मुख्यपृष्ठस्तंभमेगा-प्लान : इंटेलिजेंट ट्रैफिक कंट्रोल एंड मैनेजमेंट सिस्टम .... रेड लाइट कम,...

मेगा-प्लान : इंटेलिजेंट ट्रैफिक कंट्रोल एंड मैनेजमेंट सिस्टम …. रेड लाइट कम, ग्रीन वेव ज्यादा, चालान कम, अनुशासन ज्यादा जाम कम, गति ज्यादा

 

अनिल तिवारी
मुंबई

भाग-अंतिम

अंतत: मुंबई को समझना होगा कि ट्रैफिक मैनेजमेंट का भविष्य केवल पुलिसकर्मी, सीटी और लाल-पीली-हरी बत्ती पर आधारित नहीं हो सकता। भविष्य डेटा, एआई, जीपीएस, ड्रोन, स्वैâनर, कनेक्टेड वेहिकल्स और नागरिक सूचना प्रणाली का है। लेकिन तकनीक का उद्देश्य चालान काटना नहीं, यात्रा को सुगम बनाना होना चाहिए। मुंबई के लिए इस अध्याय का मूल निष्कर्ष स्पष्ट है, स्मार्ट सिग्नलिंग का लक्ष्य वाहन रोकना नहीं, वाहन प्रवाह को अनुशासित करना है।

जीपीएस सिस्टम इस व्यवस्था की दूसरी अनिवार्य कड़ी है। सभी सार्वजनिक परिवहन वाहनों, बसों, टैक्सियों, ऑटो-रिक्शा, ऐप वैâब, मालवाहक वाहनों, निर्माण वाहनों, एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पुलिस वाहनों को जीपीएस से जोड़ा जाना चाहिए। इससे कमांड सेंटर को हर समय पता रहेगा कि कौन-सा वाहन कहां है। यदि किसी क्षेत्र में बसें देर से चल रही हैं, यदि किसी रूट पर अचानक गति गिर रही है, यदि एंबुलेंस जाम में फंसी है, यदि निर्माण वाहन प्रतिबंधित समय में प्रवेश कर रहे हैं तो सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी कर सकेगा।

