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भाजपा व चुनाव आयोग के बीच पक चुकी है `खिचड़ी’ … `सीक्रेट डील’ फिक्स है!

बंद कमरे में भाजपा उम्मीदवार व ईसीआई अधिकारी की `गुप्त मीटिंग’ से गरमाई राजनीति
कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंची टीएमसी
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
पश्चिम बंगाल की सियासत में चुनावी तापमान अचानक और तेज हो गया है। तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा और चुनाव आयोग के बीच मिलीभगत के गंभीर आरोप लगाकर बड़ा सियासी बवाल खड़ा कर दिया है। पार्टी का दावा है कि मगराहाट पश्चिम सीट से भाजपा उम्मीदवार और चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के बीच बंद कमरे में गुप्त बैठक हुई, जिसने चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी विवाद को लेकर तृणमूल कांग्रेस ने अब कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जहां इस कथित ‘सीक्रेट डील’ की जांच की मांग की गई है। मामले के सामने आने के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है और आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा और चुनाव आयोग के बीच `जीत’ की `खिचड़ी’ पक चुकी है।
बता दें कि यह पूरा घटनाक्रम दक्षिण २४ परगना की १४२ मगराहाट पश्चिम सीट से जुड़ा है। टीएमसी का आरोप है कि पुलिस ऑब्जर्वर के ठहरने की व्यवस्था अलीपुर स्थित आईपीएस मेस में थी, लेकिन वे वहां न रुककर डायमंड हार्बर के एक निजी टूरिस्ट लॉज में ठहरे। आरोप है कि २० अप्रैल को इसी लॉज में ऑब्जर्वर ने बीजेपी उम्मीदवार गौर घोष के साथ एक अनौपचारिक बैठक की। टीएमसी नेता राजीव कुमार ने दावा किया है कि इस मुलाकात के पुख्ता सीसीटीवी फुटेज उनके पास हैं, जिन्हें कोर्ट को सौंप दिया गया है। टीएमसी ने संविधान के आर्टिकल २२६ के तहत कलकत्ता हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि चुनाव ऑब्जर्वर का पद पूरी तरह स्वतंत्र होना चाहिए। टीएमसी का कहना है कि अगर चुनाव प्रक्रिया की निगरानी करने वाले अधिकारी ही प्रभावित दिखेंगे, तो जनता का लोकतंत्र से भरोसा उठ जाएगा।

कलकत्ता हाई कोर्ट में जल्द होगी सुनवाई
कलकत्ता हाई कोर्ट इस मामले पर जल्द सुनवाई कर सकता है। कोर्ट के सामने मुख्य रूप से यह चुनौती होगी कि क्या सीसीटीवी फुटेज से यह साबित होता है कि मुलाकात राजनीतिक उद्देश्यों के लिए थी। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि क्या ऑब्जर्वर का सरकारी मेस छोड़कर लॉज में रुकना नियमों का सीधा उल्लंघन है।
चुनाव आयोग की साख पर बड़ी चुनौती
पश्चिम बंगाल का चुनाव हमेशा से ही शिकायतों और विवादों के लिए चर्चित रहा है। लेकिन एक उच्च पदस्थ पुलिस ऑब्जर्वर पर सीधे तौर पर मिलीभगत का आरोप लगना, चुनाव आयोग की साख के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।

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