मुख्यपृष्ठस्तंभमहाराष्ट्रनामा : मुंबई की बरसात, अमीरी की बारिश और नैतिकता की बर्बादी!

महाराष्ट्रनामा : मुंबई की बरसात, अमीरी की बारिश और नैतिकता की बर्बादी!

राजन पारकर

‘एक शहर पानी में डूबा है, दूसरा पैसों में और तीसरा कानून की फाइलों में…’
देश बड़े अजीब मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ मुंबई का आम आदमी यह सोचकर घर से निकल रहा है कि शाम तक वापस घर पहुंचेगा या किसी खुले नाले की खबर बन जाएगा। दूसरी तरफ रिपोर्टें बता रही हैं कि देश के शहर पहले से कहीं ज्यादा अमीर हो गए हैं और इसी बीच सरकार को याद आया कि ऑर्केस्ट्रा बारों में नियमों का भी कोई अस्तित्व होना चाहिए। यानी तस्वीर साफ है- बारिश आसमान से हो रही है, पैसा बाजार में बरस रहा है और नियम सिर्फ भाषणों में दिखाई दे रहे हैं। नागरिक छाता लेकर निकल रहा है, लेकिन उसे सबसे ज्यादा डर बारिश से नहीं, बल्कि व्यवस्था के रिसते हुए छेदों से है।
‘जरा संभल के…’ जब अभिनेता ने वो कहा, जो व्यवस्था को कहना चाहिए था
मुंबई में बारिश नई नहीं है, लेकिन हर साल डूबती हुई व्यवस्था अब पुरानी भी नहीं लगती। सड़कें नदी बन जाती हैं, नाले मौत के जाल और फुटपाथ किस्मत का इम्तिहान। ऐसे में एक अभिनेता लोगों से कहता है-‘मुंबई वालों, जरा संभल के!’ प्रश्न यह नहीं कि अभिनेता ने क्यों कहा। प्रश्न यह है कि यह वाक्य उन लोगों के मुंह से क्यों नहीं निकला, जिनके हाथों में शहर की जिम्मेदारी है? अगर नागरिक को हर कदम पर खुद ही संभलना पड़े, तो फिर करोड़ों रुपए के विकास के दावे आखिर किसके लिए हैं? हर मानसून के बाद वही तस्वीरें, वही बयान और वही आश्वासन। लगता है मुंबई में बारिश नहीं, सरकारी स्मृति का वार्षिक विसर्जन होता है।
अमीर शहर, गरीब सुविधाएं…आखिर यह कैसा विकास?
रिपोर्ट कहती है कि शहर पहले से अधिक खर्च कर रहे हैं, लोग पहले से अधिक कमाई कर रहे हैं और अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है। लेकिन सवाल यह है कि अगर शहर इतने अमीर हो गए हैं, तो पहली बारिश में सड़कें इतनी गरीब क्यों दिखती हैं? जब टैक्स बढ़ता है तो विकास के बड़े-बड़े दावे सुनाई देते हैं, लेकिन जब पानी भरता है तो वही विकास कहीं दिखाई नहीं देता। ऐसा लगता है कि शहरों की समृद्धि आंकड़ों में रहती है और नागरिकों की परेशानियां सड़कों पर।
ऑर्केस्ट्रा बार पर कार्रवाई…कानून की नींद आखिर खुल ही गई
विधानसभा में चर्चा हुई, भाषण हुए, चिंता व्यक्त हुई और फिर अचानक पुलिस सक्रिय हो गई। ग्यारह ऑर्केस्ट्रा बारों पर कार्रवाई भी हो गई। कार्रवाई स्वागतयोग्य है, लेकिन सवाल यह भी है कि जिन गतिविधियों की शिकायत आज मिली, क्या वे कल तक अदृश्य थीं? हमारे यहां अक्सर कानून की आंखें तब खुलती हैं जब मामला सुर्खियां बन जाता है। उससे पहले सब कुछ ‘नियमों के अनुसार’ चलता रहता है। यदि कानून हर दिन जागता रहे तो शायद उसे किसी विशेष अभियान की जरूरत ही न पड़े। मुंबई में नागरिक बारिश से लड़ रहा है, अर्थव्यवस्था आंकड़ों में जीत रही है और प्रशासन अपनी सक्रियता साबित करने में व्यस्त है। देश को केवल अमीर शहर नहीं चाहिए, बल्कि सुरक्षित सड़कें, जवाबदेह व्यवस्था और ऐसा शासन चाहिए जहां अभिनेता को जनता को चेतावनी न देनी पड़े, रिपोर्टों को विकास साबित न करना पड़े और कानून को जागने के लिए अधिवेशन का इंतजार न करना पड़े। क्योंकि जब व्यवस्था सो जाती है, तब सबसे पहले नागरिक की सुरक्षा डूबती है और सबसे बाद में सरकारी जवाबदेही तैरती हुई दिखाई देती है।

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