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पड़ताल : सुरक्षा में खड़ी मुंबई पुलिस, खुद असुरक्षित … थक रही है खाकी सो रहा है सिस्टम! …४२७ मौतें और सिस्टम की चुप्पी

जेदवी

मुंबई को सुरक्षित रखने वाली खाकी आज खुद सबसे ज्यादा असुरक्षित हालात में खड़ी है। जिस पुलिस बल के कंधों पर शहर की सुरक्षा का बोझ है, उसी बल के जवान आज तनाव, थकान और उपेक्षा के नीचे दबते जा रहे हैं। यह कोई भावनात्मक आरोप नहीं, बल्कि आंकड़ों की कठोर सच्चाई है। साल २०२२ से जून २०२५ के बीच मुंबई पुलिस ने ४२७ जवान खो दिए।

इनमें २५ पुलिसकर्मियों ने आत्महत्या की, ७५ जवानों की मौत हृदयाघात से हुई और बाकी मौतें वैंâसर, गंभीर बीमारियों, पारिवारिक तनाव व दुर्घटनाओं के कारण दर्ज की गईं। सरकारी और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, १०० से ज्यादा मौतें सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से तनाव, वर्क ओवरलोड और मानसिक दबाव से जुड़ी मानी जा रही हैं। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि सिस्टम पर लगा सीधा आरोप है।
‘हार्ट अटैक या सिस्टम अटैक?
७५ जवानों की मौत हार्ट अटैक से होना क्या सामान्य है? विशेषज्ञ मानते हैं कि अनियमित नींद, लगातार तनाव, मानसिक दबाव और खराब खानपान दिल के दौरे की बड़ी वजह हैं। पूरी रात बंदोबस्त, सुबह लोकल ट्रेन की धक्का-मुक्की, कुछ घंटों की नींद और फिर ड्यूटी, ऐसे में शरीर कब तक साथ देगा? हार्ट अटैक अचानक नहीं आता, यह सिस्टम की वर्षों की बेरुखी का नतीजा होता है।
लोकल ट्रेन बना जानलेवा सफर
३१ दिसंबर की शाम करीब ५ बजे कांस्टेबल सास्ते ड्यूटी पूरी करने के बाद लोकल ट्रेन से कल्याण स्थित अपने घर लौट रहे थे। जब ट्रेन मुलुंड स्टेशन पर पहुंची, उस वक्त वे ट्रेन के फुटबोर्ड पर खड़े थे। इसी दौरान अचानक उनका संतुलन बिगड़ा और वे प्लेटफॉर्म पर गिर पड़े। गिरने से उन्हें गंभीर चोटें आईं। पुलिस भले ही इसे नेचुरल डेथ बता रही हो, लेकिन यह मामला अब भी जांच के दायरे में है।
आत्महत्या: सबसे खामोश आरोप
२५ आत्महत्याएं ये व्यक्तिगत पैâसले नहीं, बल्कि संस्थागत विफलता की चीख हैं। काम का दबाव, पारिवारिक तनाव, आर्थिक परेशानी, वरिष्ठों का मानसिक दबाव और काउंसलिंग सिस्टम की कमी लेकिन हर केस में एक ही लाइन लिखी जाती है ‘व्यक्तिगत कारण’ और फाइल बंद।
लोकल ट्रेन: ड्यूटी के बाद मौत का सफर
आज भी बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी लोकल ट्रेन से सफर करते हैं। थका हुआ शरीर, भीड़ से भरी ट्रेन और प्लेटफॉर्म की अफरा-तफरी मुलुंड, ठाणे, कुर्ला जैसे इलाकों में ड्यूटी के बाद ट्रेन हादसों में जवानों की मौतें इस सच्चाई को उजागर करती हैं।
नियम फाइलों में, हकीकत सड़कों पर पुलिस मैनुअल कहता है कि ८–१२ घंटे से ज्यादा ड्यूटी नहीं, ओवरटाइम के बाद आराम जरूरी, लेकिन जमीनी सच्चाई में आदेश मौखिक होते हैं, रिकॉर्ड में ड्यूटी खत्म और असल में ड्यूटी जारी रहती है।
सिस्टम से सवाल
क्या मुंबई पुलिस के लिए तय ड्यूटी आवर्स होंगे? क्या तनाव को ड्यूटी-जनित बीमारी माना जाएगा? या फिर खाकी यूं ही खामोशी से गिरती रहेगी? मुंबई सुरक्षित है, पर क्या मुंबई पुलिस सुरक्षित है? इस सवाल का जवाब अब टालना, शहर की सुरक्षा से खिलवाड़ होगा। ड्यूटी, तनाव और मौत के आंकड़े सिस्टम को कटघरे में खड़ा करते हैं। हार्ट अटैक से आत्महत्या तक, मुंबई पुलिस की अनसुनी चीख १६ घंटे की ड्यूटी और २४ घंटे की जिम्मेदारी खाकी की कुर्बानी पर कब जागेगा प्रशासन?

परिवार भुगतता है असली खामियाजा
मौत के बाद मुआवजा, आश्वासन और दो दिन की सुर्खियां मिलती हैं। लेकिन बच्चों का भविष्य, पत्नी का अकेलापन और माता-पिता का सहारा, इनका कोई सिस्टम नहीं।

१६ घंटे की ड्यूटी, २४ घंटे की जिम्मेदारी
मुंबई पुलिस की ड्यूटी किताबों में भले ही ८ या १२ घंटे की हो, लेकिन हकीकत में जवान १६ से २४ घंटे तक लगातार काम करता है। वीआईपी मूवमेंट, चुनाव, त्योहार, जुलूस, दंगे, हादसे और इन सबके बीच स्टाफ की भारी कमी। खाकी पहनते ही जवान का समय, शरीर और मन विभाग के हवाले हो जाता है। एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, ‘ड्यूटी खत्म होने का समय तय होता है, लेकिन जिम्मेदारी कभी खत्म नहीं होती।

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