रोहित माहेश्वरी
लखनऊ
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में हो रही देरी भाजपा सरकार की प्रशासनिक अक्षमता को उजागर करती है। लखनऊ में हुई कार्यशाला के दौरान जिस तरह से प्रतिनिधियों ने कार्यकाल बढ़ाने की मांग की, वह इस बात का प्रमाण है कि सरकार समय पर चुनाव कराने में विफल रही है। ओमप्रकाश राजभर का आश्वासन भी इस असमंजस को दूर नहीं कर पाया। पंचायतें लोकतंत्र की नींव होती हैं, लेकिन भाजपा सरकार की प्राथमिकताओं में यह स्पष्ट रूप से पीछे दिख रही हैं। समय पर चुनाव न कराना न केवल संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन है, बल्कि यह स्थानीय प्रशासन की वैधता पर भी सवाल खड़ा करता है। सरकार के पास न तो स्पष्ट योजना दिखती है और न ही जवाबदेही। कार्यकाल बढ़ाने जैसे अस्थायी उपाय लोकतंत्र की भावना के खिलाफ हैं, लेकिन सरकार की नाकामी ने इसे एक विकल्प बना दिया है। यह स्थिति बताती है कि भाजपा सरकार बड़े-बड़े दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को संभालने में कमजोर साबित हो रही है।
गंगा एक्सप्रेसवे: विकास नहीं,
प्रचार की परियोजना?
उत्तर प्रदेश में बुनियादी ढांचे के नाम पर जो राजनीति चल रही है, वह अब सवालों के घेरे में है। अखिलेश यादव द्वारा गंगा एक्सप्रेसवे को लेकर उठाए गए मुद्दे केवल विपक्षी आलोचना नहीं, बल्कि उस हकीकत को उजागर करते हैं जिसे सरकार छिपाने की कोशिश कर रही है। भाजपा सरकार जिस परियोजना को ऐतिहासिक बता रही है, वही अधूरी तैयारियों, कमजोर योजना और जमीनी उपयोगिता के अभाव से घिरी दिखती है। एक्सप्रेसवे के किनारे न तो पर्याप्त मंडियों की योजना है और न ही औद्योगिक विकास का स्पष्ट रोडमैप। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि आखिर यह परियोजना किसके हित में बनाई जा रही है। इसके विपरीत, समाजवादी सरकार के दौरान बने एक्सप्रेसवे-जैसे आगरा-लखनऊ-न केवल गुणवत्ता में बेहतर थे, बल्कि उन्होंने आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा दिया। भाजपा पर यह आरोप लगातार मजबूत हो रहा है कि वह विकास के नाम पर केवल शिलान्यास और उद्घाटन की राजनीति कर रही है, जबकि असल काम अधूरा छोड़ दिया जाता है। बड़े-बड़े दावों और प्रचार के पीछे छिपी सच्चाई अब धीरे-धीरे सामने आ रही है।
