जेदवी / मुंबई
नए साल के मौके पर भारतीय रेलवे ने रेलवन ऐप से टिकट बुकिंग पर ३ प्रतिशत की सीधी छूट का एलान कर जोर-शोर से ढोल पीटा। मगर हकीकत में यह ‘डिजिटल तोहफा’ ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहा है। जिन यात्रियों को बड़ी राहत की उम्मीद थी, वे अब इस योजना की सीमाओं और शर्तों में उलझकर रह गए हैं। रेलवे की यह छूट सिर्फ अनारक्षित और प्लेटफॉर्म टिकट तक ही सीमित है। लंबी दूरी के यात्री, रोजाना सफर करने वाले पासधारक और आरक्षित टिकट लेने वाले यात्रियों को इस योजना से एक रुपए का भी फायदा नहीं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यही है रेलवे का ‘बड़ा नववर्ष तोहफा’?
बता दें कि सुविधाओं के नाम पर बेहाल रेलवे एक बार फिर यात्रियों को नया मंत्र सुना रही है। सुनने में यह योजना भले ही आकर्षक लगे, लेकिन जमीनी हकीकत में इससे आम जनता को कोई खास राहत मिलने वाली नहीं है। बुनियादी सुविधाओं में सुधार ही आज यात्रियों के लिए सबसे बड़ी राहत है, लेकिन रेलवे प्रचार में ही उलझी नजर आ रही है।
छूट का लाभ भी
ऑनलाइन ही
छूट का लाभ भी सिर्फ यूपीआई, डेबिट-क्रेडिट कार्ड या नेट बैंकिंग से भुगतान करने पर ही मिलेगा। नकद भुगतान करने वाले यात्रियों के लिए दरवाजा पूरी तरह बंद है। सवाल यह है कि क्या रेलवे ने ग्रामीण इलाकों और बुजुर्ग यात्रियों की वास्तविक स्थिति पर कभी गौर किया?
नई रैपर में पुराना माल
रेलवन ऐप के आर-वॉलेट से ३ प्रतिशत वैâशबैक को ‘दोहरा फायदा’ बताकर पेश किया जा रहा है, जबकि यह सुविधा पहले से ही मौजूद थी। यानी नई योजना के नाम पर पुरानी बातों को नए रैपर में परोसने की कोशिश साफ दिखाई दे रही है। ऊपर से यह छूट सिर्फ रेलवन ऐप तक ही सीमित है। दूसरे किसी प्लेटफॉर्म पर नहीं। मतलब यात्रियों को एक ही ऐप में बांधने की रणनीति, विकल्पों की आजादी नहीं।
राहत कम, प्रचार ज्यादा
सीआरआईएस को सॉफ्टवेयर बदलाव के निर्देश जरूर दिए गए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मामूली छूट, सीमित टिकट और शर्तों की लंबी फेहरिस्त के बीच यह योजना यात्रियों के लिए राहत कम और प्रचार ज्यादा साबित हो रही है। नववर्ष में रेलवे का यह कदम भले ही डिजिटल इंडिया का नारा दोहराता हो, लेकिन आम यात्री आज भी यही सवाल पूछ रहा है कि क्या ३ प्रतिशत की छूट से सच में उसकी परेशानी कम होगी, या यह सिर्फ आंकड़ों और प्रचार का खेल है?
छह महीने की मियाद, फायदा नाममात्र
रेलवे ने यह योजना १४ जनवरी २०२६ से १४ जुलाई २०२६ तक लागू करने की घोषणा की है, लेकिन ३ प्रतिशत की मामूली छूट यात्रियों की जेब को कोई ठोस राहत नहीं दे पाएगी। स्टेशन पर लगने वाली लंबी कतारों का हवाला देकर डिजिटल टिकटिंग का प्रचार तो किया गया, लेकिन डिजिटल साक्षरता, नेटवर्क की दिक्कतें और तकनीकी परेशानियों पर रेलवे पूरी तरह खामोश है।
