के.पी. मलिक
बिहार का ताजा चुनाव परिणाम एक राज्य की राजनीतिक कहानी नहीं बल्कि देश के लोकतांत्रिक चरित्र की विफलता की गवाही है। यह पहली बार नहीं है कि किसी राज्य में चुनाव विवादों में घिरा हो, पर इस बार जिस तरह मतदाता सूची में रहस्यमय कटौतियां हुर्इं, आदर्श आचार संहिता की धज्जियां उड़ीं, मतगणना के दौरान पारदर्शिता पर प्रश्न उठे और अपराध के गंभीर आरोप झेलने वाले प्रत्याशी विजयी ठहराए गए, इन तमाम कारणों ने लोकतांत्रिक प्रणाली की जड़ों में बैठ चुके असंतुलन को उजागर कर दिया।
मरी आत्मा!
एक चैनल पर वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग की टिप्पणी इस स्थिति का सटीक रूपक प्रस्तुत करती है कि जैसे १९७४ के पोखरण परमाणु परीक्षण ने दुनिया को यह बताया था कि भारत अब एक नई शक्ति बन चुका है, वैसे ही बिहार चुनाव ने यह दिखा दिया कि भारत अब चुनावी लोकतंत्र की परंपराओं से बहुत दूर निकल चुका है। फर्क इतना है कि इस बार प्रयोग रेगिस्तान की झुलसती रेत में नहीं, चुनाव आयोग के वातानुकूलित वॉर रूम में हुआ है। आज भारत उस मुकाम पर है जहां लोकतंत्र एक प्रणाली नहीं, एक प्रदर्शन बन गया है। यह वह दौर है जिसमें चुनाव केवल मतगणना नहीं, बल्कि एक महोत्सव की तरह प्रस्तुत किया जाता है जैसे मीडिया की रंगीन प्रस्तुति, तकनीकी नवाचार, और नारेबाजी के बीच आम जनता के असली सवाल गुम हो जाते हैं। चुनाव अब जनता की आकांक्षाओं से ज्यादा सत्ता की विश्वसनीयता को वैध ठहराने का साधन बन चुके हैं। या यूं कहें कि लोकतंत्र का पूरी तरह बाजारीकरण हो चुका है। आज लोकतंत्र की आत्मा चुनाव कराने में नहीं बल्कि समान भागीदारी और संस्थागत संतुलन में निहित होती है। लेकिन जब वही संस्थाएं, चाहे वह चुनाव आयोग हो, न्यायपालिका हो या मीडिया, सत्ता के प्रभाव में दीर्घकालिक मौन धारण कर लें, तब लोकतंत्र का बाहरी खोल रह जाता है और अंदर उसकी आत्मा मर चुकी होती है।
पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय संस्थान जैसे ‘प्रâीडम हाउस’, ‘वी-डेम’ और ‘इकनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट’ भारत को ‘इलेक्टोरल ऑथोरिटेरियनिज्म’ यानी ‘चुनावी निरंकुशता’ की श्रेणी में रखने लगे हैं। इसका अर्थ है कि चुनाव तो होते हैं, लेकिन उनकी प्रक्रिया इतनी नियंत्रित होती है कि परिणाम पहले से ही एक निश्चित दिशा में जाने की संभावना रखते हैं। यह नियंत्रण सिर्फ वोटों के स्तर पर नहीं, बल्कि विचारों और सूचना के प्रवाह पर भी लागू होता है। मीडिया का केंद्रीकरण, सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं पर हमले, रिपोर्टिंग की जगह प्रोपेगेंडा का प्रसार, ये सब लोकतांत्रिक संस्थानों पर निरंकुशता की छाया हैं। यानी अब देश-विदेश में नियंत्रित लोकतंत्र की अवधारणा बन गई है।
दरअसल, बिहार का उदाहरण एक चेतावनी है। जब मतदाता सूची से लाखों नाम गायब होते हैं, जब स्थानीय प्रशासन और पुलिस मशीनरी सत्ता-समर्थित कथानक को आगे बढ़ाती है और जब विपक्षी आवाजों को मीडिया से ‘संपादकीय नीति’ के नाम पर गायब कर दिया जाता है तो यह संकेत केवल एक चुनावी गड़बड़ी का नहीं, बल्कि लोकतंत्र के विघटन का होता है। इस विघटन का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि जनता को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि यही लोकतंत्र का ‘न्यायोचित’ रूप है। धीरे-धीरे लोकतंत्र की परिभाषा ही बदली जा रही है जिसमें अब जनता की सहमति वास्तविक नहीं, निर्मित यानी कृत्रिम है। आज बिहार का प्रयोग, भारत की तस्वीर पेश करता नजर आ रहा है।
पूछने की हिम्मत
जब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार देशवासियों और समाज को ‘नए युद्धक्षेत्र’ की तरह वर्णित करें और सत्ता नई पीढ़ी से ‘डरने’ की बात कहे तो यह केवल शब्दों का चयन नहीं, मानसिकता का बयान है। एक ऐसी सत्ता जो सवालों से डरी हुई हो, वह लोकतंत्र नहीं रह जाती और वह उसे सीमित करने लगती है। इसके पीछे एक बड़ा प्रयास निहित है और वह है जनता को ‘भागीदारी’ से हटाकर ‘दर्शक’ बना देने का। अगर जनता को केवल फेसबुक, इंस्टाग्राम, टेलीविजन और इलेक्शन बूथ तक सीमित कर दिया गया तो लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ ‘जनसत्ता’ समाप्त हो जाएगा।
बहरहाल, अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन जीतता है या कौन हारता है बल्कि यह है कि क्या पूरी चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष रह गई है? जब कुएं में ही भांग घुल चुकी हो तो उसी पानी से बार-बार चुनाव कराना झूठी शुद्धता का अभिनय मात्र है। जरूरत उस कुएं को साफ करने की है यानी पूरे चुनावी, न्यायिक और मीडिया ढांचे को पुनर्संतुलित करने की है। क्योंकि सवाल कुएं का है, पानी का नहीं। दरअसल अब यह लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं बल्कि संरचनाओं की हो चली है। इसमें विपक्षी दलों से ज्यादा जिम्मेदारी देश के आम नागरिकों, स्वतंत्र मीडिया और जागरूक नागरिकों की है। चुनाव तभी लोकतंत्र बन सकता है जब वह भय, प्रचार और पक्षपात के दबावों से मुक्त हो। आज भारत की लोकतांत्रिक यात्रा जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां से दो रास्ते दिखते हैं पहला, सुविधाजनक चुप्पी का, और दूसरा, असुविधाजनक प्रतिरोध का। पहला रास्ता सत्ता को स्थायी बनाता है, दूसरा लोकतंत्र को जीवित रखता है। बिहार का चुनाव हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल वोट डालने से नहीं बचता बल्कि सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत से बचता है। इसलिए आज भारत को यह तय करना है कि क्या वह चुनावी लोकतंत्र का भ्रम लेकर निरंकुशता की ओर बढ़ेगा? या लोकतंत्र की आत्मा को पुन: जीवित करेगा? जनता के हाथों में, न कि वॉर रूम की मशीनों में।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
