अमेरिका हमेशा चाहता है कि दुनिया में शांति बनी रहे, लेकिन यह सच नहीं है। यदि शांति बनी रही तो उनके हथियार कौन खरीदेगा? खुद को महाशक्ति मानने के कारण, शांति की रक्षा करने की चौधराहट केवल उस पर है, ऐसा भी अमेरिका को लगता है; लेकिन खुद अपने ही देश की अशांति रोकने में मौजूदा ट्रंप प्रशासन कमजोर पड़ गया है। गोलीबारी और हिंसा जैसी घटनाएं अमेरिका में बढ़ी हैं। ट्रंप की डिनर पार्टी में घुसकर गोलीबारी करने तक अपराधियों के हौसले बढ़ गए हैं। जो भारत में हो रहा है, वैसा ही कुछ अमेरिका में होता दिख रहा है। २५ अप्रैल की रात ‘वॉशिंगटन हिल्टन’ में आयोजित ‘व्हाइट हाउस’ प्रेस एसोसिएशन के भोजन समारोह में सुरक्षा व्यवस्था भेद कर एक बंदूकधारी घुसा और उसने गोलियां चलाईं। इससे अमेरिका के प्रेसिडेंट की सुरक्षा व्यवस्था अभेद्य होती है, इस दंतकथा में दरारें पड़ गईं। खुद प्रे. ट्रंप और श्रीमती मेलानिया ट्रंप, उप-राष्ट्रपति जे.डी. वेंस सहित ट्रंप का पूरा वैâबिनेट इस कार्यक्रम में मौजूद था यानी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रही होगी, बावजूद कोले थॉमस एलन नामक यह ३१ वर्षीय अमेरिकी नागरिक कार्यक्रम स्थल पर घुस गया। हिल्टन होटल में वह पहले से ही ‘गेस्ट’ था। इसलिए वह बाहरी मुख्य सुरक्षा घेरे को आसानी से पार कर गया। उसके पास हथियार था और किसी भी मेटल डिटेक्टर व्यवस्था ने उसके हथियार को नहीं पकड़ा। यानी सुरक्षा की मुख्य व्यवस्था ही खोखली साबित हुई। हमलावर होटल की लॉबी से आगे पहुंचा और उसने गोलीबारी की। सीक्रेट सर्विस ने तुरंत प्रतिकार किया, लेकिन हमलावर तब तक काफी अंदर चला गया था। गोलीबारी के बाद प्रे. ट्रंप आदि अति-महत्वपूर्ण व्यक्तियों को वहां से सुरक्षित हटा लिया गया। अन्य मेहमान टेबल के नीचे छिप गए और उस डिनर पार्टी का कचरा हो गया। ट्रंप पर यह पहला हमला नहीं है। १३ जुलाई २०२४ को पेंसिल्वेनिया के बटलर में ट्रंप की चुनावी सभा पर गोलीबारी हुई थी। गोली ट्रंप के
कान को छूकर निकल गई
थी और ट्रंप सौभाग्य से बच गए थे। यह घटना गंभीर ही थी। ऐसे हमले केवल किसी प्रमुख व्यक्ति पर हमले नहीं होते, बल्कि अमेरिका जैसे समृद्ध देश में लोकतंत्र और राजनीतिक हिंसा की बढ़ती प्रवृत्ति का प्रमाण होते हैं। प्रे. ट्रंप पर हुए हमले से भारत के प्रधानमंत्री मोदी व्याकुल हो गए और उन्होंने ट्रंप को संदेश भेजा। उन्होंने हिंसा की निंदा की; लेकिन इजरायल ने गाजा पर बमबारी करके हजारों छोटे बच्चों को मार डाला और तेहरान में स्कूल पर बम गिराकर अमेरिका-इजरायल ने संयुक्त रूप से २०० निर्दोष लड़कियों को मार डाला, उस क्रूरता की निंदा भारत के प्रधानमंत्री ने बिल्कुल नहीं की। प्रे. ट्रंप पर हमले के प्रयास से प्रधानमंत्री मोदी दुखी हुए, यह अजीब है। ट्रंप पर हमले की निंदा करना शिष्टाचार है, यह सच है, लेकिन गाजा-तेहरान में हुई छोटी लड़कियों की हत्या का धिक्कार करना संवेदना है। ट्रंप पर पहले हमले के बाद ट्रंप की लोकप्रियता बढ़ी और २०२४ के चुनाव में उन्होंने जीत हासिल