मुख्यपृष्ठस्तंभरिपोर्टर डायरी : सफेदी का मौसम, राजनीति ने फिर कपड़े बदले

रिपोर्टर डायरी : सफेदी का मौसम, राजनीति ने फिर कपड़े बदले

आदित्य जैन

मुंबई की सुबह है। दादर की कपड़ा दुकानों के बाहर जो रंग सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है, वह किसी पार्टी का झंडा नहीं सफेद कपड़ा है। कुर्ते, शर्ट, साड़ियां, टोपी सब एक ही रंग में सजे हैं। चुनावी मौसम का सबसे सटीक संकेत शायद यही होता है, जब राजनीति बोलने से पहले पहनावे बदल लेती है।
ठाणे, डोंबिवली, नई मुंबई से लेकर राज्य के भीतरी हिस्सों तक यही दृश्य दोहराया जा रहा है। प्रचार तेज होते ही नेताओं और कार्यकर्ताओं की अलमारियों से रंग अचानक गायब हो जाते हैं। सफेद पोशाक सामने आ जाती है क्योंकि चुनाव में सबसे पहले साफ दिखना जरूरी होता है, साफ होना नहीं।
दादर की एक दुकान में बैठे व्यापारी का वाक्य राजनीति का पूरा सार खोल देता है। साहब, सफेद कपड़ा पहनने के लिए नहीं, दिखाने के लिए लिया जाता है। शहर-शहर घूमते प्रचार दलों में धूप, धूल और पसीने से जूझते सफेद कुर्ते यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि सादगी अभी जिंदा है। लेकिन जिन गांवों में सड़क अधूरी है, पानी अनियमित है और रोजगार सवाल बना हुआ है। वहां सफेदी सिर्फ पोशाक तक सीमित रह जाती है। खादी, मिनिस्ट्री और शहजादा जैसे ब्रांड अचानक चर्चा में हैं। महीनों से सुस्त पड़ा कपड़ा बाजार चुनाव आते ही रफ्तार पकड़ लेता है। व्यापारी खुश हैं सफेद रंग बिक रहा है, जमकर बिक रहा है। लेकिन इस सफेद भीड़ के बीच सवाल अब भी धूसर हैं। क्या कपड़ों की सफेद से राजनीति भी साफ हो जाती है? या हर चुनाव में यही पोशाक बदलने का पुराना नाटक दोहराया जाता है?
फिलहाल जवाब जनता के हाथ में नहीं, दुकानों के वैâश काउंटर पर है, जहां सफेद कपड़ों की बिक्री, चुनावी वादों से तेज चल रही है।

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