देश में तकनीक और आधुनिकता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन ट्रैफिक अनुशासन आज भी पुराने ढर्रे पर ही चलता नजर आता है। सवाल यह है कि जब साधन बदल गए, तो क्या अब सोच बदलने की बारी नहीं आई? ट्रैफिक के इस महान देश में आपका स्वागत है—जहाँ गाड़ियाँ नई-नई टेक्नोलॉजी से लैस हैं, लेकिन सड़कें और नियम मानो आज भी बीते जमाने की यादों में अटके हुए हैं। विदेशों की चमचमाती सड़कों पर जब कोई पैदल यात्री कदम रखता है, तो गाड़ियाँ सम्मान में रुक जाती हैं; और हमारे यहाँ? यहाँ तो पैदल चलना भी किसी साहसिक खेल से कम नहीं। सवाल यह है कि जब हम विदेशी कारें, विदेशी मोबाइल, विदेशी ऐप्स अपना सकते हैं, तो विदेशी अनुशासन क्यों नहीं?
विदेशों में हर नुक्कड़ पर लगा “स्टॉप साइन” सिर्फ एक बोर्ड नहीं, बल्कि नियमों के प्रति सम्मान का प्रतीक होता है। वहाँ ड्राइवर बिना बहस, बिना बहाना, गाड़ी रोकते हैं—चाहे सड़क खाली ही क्यों न हो। और हमारे यहाँ? यहाँ “स्टॉप” का मतलब अक्सर “धीमा करके निकल लो” होता है, और “रेड लाइट” का अर्थ “जल्दी निकलो, वरना पीछे वाला हॉर्न बजाएगा” समझा जाता है। आखिर यह आत्मविश्वास आता कहाँ से है?
और हाँ, हमारे यहाँ एक दिलचस्प परंपरा भी है—घाट सेक्शन में कहीं हनुमानजी का मंदिर दिख जाए या किसी देवी की ध्वजा लहराती नजर आ जाए, तो ड्राइवर साहब ब्रेक मारकर नहीं, बल्कि हॉर्न बजाकर श्रद्धा प्रकट करते हैं। एक सेकंड का हॉर्न, और फिर तेज रफ्तार में आगे! जैसे नियमों को नहीं, बल्कि भगवान को सूचना दे दी गई हो—“हम निकल रहे हैं, बाकी आप संभाल लेना।” सोचिए, अगर यही भावना ट्रैफिक सिग्नल पर भी आ जाए—एक बार रुककर, नियम का सम्मान कर आगे बढ़ने की—तो कितनी जिंदगियां सुरक्षित हो सकती हैं?
फिर एक और तर्क सुनने को मिलता है—“हमारे यहाँ ड्राइवर उतने पढ़े-लिखे नहीं हैं।” अच्छा, तो क्या ड्राइविंग लाइसेंस अब साक्षरता से स्वतंत्र हो गया है? अगर पढ़ाई जरूरी नहीं, तो फिर परीक्षा किस बात की? क्या कोई अनपढ़ व्यक्ति हवाई जहाज उड़ा सकता है? नहीं ना! तो फिर सड़क पर दौड़ती कार, बस या ट्रक क्या कम खतरनाक है? या फिर हम मान बैठे हैं कि जमीन पर होने वाले हादसे उतने गंभीर नहीं जितने आसमान में?
मजेदार बात यह है कि कई लोग व्हाट्सएप पर ठीक से मैसेज टाइप नहीं कर पाते, लेकिन सड़क पर 80 की स्पीड में मोबाइल देखते हुए गाड़ी जरूर चला लेते हैं। नियमों की जानकारी नहीं, पर हॉर्न बजाने में महारत हासिल है। लेन का मतलब नहीं पता, लेकिन ओवरटेक हर हाल में करना है। और जब दुर्घटना हो जाए, तो दोष “सिस्टम” का—जैसे सिस्टम ने ही आकर स्टेयरिंग पकड़ लिया हो!
सवाल यह भी है कि क्या इंसान की जान इतनी सस्ती हो गई है कि लाइसेंस देना एक औपचारिकता भर रह गया है? क्या जांच-पड़ताल सिर्फ कागजों तक सीमित है? अगर नियमों का पालन करना मुश्किल है, तो फिर नियम बनाने का क्या औचित्य? और अगर पालन करवाना ही नहीं है, तो फिर ट्रैफिक पुलिस सिर्फ चालान काटने तक ही क्यों सीमित रह जाए?
असल समस्या सड़क या गाड़ियों की नहीं, मानसिकता की है। जब तक “मैं पहले” की सोच “हम सुरक्षित” में नहीं बदलेगी, तब तक हर नई तकनीक भी पुरानी आदतों के आगे हारती रहेगी। आखिर कब हम यह समझेंगे कि सड़क पर अनुशासन कोई विकल्प नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा का आधार है? या फिर हम इसी तरह सवाल पूछते रहेंगे और जवाब किसी और देश में ढूंढते रहेंगे?
