मुख्यपृष्ठस्तंभनिर्भीक व्यक्तित्व, जो पत्रकारिता के मूल्यों के प्रति समर्पित रहा जतिन देसाई

निर्भीक व्यक्तित्व, जो पत्रकारिता के मूल्यों के प्रति समर्पित रहा जतिन देसाई

अभय मोकाशी… एक सच्चे, ईमानदार और वस्तुनिष्ठ पत्रकार। 69 वर्ष की आयु में शनिवार रात उनका निधन हो गया। आज के ‘गोदी मीडिया’ के दौर में अभय जैसे मूल्यों पर जीने वाले पत्रकार बहुत कम देखने को मिलते हैं। खोजी पत्रकारिता वास्तव में क्या होती है, यह उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से पत्रकारों और समाज को दिखाया।

जब मैंने पत्रकारिता की शुरुआत की थी, तब अभय से थोड़ी बहुत पहचान थी। कुछ वर्षों बाद वह मित्र बने और फिर साथ काम करने का अवसर मिला। वे अत्यंत बुद्धिमान, स्नेही और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। साथ काम करने वालों के लिए वे एक आदर्श थे। वे अपने अधीन काम करने वाले संवाददाताओं का हमेशा उत्साहवर्धन करते थे।

वे हमेशा नई जानकारी साझा करते थे। युवा पत्रकारों से वे खास तौर पर कहते थे कि पत्रकार को सिर्फ पेशेवर नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान भी होना चाहिए। अभय से पत्रकारिता के गुण सीखने वाले कई लोग आज विभिन्न समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं।

अभय ने सोच समझकर पत्रकारिता को चुना था। वह आपातकाल के बाद का दौर था, जब “दुनिया बदल देंगे” की भावना से कई लोग इस क्षेत्र में आए थे। उन पर गांधी, मार्क्स, नेहरू और बाबासाहेब आंबेडकर जैसे विचारकों का गहरा प्रभाव था। वे लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता में अटूट विश्वास रखते थे और उनका आचरण भी वैसा ही था। लोकतांत्रिक समाजवाद में उनका भरोसा था।

उन्होंने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’, ‘द इंडियन पोस्ट’, ‘अमृत बाजार पत्रिका’ और ‘मिड डे’ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में काम किया। अपनी अंतिम पारी उन्होंने ‘मिड डे’ में राजनीतिक संपादक के रूप में निभाई। उस समय मैं ‘मिड डे’ (गुजराती) में कार्यरत था।

अभय की कई खबरें बेहद चर्चित रहीं। वर्ष 1986 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवाजीराव पाटिल निलंगेकर को उनकी बेटी के अंकों में कथित हेरफेर के मामले में इस्तीफा देना पड़ा था। इस मामले का खुलासा सबसे पहले अभय ने ही किया था। इसके चलते राज्यपाल कोना प्रभाकर राव को भी पद छोड़ना पड़ा, जबकि उस समय के कुलपति एम. एस. गोरे ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था।

इसके अलावा, 1986-87 में अभय और उनके साथियों ने इंडियन एयरलाइंस के विमानों के रखरखाव में सुरक्षा नियमों के गंभीर उल्लंघन का पर्दाफाश किया था। उन्होंने बताया था कि किस तरह कुछ अधिकारी बिना जांच के ही कोरे फॉर्म पर हस्ताक्षर कर विमानों को उड़ान योग्य घोषित कर देते थे।

अभय की पत्रकारिता यह बताती है कि यदि मीडिया और खोजी पत्रकार ठान लें, तो वे व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकते हैं। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की यही असली ताकत है। हालांकि, आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं और मीडिया पर लोगों का भरोसा कम होता दिख रहा है।

1948 के मानवाधिकारों के सार्वभौम घोषणापत्र का अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देता है, जो लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है। ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ में भारत का 159वां स्थान चिंता का विषय है। ऐसे समय में अभय मोकाशी जैसे पत्रकारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।

अभय मोकाशी का अंतिम संस्कार रविवार, 3 मई को बोरीवली पूर्व स्थित श्मशान घाट में किया गया। संयोग से उसी दिन उनका 70वां जन्मदिन था और 3 मई को ही विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस भी मनाया जाता है।

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