छोटी कंपनियों का भी बजट हो रहा है गड़बड़
सामना संवाददाता / मुंबई
इन दिनों चारों तरफ एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की धूम मची हुई है। कहा जा रहा है कि एआई से काम कराना सस्ता है और कई कर्मचारियों की नौकरियां जा रही हैं। मगर एक रिपोर्ट पर यदि यकीन किया जाए तो एआई कुछ कंपनियों के लिए काफी महंगा साबित हो रहा है।
वर्षों तक इस क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां निवेशकों के धन के सहारे अपने मजबूत तंत्र को विकसित करती रहीं, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। जैसे-जैसे निवेश की गति धीमी हो रही है, ये कंपनियां अपने खर्च की भरपाई ग्राहकों से करने की ओर बढ़ रही हैं। जिन व्यवसायों का काम कोडिंग, संचालन और स्वचालन के लिए इस तकनीक पर अधिक निर्भर है, वे अब्ा इसके बढ़ते खर्च का दबाव महसूस कर रहे हैं। जो तकनीक पहले उत्पादकता बढ़ाने का साधन मानी जा रही थी, वही अब एक ऐसा खर्च बनती जा रही है जिसे कंपनियों के प्रमुख न तो नजरअंदाज कर पा रहे हैं और न ही अपने बजट में आसानी से समायोजित कर पा रहे हैं। एक कंपनी के मुख्य अधिकारी प्रवीन नेप्पल्ली नागा ने हाल ही में खुलासा किया कि वर्ष २०२६ के शुरुआती कुछ महीनों में ही कंपनी का सालभर का एआई बजट समाप्त हो गया। इस खर्च में तेज बढ़ोतरी का मुख्य कारण कोडिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले उन्नत उपकरणों का अत्यधिक उपयोग रहा। छोटी कंपनियां भी इसी तरह की चुनौती का सामना कर रही हैं।
एक महीने में बजट खर्च
एक कंपनी के प्रमुख अमोस बार-जोसेफ के अनुसार, उनकी चार सदस्यीय टीम ने सालभर का बजट करीब एक लाख तेरह हजार डॉलर का खर्च केवल एक महीने में ही इस तकनीक पर कर दिया। एक प्रमुख चिप निर्माता कंपनी के अधिकारी ब्रायन कैटांजारो ने बताया कि उनकी टीम के लिए गणनात्मक संसाधनों पर होने वाला खर्च कर्मचारियों के वेतन से भी अधिक हो चुका है।
