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पुणे में भी भाजपा ने घाती को दिखाई औकात! … सख्त संदेश के साथ बनाया अलग चुनावी रास्ता

सामना संवाददाता / मुंबई
मनपा चुनाव में उम्मीदवारों के नामांकन की अंतिम तिथि भाजपा और एकनाथ शिंदे गुट के बीच गहरे राजनीतिक टकराव की वजह से चर्चा का केंद्र बन गई। पुणे में १६५ सदस्यों वाली महानगरपालिका में सत्ता पर एकतरफा कब्जे की रणनीति के तहत भाजपा ने शिंदे गुट को केवल १५ सीटें देने का प्रस्ताव रखा था। जिसे लेकर शिंदे गुट ने गहरी नाराजगी जताई, लेकिन भाजपा ने भी दो टूक में शिंदे गुट को दरकिनार कर दिया।
सूत्रों के अनुसार, भाजपा ने साफ कहा कि हमे शिंदे गुट की जरूरत नहीं है। यह सीटें लेनी है तो लो वरना भाड़ में जाओ। इस चुनाव में सीट बंटवारे के दौरान शिंदे गुट की ओर से जब १५ उम्मीदवारों की सूची भाजपा नेतृत्व के सामने रखी गई, तो स्थिति पूरी तरह पलट गई। सूची में जिन वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं के नाम शामिल थे, उन्होंने भाजपा को असहज कर दिया। इसके बाद भाजपा ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए पुणे में शिंदे गुट के साथ सीट बंटवारे की सभी बातचीत बंद कर दी और अपने सभी उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने के निर्देश दे दिए। दूसरी ओर भाजपा से गठबंधन की संभावनाएं खत्म होती देख एकनाथ शिंदे ने मुंबई से पुणे के लिए १६५ एबी फॉर्म भेज दिए। इससे यह संकेत साफ हो गया कि शिंदे गुट भी भाजपा के बिना चुनावी मैदान में उतरने की पूरी तैयारी कर चुका है। इसके बाद शिंदे और भाजपा नेताओं की ओर से गठबंधन टूटने की घोषणाएं सामने आईं, हालांकि कुछ नेताओं ने बीच-बीच में बातचीत जारी रहने के बयान देकर भ्रम की स्थिति भी बनाई गई थी।
पिछले चार-पांच दिनों से दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर लगातार बैठकों का दौर चल रहा था। सोमवार देर रात शिंदे गुट की ओर से प्रेस कॉन्प्रâेंस की सूचना दी गई थी, जिसमें गठबंधन टूटने की घोषणा होने वाली थी, लेकिन अंतिम क्षणों में यह प्रेस कॉन्प्रâेंस रद्द कर दी गई। इसके अगले ही दिन दोनों दलों के उम्मीदवारों ने अलग-अलग नामांकन दाखिल करने शुरू कर दिए। भीतर ही भीतर पुणे में भी इनका गठबंधन टूट गया।

शिंदे गुट का दांव पड़ा उल्टा
भाजपा का मानना है कि शिंदे गुट द्वारा सुझाई गई १५ सीटें छोड़ना पार्टी के लिए असंभव था। यही वजह रही कि भाजपा ने गठबंधन में चुनाव लड़ने का विचार पूरी तरह त्याग दिया। राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को भाजपा का कड़ा संदेश माना जा रहा है। सीटें तय शर्तों पर ही मिलेंगी, वरना अलग राह तय है। अंदरूनी चर्चाओं के अनुसार, शिंदे गुट ने १५ सीटों के जरिए भाजपा को रणनीतिक दबाव में लेने की कोशिश की, लेकिन यह दांव उल्टा पड़ गया। मौजूदा हालात को देखते हुए पुणे में भाजपा और शिंदे गुट के बीच चुनावी गठबंधन की संभावना लगभग खत्म मानी जा रही है।

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