के. पी. मलिक
जब गांव की जिंदगी पर बड़ी औद्योगिक फैक्ट्री का साया पड़ता है, तो सिर्फ भीमकाय मशीन और कंक्रीट के जंगल की बात नहीं होती बल्कि सपनों में दिखाए जाने वाले एथेनॉल जैसे प्लांट के नाम पर जो जमीन, पानी और हवा की बर्बादी छुपी है, वह दूरगामी और अत्यधिक खतरनाक है।
सूख जाएगा जल
एक एथेनॉल प्लांट में रोजाना करीब ६० लाख लीटर भूजल का गहन दोहन होता है। जो पानी न नदियों से आएगा, न बारिश से, बल्कि यह सीधे धरती के भीतर से खींचा जाएगा। नतीजा? ट्यूबवेल गहरे होंगे, बिजली की दरें बढ़ेंगी और किसान पानी के लिए पूरी तरह इन निजी कंपनियों पर निर्भर हो जाएंगे। यही पानी मुनासिब और साफ रहना छोड़ देगा और सालों बाद यह पानी खत्म होने की गंभीर समस्या बन जाएगा।
जीवन दायिनी हवा का हाल उससे भी बदतर होगा। बड़े-बड़े बॉयलरों में जलता हुआ कोयला और बायोमास हवा को जहरीला कर देगा। धूल, सल्फर, नाइट्रोजन गैसें और राख खलिहान की फसलों पर जमेंगी और किसानों के फेफड़े खराब करेंगी। हालांकि कागजों में जहां प्रदूषण नियंत्रण की बात होती है, वहां असलियत जमीन से ऊपर उठती धुआं के रूप में सामने आएगी। जीरो लिक्विड डिस्चार्ज का वादा कितनी बार धोखा देता है, इसका सबसे ताजा उदाहरण पंजाब है, जहां भूजल रसायनों से दूषित हुआ। एक बार जमीन का पानी जहरीला हो जाए, तो दशकों तक उसी जहर में फंसे रहना पड़ता है।
बांझ बन जाएगी जमीन
प्लांट से निकलने वाली राख और ठोस अपशिष्ट भी खतरनाक हैं। रोजाना करीब ४४० टन राख के पहाड़ जो कागजों में सीमेंट और र्इंट उद्योग तक जाने की बात है लेकिन असलियत में खेतों, नहरों और जमीन पर जमा होंगे जिससे मिट्टी की उर्वरता घटेगी और जमीनी जीवन खत्म होता दिखेगा। इसके अलावा प्लांट में रोजाना प्रयोग होने वाला यातायात भी भयावह होगा जैसे ट्रकों की आवाज, धूल और सड़कें जाम। जहां पहले सुकून था, वहां मशीनों की आवाज रात-दिन गूंजेगी।
दरअसल जब फसलों की बात आती है, तो परेशानी और बढ़ती दिखाई देती है। एथेनॉल पैâक्ट्री की मांग से धान, मक्का जैसी पानी की भयंकर जरूरत वाली फसलें अधिक बोई जायेंगी, जो जमीन के सीमित पानी को और अधिक सोखती हैं। पानी की यह लड़ाई किसान और पैâक्ट्री के बीच दिन-ब-दिन गहरी होती जाएगी और जो एक दिन बड़ी आपदा बनकर हमारे सामने मुंह बाहे खड़ी होगी क्योंकि यह कोई सामान्य पैâक्ट्री नहीं, यह एक पर्यावरणीय और सामाजिक समस्या की शुरुआत है। यह सवाल सबके लिए खुला है कि क्या हम अपनी जमीन, पानी और हवा की इतनी भारी कीमत चुकाकर ये खोखली आधुनिक ‘प्रगति’ स्वीकार करेंगे?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक एवं ग्रामीण मामलों के जानकार हैं)
