मुख्यपृष्ठनए समाचारखबरों पर कानून का पहरा!.. २१ मीडिया संस्थान सुप्रीम कोर्ट पहुंचे

खबरों पर कानून का पहरा!.. २१ मीडिया संस्थान सुप्रीम कोर्ट पहुंचे

-निजता की आड़ में पत्रकारिता का गला घोंटने की तैयारी?
-सरकार से पूछा जाएगा जवाब, क्या भ्रष्टाचार उजागर करना भी निजता का उल्लंघन बन जाएगा?

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछने वाले पत्रकारों को अब खबर छापने से पहले कानून का डर सताएगा? नागरिकों की निजता की रक्षा के नाम पर बनाया गया डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून कहीं सत्ता और प्रभावशाली लोगों के लिए जवाबदेही से बचने की ढाल तो नहीं बन जाएगा? इसी गंभीर आशंका को लेकर देश के २१ समाचार संस्थानों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। शीर्ष अदालत ने याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि पत्रकारिता का काम ही उन तथ्यों को सार्वजनिक करना है, जिन्हें सत्ता और प्रभावशाली लोग कई बार छिपाए रखना चाहते हैं। भ्रष्टाचार, सरकारी ठेकों में अनियमितता, राजनीतिक संरक्षण, वित्तीय घोटाले और प्रशासनिक मनमानी की पड़ताल में व्यक्तिगत जानकारी भी सामने आ सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि सार्वजनिक हित में जुटाई गई जानकारी और किसी नागरिक की निजी जिंदगी में अनुचित दखल के बीच सीमा कौन तय करेगा? याचिकाकर्ता समाचार संस्थानों की आशंका है कि कानून के कुछ प्रावधान खोजी पत्रकारिता और समाचार स्रोतों की गोपनीयता को प्रभावित कर सकते हैं। यदि जनहित में सूचना प्रकाशित करने पर भी कानूनी कार्रवाई का जोखिम बढ़ेगा, तो पत्रकारिता पर इसका भय पैदा करने वाला असर पड़ सकता है।
सवाल सरकार की नीयत से ज्यादा उसके बनाए कानून की जवाबदेही का है। नागरिकों की निजता की सुरक्षा निस्संदेह जरूरी है, लेकिन क्या उसी सुरक्षा के नाम पर सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही कमजोर होने दी जा सकती है? क्या घोटाले उजागर करने वाले पत्रकार को भी वही कानूनी कसौटी झेलनी होगी, जो निजी डेटा का व्यावसायिक दुरुपयोग करने वालों के लिए बनाई गई है?
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि कानून में जनहित पत्रकारिता, खोजी रिपोर्टिंग और गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान हैं या नहीं। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने कानून को असंवैधानिक घोषित नहीं किया है। केंद्र का पक्ष और न्यायिक परीक्षण बाकी है, लेकिन इस मुकदमे ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है; लोकतंत्र में कानून नागरिक की निजता बचाएगा या सत्ता से सवाल पूछने वालों की आवाज दबाने का औजार बन सकता है?
गोपनीय सूत्रों की सुरक्षा पर भी चिंता
पत्रकारिता में कई अहम खुलासे ऐसे लोगों की जानकारी पर आधारित होते हैं, जो अपनी पहचान सार्वजनिक नहीं करना चाहते। मीडिया संस्थानों का कहना है कि कानून के तहत अधिकारियों को डेटा उपलब्ध कराने से जुड़ी व्यापक शक्तियां मिलने पर पत्रकारों के गोपनीय सूत्रों और भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोगों की पहचान सामने आने का खतरा पैदा हो सकता है। इससे भविष्य में लोग संवेदनशील जानकारी पत्रकारों तक पहुंचाने से हिचक सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब
२७ अक्टूबर २०२६ को सुप्रीम कोर्ट ने डीएनपीए की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। मामले की अगली सुनवाई १७ नवंबर के लिए निर्धारित की गई है।

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