मुंबई के इंटेलिजेंट ट्रैफिक कंट्रोल एंड मैनेजमेंट सिस्टम को प्रभावशाली बनाने के लिए उसे केवल सिग्नल और वैâमरों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उसे ड्रोन वैâमरों, जीपीएस सिस्टम, स्मार्ट स्वैâनर, वाहन डेटाबेस, डिजिटल प्रवर्तन और नागरिक सूचना प्रणाली से जोड़ना होगा। यही भविष्य का वह मॉडल है, जिसमें सड़क पर खड़े होकर हर वाहन रोकने की आवश्यकता नहीं रहेगी, बल्कि सिस्टम स्वयं पहचान करेगा कि किस वाहन को रोकना है, किसे चेतावनी देनी है और किसे निर्बाध आगे बढ़ने देना है।
ट्रैफिक प्रबंधन और
एरियल सर्विलांस
ड्रोन वैâमरे इस व्यवस्था की अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी हो सकते हैं। मुंबई में कई बार जाम सिग्नल पर नहीं, बल्कि उससे ३०० या ५०० मीटर आगे किसी खराब वाहन, अवैध पार्विंâग, बस रुकावट, सड़क खुदाई, जलभराव, दुर्घटना या संकरी लेन के कारण बनता है। स्थिर वैâमरे हमेशा पूरी तस्वीर नहीं देते। ड्रोन वैâमरों से रीयल टाइम एरियल सर्विलांस संभव होगा। वे प्रमुख जंक्शनों, फ्लाईओवरों, एक्सप्रेसवे कनेक्टरों, बाजार क्षेत्रों, स्टेशन क्षेत्रों, त्योहार मार्गों, जलभराव बिंदुओं और दुर्घटना स्थलों की लाइव स्थिति कमांड सेंटर तक भेज सकते हैं। ड्रोन से शहर की हर सड़क का एक निश्चित अंतराल पर ट्रैफिक डेंसिटी मैप तैयार किया जा सकता है। किस मार्ग पर कितनी भीड़ है, कहां कतार बढ़ रही है, कौन-सा मार्ग खाली है, कहां भारी वाहन फंसे हैं, कौन-सी सर्विस रोड अतिक्रमण से बंद है, यह सब दृश्य रूप में उपलब्ध होगा। इससे ट्रैफिक डायवर्जन अनुमान से नहीं, वास्तविक स्थिति देखकर किया जा सकेगा। किसी दुर्घटना या वाहन खराब होने पर ड्रोन पहले पहुंचकर स्थिति का आकलन करे और निकटतम टोइंग वैन, एंबुलेंस या पुलिस यूनिट को भेजा जाए।
जीपीएस सिस्टम इस व्यवस्था की दूसरी अनिवार्य कड़ी है। सभी सार्वजनिक परिवहन वाहनों, बसों, टैक्सियों, ऑटो-रिक्शा, ऐप वैâब, मालवाहक वाहनों, निर्माण वाहनों, एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पुलिस वाहनों को जीपीएस से जोड़ा जाना चाहिए। इससे कमांड सेंटर को हर समय पता रहेगा कि कौन-सा वाहन कहां है। यदि किसी क्षेत्र में बसें देर से चल रही हैं, यदि किसी रूट पर अचानक गति गिर रही है, यदि एंबुलेंस जाम में फंसी है, यदि निर्माण वाहन प्रतिबंधित समय में प्रवेश कर रहे हैं तो सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी कर सकेगा।
मुंबई के ट्रैफिक प्रबंधन में एक बड़ी समस्या यह भी है कि सड़क पर दस्तावेज जांच के नाम पर वाहन रोके जाते हैं। पीयूसी, इंश्योरेंस, फिटनेस या लंबित चालान जैसी जानकारी अब डिजिटल रूप में उपलब्ध होनी चाहिए। सड़क पर लगे स्मार्ट स्वैâनर और एएनपीआर वैâमरे वाहन नंबर पढ़कर स्वत: यह जांच सकें कि किस वाहन का इंश्योरेंस नहीं है, किसका पीयूसी नवीनीकृत नहीं हुआ, किसका फिटनेस प्रमाणपत्र लंबित है, किस वाहन पर बार-बार जुर्माना लगा है और कौन-सा वाहन चोरी या संदिग्ध श्रेणी में है। केवल ऐसे वाहनों को आगे सुरक्षित चेकिंग बे में रोका जाए। इससे सामान्य नागरिक को अनावश्यक परेशानी नहीं होगी और ट्रैफिक प्रवाह भी बाधित नहीं होगा।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रवर्तन कमजोर होगा। उलटे, प्रवर्तन अधिक सटीक और प्रभावी होगा। आज कई बार नियम माननेवाला वाहन भी नाकाबंदी में खड़ा रहता है, जबकि आदतन नियम तोड़ने वाला किसी दूसरी लेन से निकल जाता है। एआई आधारित स्वैâनिंग में ऐसा नहीं होगा। जिन वाहनों का रिकॉर्ड खराब है, जिन पर बार-बार फाइन लगे हैं, जो सिग्नल तोड़ते हैं, गलत दिशा में चलते हैं, रेस ड्राइविंग करते हैं या पीयूसी/इंश्योरेंस नहीं रखते, सिस्टम उन्हें स्वत: फ्लैग्ड वैâटेगरी में डालेगा। ऐसे वाहनों के लिए विशेष निगरानी और कठोर कार्रवाई हो सकती है।
