लिए वास्तव में जिम्मेदार कौन है, इस बात का तय होना?
एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया के करीब तीस करोड़ बच्चे दुरावस्था में हैं। इनके पास जीने के लिए जो मूलभूत सुविधाएं होनी चाहिए, वह नहीं हैं। ..और हां, इनसे कई गुना अधिक बच्चे ऐसे हैं, जो दूसरी परेशानियों के कारण खुद को कई तरह के अपराधों और यौन हिंसा जैसे अपराधों के दलदल में फंसा पाते हैं। ऐसे में दुनिया को एक आदर्श नागरिक की जगह ये अपराधी बच्चे मिल रहे हैं। सामूहिक बलात्कार के कितने मामले हैं, जिनमें अल्पवयस्क बच्चों को लिप्त पाया जाता है। इसके बाद आमतौर पर उन्हें किशोर या बाल सुधार गृहों में भेज दिया जाता है, लेकिन यहां आकर या जाकर ये बच्चे सुधरते नहीं हैं। अगर कोई सुधार होता है तो सुधार गृहों से बच्चों के भागने के समाचारों से अखबारों के पन्नों पर साया होने वाली खबरों का सुधार होता है। इन्हें किसी तरह से मैनेज किया जाता है। स्कूलों की टूटती छतें, मिलनेवाले भोजन में मरी छिपकलियां और कीड़ों का मिलना आखिर किस बात का द्योतक हैं? अस्पतालों में जब उन्हें दवा की जगह जहर मिलता है तो यह जिम्मेदारी किसकी होती है, मां-बाप की या उस जिम्मेदार सरकार की, जो खुद को राज या देश की पालनहार समझती है? यदि डोनाल्ड ट्रंप को यह पुरस्कार मिल भी जाता तो इन बच्चों की दुनिया राई रती नहीं सुधरतीr और कोई पुरस्कार देने वाला इस दिशा में एक पल को भी नहीं सोचता और न ही सोचेगा।
(लेखक राजस्थान से प्रकाशित नवज्योति के पूर्व साहित्य संपादक हैं)

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