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संपादकीय : मुंबई का मेयर मराठी ही!.. कायरों, थू है तुम्हारी जिंदगी पर!

भारतीय जनता पार्टी ने आखिर कृपाशंकर के मुख से अपनी कड़ुवाहट उगल ही दी है। कृपाशंकर ने कहा कि महानगरपालिका के चुनावों में इतने अधिक नगरसेवक चुने जाएंगे कि मुंबई का महापौर उत्तर भारतीय समुदाय से ही बनेगा। कृपाशंकर के इस बयान से मुंबई को लेकर भाजपा की मंशा उजागर हो गई है। कृपाशंकर कभी कांग्रेसी नेता थे। आर्थिक अपराध शाखा ने उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में जांच शुरू की थी। वे अवैध रूप से अर्जित संपत्ति का हिसाब नहीं दे पाए थे। उनकी गिरफ्तारी तय थी, लेकिन प्रथानुसार कृपाशंकर मुख्यमंत्री फडणवीस के समक्ष शरणागत हुए और फडणवीस ने कृपाशंकर को साफ-सुथरा चरित्र का प्रमाणपत्र देकर भाजपा की वाशिंग मशीन में डाल दिया। कृपाशंकर ने उत्तर प्रदेश के जौनपुर लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उत्तर भारतीयों ने ही उन्हें हरा दिया। यानी जो उत्तर भारत में हारे हैं, वही मुंबई में उत्तर भारतीय मेयर बनाने जा रहे हैं। कृपाशंकर ने भाजपा की टांगे भाजपा के ही गले में बांध दी हैं। असल में इस चुनाव में भाजपा के पैरों तले की जमीन खिसक गई है। इसलिए वे मुंबई में मराठी-गैरमराठी विवाद को हवा देकर चुनाव लड़ना चाहते हैं। मुंबई, ठाणे, मीरा-भयंदर और नई मुंबई जैसे इलाकों में उत्तर भारतीयों की बड़ी संख्या है। इनमें से एक बड़ा हिस्सा बिहार और उत्तर प्रदेश से रोजी-रोटी कमाने के लिए मुंबई आया है। वे मेहनत करते हैं और अपना जीवन यापन करते हैं। कृपाशंकर या उनके नेता खुद की जेब से
`मालपानी’ निकालकर
इस वर्ग का पेट नहीं भरते, लेकिन कृपाशंकर जैसे नेता इस भ्रम में जी रहे हैं कि ये सभी हिंदी भाषी उनके गुलाम हैं और मूक भेड़-बकरियों की तरह उनका अनुसरण करेंगे और जहां वे कहेंगे, वहीं ये अपना वोट डालेंगे। मुंबई और आस-पास के शहरों में हिंदी भाषी मराठी लोगों के साथ घुल-मिलकर रहते हैं। इनमें से अधिकतर लोग चार-पांच पीढ़ियों से यहीं रह रहे हैं। इसलिए उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि यही है। ऐसे में ये लोग दूध में नमक डालकर इस रिश्ते को बर्बाद करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? मुंबई और महाराष्ट्र के हिंदी भाषी लोगों ने `कोरोना’ काल में यह अनुभव किया है कि उत्तर भारत के शासक हिंदी भाषी लोगों के संकट के समय अपने दरवाजे बंद कर देते हैं। उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री कार्यकाल में जाति, प्रांत या भाषा की परवाह किए बिना सभी को इलाज और अनाज उपलब्ध कराया गया। इसके उलट, उत्तर प्रदेश और बिहार में अपने गांवों में लौटने वाले हिंदी भाषी लोगों को राज्य के द्वार पर ही रोक दिया गया था। भाजपा सरकार ने उनके लिए उनके अपने राज्यों, जिलों और गांवों के दरवाजे बंद कर दिए थे। इन सभी हिंदी भाषी लोगों को अपने राज्य में जाने से रोक दिया गया। दो-चार दिनों तक ये लोग अपने बाल-बच्चों के साथ बिना भोजन-पानी के तड़पते रहे थे, तब न तो कृपाशंकर उनकी मदद के लिए आगे आए और न ही भाजपा। अब ये महान लोग उन्हीं उत्तर भारतीयों की जिंदगी पर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने आए हैं! उत्तर भारतीयों को ऐसे स्वार्थी नेताओं को
उनकी जगह दिखानी
चाहिए। अब भाजपा आदित्यनाथ महाराज, केशव मौर्य, ब्रजेश पाठक, सम्राट चौधरी, मैथिली ठाकुर, मध्य प्रदेश और राजस्थान के भाजपाई मुख्यमंत्री और मंत्रियों की फौज मुंबई में उतारने वाली है, वो भी सिर्फ इसलिए कि महाराष्ट्र की राजधानी में मराठी महापौर न बन पाए। इन सबके बावजूद, महाराष्ट्र की सरकार जो मराठी पर जीवित है और कायर शिंदे इस साजिश पर चुप्पी साधे हुए हैं। शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे के नाम पर सत्ता का उपभोग करने वाली अमित शाह की चरण चाटने वाली सेना तो कृपाशंकर के इस मराठीद्वेषी वक्तव्य पर मुंह में दही जमाए बैठी है। कृपाशंकर तो छोड़िए भाजपा और मिंधे के सौ-सौ बाप भी यहां पर आ जाएं, तब भी वे मुंबई से मराठी मानुष के रिश्ते को तोड़ने में नाकाम रहेंगे। मुंबई भावनात्मक, भौगोलिक और ऐतिहासिक रूप से मराठी मानुष की ही है और अगर मुंबई पर किसी गैरमराठी मेयर को थोपने की कोशिश की गई, तो संयुक्त महाराष्ट्र संघर्ष की तरह भयंकर विद्रोह भड़क उठेगा। अगर भाजपा के `कृपाशंकर’ छाप नेता यह नहीं समझते कि मुंबई पर सिर्फ पैसे से कब्जा नहीं किया जा सकता, तो उन्हें फोर्ट स्थित हुतात्मा स्मारक का इतिहास समझना चाहिए। उस समय मुंबई समेत संयुक्त महाराष्ट्र के लिए १०६ लोगों ने अपना बलिदान दिया। उस बलिदान की परंपरा आगे भी जारी रहेगी। कृपाशंकर का यह बयान `मुंबई का मेयर उत्तर भारतीय होगा।’ यह भाजपा की अधिकृत भूमिका है, लेकिन इस मामले में नकली शिवसेना लाचार होकर लीपा-पोती कर रही है। ये बेबस लोग कह रहे हैं, `मुंबई के मेयर के बारे में कृपाशंकर का बयान उनकी निजी राय है।’ (संक्षेप में, हमने इसमें एक `पूंछ’ डाल दी है, जिसे हटाया नहीं जा सकता।) अरे, थू है तुम्हारी जिनगानी पर!

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