सना खान
अजनबी होने के बाद सबसे मुश्किल काम होता है खुद को फिर से पहचानना। आईने में चेहरा वही होता है, पर नजर नहीं मिलती। जैसे हम जानते हों, गलती किसी और की नहीं थी। क्योंकि जो इंसान हम थे, वो अचानक नहीं खोया, वो हर उस बार थोड़ा-थोड़ा छूटा, जब हमने खुद से ज्यादा किसी और को चुन लिया। शुरुआत में लगता है, शायद वक्त सब ठीक कर देगा। पर सच यह है वक्त कुछ ठीक नहीं करता, बस हमें उस कमी के साथ जीना सिखा देता है, जिसे हम भर नहीं पाए।
किसी को बनाए रखने के लिए हमने खुद को समझाया, खुद को रोका, खुद को बदला और हर बार थोड़ा-सा खुद से दूर हो गए। कम बोलना, कम महसूस करना, कम उम्मीद रखना, ये आदत नहीं थी ये समझौते थे। धीरे-धीरे हमने अपने ही हिस्सों को खोया नहीं, हमने उन्हें जरूरी नहीं समझा। पर सच यह भी है, जो खोया है, वो खत्म नहीं हुआ। वो अब भी कहीं अंदर चुपचाप मौजूद है, बस इस बार इंतजार में है कि हम उसे फिर से किसी और के लिए न छोड़ दें। खुद को वापस पाना कोई एक दिन का पैâसला नहीं होता यह हर दिन लिया गया एक ईमानदार पैâसला होता है। थोड़ा-सा फिर से खुलना, थोड़ा-सा फिर से महसूस करना और सबसे मुश्किल अपने ही पैâसलों पर फिर से भरोसा करना। क्योंकि इस बार डर दूसरों से नहीं अपने पुराने रूप से होता है कि कहीं फिर हम खुद को मनाने लगें और किसी और को बचाते-बचाते खुद को फिर खो दें। लेकिन शायद खुद को वापस पाने का मतलब पहले जैसा बनना नहीं होता बल्कि यह मान लेना होता है कि हम बदल गए हैं और इस बार यह बदलाव हमारे खिलाफ नहीं, हमारे लिए है।
