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संपादकीय : जेन-जेड के नाम रहा साल!

असंख्य घटनाओं और प्रसंगों से भरा वर्ष २०२५ अब बीत चुका है और नया वर्ष २०२६ शुरू हो गया है। बुधवार की आधी रात को पूरी दुनिया ने बीते वर्ष को विदाई दी और नए वर्ष का हर्षोल्लास से स्वागत किया। बीते वर्ष की अच्छी-बुरी यादों को अलविदा कहते हुए हर साल नए साल का स्वागत आशा की भावना के साथ किया जाता है। इस वर्ष भी ऐसा ही हुआ। खूबसूरत रोशनी, आसमान को जगमगाती आतिशबाजी और जबरदस्त संगीत के ताल पर थिरकते हुए हर्षोल्लास से युवाओं के साथ-साथ जिस तरह दुनिया भर के बुजुर्गों ने नए साल का स्वागत किया, वह अद्भुत था। लेकिन क्या बीते वर्ष का अंत और नए वर्ष का आगमन कोई बड़ा बदलाव लाता है? ‘मानसून तो हमेशा ही आता है’, की तर्ज पर दीवार पर टंगा बीते वर्ष का वैâलेंडर उतर जाता है और उसकी जगह नए वर्ष का वैâलेंडर आ जाता है। इस वर्ष ऐसा क्या हुआ जो इससे अलग था? यदि महाराष्ट्र के सामने मौजूद प्रश्न और चुनौतियां वर्ष बदलने के साथ नहीं बदलतीं, यदि देश में लोकतंत्र का संकट नहीं बदलता और यदि देश की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनामी नहीं रुकती तो वर्ष बदलने से क्या होगा? फिर भी, बीते वर्ष ने लोगों के जीवन में क्या अच्छे या बुरे बदलाव लाए? महाराष्ट्र, देश और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए प्रमुख परिवर्तनों पर नजर रखना आवश्यक है। इस संदर्भ में देखा जाए तो वर्ष २०२५ भारत के लिए कम सुखद और अधिक पीड़ादायक रहा। २२ अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले में २६ लोगों की मौत हो गई । यह देश की सुरक्षा और संप्रभुता पर सबसे बड़ा आघात था। पहलगाम में हमले के स्थल पर नौसेना अधिकारी लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की पत्नी हिमांशी की शव के पास बैठी तस्वीर देखकर पूरा देश स्तब्ध रह गया। इस हमले के
जवाब के तौर पर
हिंदुस्थान ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया। लेकिन अचानक हिंदुस्थान ने इस ऑपरेशन को रोक दिया या सरकार को इसे रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा। हैरानी की बात यह है कि जब ऐसा लग रहा था कि युद्ध छिड़ने ही वाला है, तभी अमेरिकी राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया के जरिए युद्धविराम की घोषणा कर दी। भारत-पाकिस्तान संबंधों में तीसरे देश के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करने के हिंदुस्थान के वर्षों से चले आ रहे रुख को खारिज करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पचास से अधिक बार युद्ध रोकने का दावा किया। हमारे शासकों का ट्रंप के बार-बार के इस दावे को नकारते हुए कि ट्रंप झूठ बोल रहे हैं, डंके की चोट पर कहने का साहस न दिखा पाना बीते साल की सबसे बड़ी शर्मिंदगी कही जा सकती है। पहलगाम हत्याकांड के बाद मोदी सरकार ने दुनियाभर में प्रतिनिधिमंडल भेजे। लेकिन क्या इससे भी उसे दुनियाभर के देशों का समर्थन मिला? पहलगाम हत्याकांड के हत्यारे कौन थे? वे कहां से और वैâसे आए, यह आज भी एक रहस्य है। प्रधानमंत्री इस तरह शेखी बघारते रहे कि जैसे ट्रंप उनके सबसे अच्छे मित्र हों। हालांकि, इसी ट्रंप सरकार ने इस साल के अंत में पहलगाम हत्याकांड को आतंकवादी हमला नहीं बल्कि विद्रोह की कार्रवाई माना। ट्रंप यहीं नहीं रुके, उन्होंने ‘व्हाइट हाउस’ में पाकिस्तान के सेना प्रमुख मुनीर के स्वागत में लाल कालीन बिछाए। मोदी के मित्र ट्रंप ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जीत लिया है। यह उनकी विदेश नीति के लिए एक बड़ा झटका था, जो अमेरिका का पक्ष लेने की कोशिश कर रही थी। इतना ही नहीं अमेरिका ने भारत पर एक भयानक ‘टैरिफ बम’ गिरा दिया। अमेरिका द्वारा ५० प्रतिशत टैरिफ थोपने के पैâसले ने भारतीय अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया।
हिंदुस्थान के घाव पर नमक
छिड़कने के लिए अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे भारतीयों को ट्रंप ने जंजीरों में जकड़कर मालवाहक विमान से भारत भेज दिया। पिछले साल ने भारतीयों को जो दृश्य दिखाया वह शर्मनाक था। अमेरिका के साथ संबंध काफी बिगड़ने के बाद मोदी सरकार ने पिछले साल हिंदुस्थान के पारंपरिक शत्रु चीन के करीब आने की कोशिश की, लेकिन वह भी बहुत सफल नहीं रही। जून में अमदाबाद से लंदन जा रहे एयर इंडिया के विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने से देश की साख धूमिल हो गई। ईरान और इजरायल के बीच युद्ध ने एक बार फिर वैश्विक सुरक्षा को खतरे में डाल दिया। हालांकि, ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट किए जाने के बाद यह युद्ध रुक गया। हिंदुस्थान की बात करें तो पिछले साल इस बात के पुख्ता सबूत मिले कि चुनाव आयोग और शासकों ने खुलेआम देश के लोकतंत्र का कत्ल किया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सनसनीखेज प्रेस कॉन्प्रâेंस ने यह उजागर किया कि महाराष्ट्र और हरियाणा में वोटों की चोरी के जरिए सरकारें वैâसे सत्ता में आईं। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शासकों के खिलाफ गुस्से से प्रेरित नेपाल का विद्रोह पिछले साल की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी। देश की युवा पीढ़ी, यानी जेन-जेड ने तानाशाही सरकार को जो झटका दिया, वह दुनियाभर के सत्ता के भूखे शासकों के लिए एक बड़ा झटका था। सत्ता के राक्षसी दुरुपयोग के खिलाफ भड़के जेन-जेड ही ने बीते साल को यादगार बना दिया। क्या हिंदुस्थान के शासक न्ाए साल में पड़ोसी देशों में जनता के उग्र आक्रोश के कारण हुए सत्ता परिवर्तन से सबक सीखेंगे? जेन-जेड जैसी कोई क्रांति न हो, बल्कि चुनाव आयोग के माध्यम से वोटों की चोरी और लोकतंत्र का अपहरण बंद हो और कम से कम नए साल में अघोषित तानाशाही का अंत हो, यह मंगल कामना करने में क्या कोई बुराई है?

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