नंबर प्लेट रिकग्निशन और स्पीड डिटेक्शन से आपराधिक नियंत्रण में भी मदद मिलेगी। चोरी के वाहन, फर्जी नंबर प्लेट, दुर्घटना के बाद भागे वाहन, अपराध में इस्तेमाल वाहन और संदिग्ध मूवमेंट वाले वाहन शहर के अलग-अलग वैâमरा नेटवर्क में ट्रेस किए जा सकते हैं। यदि यह सिस्टम पुलिस डेटाबेस से जुड़ा हो, तो ट्रैफिक प्रबंधन अपराध नियंत्रण का भी सहयोगी बन सकता है। मुंबई में ईंधन-बर्बादी का मुद्दा भी गंभीर है। यदि लाखों वाहन रोजाना ट्रैफिक सिग्नल, जाम और बॉटलनेक में अतिरिक्त आधा घंटा खड़े रहते हैं, तो यह केवल व्यक्ति का समय नहीं खाता, शहर का ईंधन और विदेशी मुद्रा भी खाता है। पेट्रोल और डीजल आयातित ऊर्जा से जुड़े हैं। वाहन जब खड़ा (ग््त) रहता है, तब भी ईंधन जलाता है। बस, ट्रक और डीजल मालवाहक वाहन तो और अधिक प्रदूषण करते हैं। इसलिए स्मार्ट सिग्नलिंग से यदि प्रति वाहन कुछ मिनट भी बचते हैं, तो शहर स्तर पर उसका असर हजारों लीटर ईंधन और भारी उत्सर्जन कमी के रूप में दिखाई दे सकता है। मुंबई को इस बचत का वैज्ञानिक मूल्यांकन करना चाहिए। इस प्रणाली का क्रियान्वयन चरणबद्ध होना चाहिए। पहले चरण में मुंबई के सबसे भीड़भाड़ वाले ५० से १०० जंक्शनों को चुना जाए। वहां एडैप्टिव सिग्नल कंट्रोल, एएनपीआर, स्पीड डिटेक्शन, कतार-लंबाई सेंसर, पैदल यात्री सेंसर और केंद्रीय कमांड कनेक्टिविटी लागू की जाए। दूसरे चरण में इन्हें कॉरिडोर मॉडल में जोड़ा जाए जैसे वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे से जुड़ी आंतरिक सड़कें, ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे लिंक, एलबीएस मार्ग, एसवी रोड, लिंक रोड, अंधेरी-जोगेश्वरी-गोरेगांव कॉरिडोर, दादर-सायन-चेंबूर कॉरिडोर, बीकेसी कनेक्टिविटी और स्टेशन एप्रोच रोड्स। तीसरे चरण में पूरे एमएमआर को जोड़ा जाए।
इंफ्रा में सुधार और अनुशासन
क्रियान्वयन के साथ सड़क इंप्रâास्ट्रक्चर को भी सुधारना होगा। केवल स्मार्ट सिग्नल लगाने से लाभ नहीं होगा यदि सड़क पर अवैध पार्विंâग है, डिवाइडर गलत है, बस स्टॉप सड़क के बीच में है, सर्विस रोड बंद है, फ्लाईओवर उतरते ही बॉटलनेक है या निर्माण कार्य लेन घेर रहा है। इसलिए आईटीएमएस को रोड इंजीनियरिंग ऑडिट से जोड़ना होगा। जहां एआई बार-बार कंजेशन दिखाए, वहां इंजीनियरिंग सुधार अनिवार्य हो। इस सिस्टम में नागरिक अधिकार और डेटा गोपनीयता भी महत्वपूर्ण हैं। वैâमरे, जीपीएस और स्वैâनिंग का उपयोग नागरिक सुविधा और सुरक्षा के लिए हो, अंधाधुंध निगरानी के लिए नहीं। डेटा सुरक्षित रहे, उसका दुरुपयोग न हो और गलत चालान पर आसान अपील व्यवस्था हो। यदि नंबर प्लेट गलत पढ़ी गई है या वाहन उस स्थान पर था ही नहीं, तो नागरिक को त्वरित राहत मिले। स्मार्ट सिस्टम तभी स्वीकार्य होगा जब वह पारदर्शी, न्यायपूर्ण और जवाबदेह होगा। अंतत: मुंबई को समझना होगा कि ट्रैफिक मैनेजमेंट का भविष्य केवल पुलिसकर्मी, सीटी और लाल-पीली-हरी बत्ती पर आधारित नहीं हो सकता। भविष्य डेटा, एआई, जीपीएस, ड्रोन, स्वैâनर, कनेक्टेड वेहिकल्स और नागरिक सूचना प्रणाली का है। लेकिन तकनीक का उद्देश्य चालान काटना नहीं, यात्रा को सुगम बनाना होना चाहिए। मुंबई के लिए इस अध्याय का मूल निष्कर्ष स्पष्ट है, स्मार्ट सिग्नलिंग का लक्ष्य वाहन रोकना नहीं, वाहन प्रवाह को अनुशासित करना है। आईटीएमएस का लक्ष्य केवल उल्लंघन पकड़ना नहीं, जाम पैदा होने से पहले उसे रोकना है। एआई, ड्रोन और जीपीएस का लक्ष्य निगरानी नहीं, शहर को चलायमान रखना है। यदि मुंबई अपने ट्रैफिक सिग्नल्स को वास्तव में स्मार्ट बनाना चाहती है, तो उसे टुकड़ों में नहीं, पूरे महानगरीय सिस्टम के रूप में सोचना होगा। सड़क, सिग्नल, वाहन, चालक, पुलिस, सार्वजनिक परिवहन, आपातकालीन सेवा, डेटा और नागरिक, सबको एक डिजिटल तंत्र में जोड़ना होगा। तभी मुंबई २१वीं सदी की सचमुच प्रगतिशील और सुगम यातायात वाली स्मार्ट सिटी बन सकेगी।
(समाप्त)

अन्य समाचार