की। १५ सितंबर २०२४ को फ्लोरिडा के गोल्फ कोर्स पर ट्रंप पर दूसरा हमला हुआ और कल वॉशिंगटन में तीसरा हमला हुआ। इस तरह हमलों का ‘इजा, बीजा, तीजा’ (एक, दो, तीन) हो गया। ट्रंप ने भगवान का आभार माना। ‘भगवान की कृपा से बचा’, ऐसा उन्होंने कहा। उसी भगवान की कृपा से तेहरान की दो सौ लड़कियां और गाजा के बच्चे बच जाते तो बेहतर होता। राजनीति में खतरे बढ़ रहे हैं। लोकतंत्र में मतभेद होने के बावजूद हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता। भारत में इंदिरा गांधी, राजीव गांधी की बलि राजनीतिक हिंसा ने ली। पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और कई नेता मारे गए। भारत की संसद ने भी हमला देखा और रक्तपात सहा। कश्मीर के पुलवामा, पहलगाम के हमलों में सैनिकों और पर्यटकों की बलि ली गई।
बुद्ध के देश में शांति
होनी चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से हिंसा है। मणिपुर आज भी जल रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को पश्चिम बंगाल के चुनावों में क्या होगा, इसकी चिंता है। प्रे. ट्रंप के कार्यक्रम में हुई गोलीबारी से मोदी को भावनात्मक धक्का ही लगा। उस दुख से उबरने के लिए वे फिर से बंगाल के चुनाव प्रचार में उतर गए। मूलत: प्रे. ट्रंप अत्यधिक आक्रामक और हठधर्मी हैं। दुनिया के कई देशों पर वे दबाव डालते हैं और मनमानी करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री वर्तमान में उसी श्रेणी में आते हैं। हमले से बचने के बाद प्रे. ट्रंप ने सीक्रेट सर्विस के धैर्य की प्रशंसा की। ‘जब आप प्रभावी होते हैं, तब वे आप पर हमला करते हैं’, ऐसा ट्रंप कहते हैं। अब हमला वास्तव में किसने किया यह बताइए। प्रे. ट्रंप की नीतियों के खिलाफ लाखों अमेरिकी जनता सड़कों पर उतरी। उन्हें अब प्रे. ट्रंप नहीं चाहिए और ट्रंप पर हमला करने वाला व्यक्ति वैâलिफोर्निया का ही नागरिक है। इसलिए हमलावर ईरान या ओमान देश का नहीं है। अमेरिका का ही नागरिक है। प्रे. ट्रंप को यही बात गंभीरता से लेनी चाहिए। अमेरिका की जनता अपने ही राष्ट्रपति के खिलाफ सड़क पर उतरती है, यहां तक ठीक था; लेकिन उनमें से ही एक युवक हाथ में बंदूक लेकर ट्रंप को चुनौती देता है, तब चिंता बढ़ती है। ट्रंप ने भारत सहित अन्य कुछ देशों को नरक की उपमा दी। प्रत्यक्ष उनके देश में क्या शुरू है? तीन हमले हुए और तीनों बार ट्रंप बच गए, कहना पड़ेगा कि उनका नसीब और उनकी सौभाग्यवती का ‘सिंदूर’ प्रबल है। भारत में ट्रंप के समर्थन में हिंदुत्ववादियों के ‘होमहवन’ (यज्ञ) शुरू रहते हैं। उन यज्ञों के कारण ही ट्रम्प के जीवन की डोर मजबूत रही। भारत के नव-हिंदुत्ववादियों की प्रार्थनाओं के कारण ट्रंप बच गए, यह भारतीय राजदूत द्वारा ‘व्हाइट हाउस’ को बताया ही गया होगा। प्रे. ट्रंप को आधिकारिक रूप से बताने के लिए प्रधानमंत्री मोदी वॉशिंगटन रवाना हो जाएं तो भी हैरानी नहीं होनी चाहिए। भारत में हिंसा भड़के तो चलेगा, लेकिन प्रे. ट्रंप के देश में हिंसा को स्थान नहीं होना चाहिए।
