कृषि, पर्यावरण और समाज के संतुलन पर विशेषज्ञों ने रखा जोर
तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज की ओर से विकसित भारत 2047 के तहत सतत विकास लक्ष्यों- एसडीजीएस पर आयोजित नेशनल कॉन्फ्रेंस में शिक्षाविदों, पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने सतत कृषि, जैव विविधता संरक्षण, जल संसाधन, जलवायु लचीलापन और विकसित भारत 2047 के लक्ष्यों पर सार्थक विचार-विमर्श किया। विशेषज्ञों ने कहा कि 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए कृषि, पर्यावरण और समाज के बीच संतुलित एवं टिकाऊ विकास मॉडल अपनाना अनिवार्य है।
यूपी के साथ-साथ उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों के शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने ब्लेंडेड मोड में सम्मेलन में भाग लिया। तीर्थंकर महावीर कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर साइंसेज के एक दर्जन यूजी और पीजी के विद्यार्थियों ने कॉन्फ्रेंस की थीम पर शोध पत्र और पोस्टर प्रस्तुत किए। निर्णायक मंडल द्वारा श्रेष्ठ शोध पत्र और पोस्टर को पुरस्कृत किया गया। एग्रीकल्चर कॉलेज के डीन प्रो. प्रवीण कुमार जैन और कॉन्फ्रेंस सचिव प्रो. गणेश दत्त भट्ट ने बताया कि उत्कृष्ट शोध पत्र का खिताब पीजी के छात्र सचिन यादव को मिला। पोस्टर प्रस्तुति में कुमाऊं यूनिवर्सिटी की फैकल्टी डॉ. हिमानी गार्गी विजेता रहीं, जबकि मौखिक प्रस्तुति में यूजी के आर्या, लोचन व्यास, मनी कुमारी और आनंद राज अव्वल रहे। सम्मेलन के समापन समारोह का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ और अंत में सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। संचालन डॉ. इशिता मिश्रा और डॉ. सुषमा सिंह ने किया।
ईको संस्कृति कलेक्टिव फाउंडेशन के मानद अध्यक्ष डॉ. एसएस बिस्वास ने घटते जंगलों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जैव विविधता के संरक्षण और संवर्धन के लिए पौधों की संख्या बढ़ाना आवश्यक है। उन्होंने कनाडा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां प्रति व्यक्ति पेड़ों की संख्या लगभग नौ हजार है, जबकि भारत में यह आंकड़ा चिंताजनक रूप से कम है। इसके लिए स्थानीय समुदायों को एकजुट करने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि ईको संस्कृति ने ग्रीन जॉब्स और स्किलिंग के माध्यम से ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित किया है और करीब 25 लोगों को पर्यटन मार्गदर्शक के रूप में तैयार किया गया है। उन्होंने गोवा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां के कुछ गांवों में शत-प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग हो रहा है। साथ ही इंदौर को स्वच्छता और पर्यावरण प्रबंधन का उत्कृष्ट मॉडल बताते हुए कहा कि मजबूत कचरा पृथक्करण, विकेंद्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन और कचरे से ऊर्जा जैसे उपायों ने इसे देश में एक आदर्श शहर बनाया है।
जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, उत्तराखंड के वैज्ञानिक-ई डॉ. केएस कनवाल ने जलवायु लचीलापन, जलवायु नीति और जागरूकता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बदलते जलवायु परिदृश्य में कृषि प्रणाली को अधिक अनुकूल और लचीला बनाना आवश्यक है। उन्होंने एसडीजी को व्यावहारिक कृषि, सामुदायिक नवाचार और अंतर्विषयक सहयोग से जोड़ने पर जोर दिया। एसडीजी 13 (जलवायु कार्रवाई) और एसडीजी 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की के वैज्ञानिक-ई डॉ. गोपाल कृष्ण ने जल गुणवत्ता आकलन की प्रक्रिया समझाते हुए बताया कि विभिन्न स्थानों से जल नमूने लेकर उनमें सीसा, कैडमियम और आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं की जांच की जाती है, जिससे प्रदूषण के स्रोतों का पता चलता है। उन्होंने बायोरिमेडिएशन तकनीक का उल्लेख करते हुए कहा कि सूक्ष्मजीवों और पौधों की मदद से प्रदूषित जल और मिट्टी को शुद्ध किया जा सकता है। साथ ही आइसोटोप तकनीक के माध्यम से जल स्रोत, प्रवाह मार्ग और पुनर्भरण को समझना संभव होता है, जो दीर्घकालिक जल प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है।
पोस्टर प्रस्तुति में टीएमयू के बीएससी एग्रीकल्चर के छात्र सार्थक और प्रियांशु, जबकि मौखिक प्रस्तुति में यूजी के लोचन व्यास द्वितीय स्थान पर रहे। निर्णायक मंडल में डॉ. शाकुली सक्सेना, डॉ. उपासना और सुश्री कुसुम फरसवान शामिल रहीं। सम्मेलन में डॉ. बलराज सिंह, डॉ. महेश सिंह, डॉ. देवेंद्र पाल सिंह, डॉ. मनदीप रावत, डॉ. आशुतोष अवस्थी, डॉ. चारु बिष्ट, डॉ. निमित कुमार, डॉ. ब्रजपाल सिंह, डॉ. नेहा शर्मा, डॉ. अनुप्रिया राना, डॉ. आयुष मिश्रा, डॉ. प्रिंस साहू, डॉ. शबनम ठाकुर, डॉ. अमित मौर्या सहित यूजी-पीजी छात्र, शोधार्थी और अन्य प्रतिभागी उपस्थित रहे।
