मुख्यपृष्ठस्तंभसम-सामयिक : चुनाव परिणाम आ गए...अब तेल महंगा हो जाएगा!

सम-सामयिक : चुनाव परिणाम आ गए…अब तेल महंगा हो जाएगा!

 

वीना गौतम
अभी पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आते-आते तेल कंपनियों की तरफ से तेल महंगा किए जाने की भूमिका का बांधा जाना शुरू हो गया है। तेल कंपनियां कह रही हैं कि उन्हें हर दिन २,४०० करोड़ रुपए का घाटा हो रहा है। जाहिर है कि तेल कंपनियां खुद डीजल और पेट्रोल की कीमत बिना सरकार की इजाजत नहीं बढ़ाएंगी। इसलिए अप्रत्यक्ष तौर पर यही समझा जा सकता है कि सरकार के इशारे पर ही उन्होंने भूमिका बांधनी शुरू कर दी है।
आम आदमी की औकात!
इसमें कोई दो राय नहीं है कि जिस तरह से दोबारा ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है, उसको देखते हुए किसी भी समय फिर से जंग शुरू होने के आसार बन गए हैं। साथ ही यह भी सही है कि पिछले एक पखवाड़े के भीतर क्रूड ऑयल की कीमत प्रति बैरल ९६ अमरीकी डॉलर से बढ़कर गुजरे ३० अप्रैल २०२६ को ११६ डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई थी। इससे हिसाब लगाकर भारतीय तेल कंपनियां कह रही हैं कि उन्हें प्रति लीटर पेट्रोल में १४ रुपए और डीजल में १८ रुपए का नुकसान झेलना पड़ रहा है। जबकि हकीकत यह है कि वित्त वर्ष २०२५-२६ में जब ज्यादातर समय यानी २७ फरवरी २०२६ के पहले तक क्रूड ऑयल औसतन ७१ डॉलर प्रति बैरल रहा, तब इन कंपनियों ने ९ महीने में करीब १.३७ लाख करोड़ रुपए यानी हर रोज करीब ११६ करोड़ रुपए का लाभ कमाया था।
ऐसे में सवाल है कि आखिर जब तेल कंपनियां लाभ कमा रही थीं और उनसे कई गुना ज्यादा सरकारें कमा रही थीं, तब किसी को भी यह ख्याल क्यों नहीं आया कि आखिर जब क्रूड ऑयल सस्ता मिल रहा है तो क्यों न उसका लाभ आम आदमियों को भी मिले? लेकिन अब, जब क्रूड ऑयल महंगा हो गया है तो तेल कंपनियों के कंधे पर बंदूक रखकर केंद्र और राज्य सरकारें कीमतें बढ़ाने की भूमिका बांध रही हैं। वैसे अगर आज भी तेल का ईमानदार गणित देखा जाए तो अगर केंद्र और राज्य सरकारें अपने मुनाफे को इस आपदा के समय आम आदमियों पर रहम करते हुए खत्म कर दें या खत्म न करें तो कम से कम आधा ही कर दें तो भी न केवल आम लोगों को बल्कि देश में सभी की जरूरतों के लिए जो तेल बिकता है, वह उसी कीमत पर बना रहेगा, जो फिलहाल है बल्कि अगर केंद्र और राज्य सरकारें अपने मुनाफे को दो तिहाई छोड़ दें तो लोगों को पेट्रोल ईरान-अमेरिका-इजरायल जंग शुरू होने से पहले की कीमत से भी सस्ता मिल सकता है।
कौन ले जाता है फायदा?
अगर आपको यकीन न आ रहा हो तो जरा १०० रुपए के पेट्रोल का पूरा ब्रेक डाउन देखें। १०० रुपए में मिलनेवाला यह पेट्रोल कच्चे तेल के रूप में विदेशों से ३५ से ४० रुपए में आता है। अगर खरीद और बिक्री के बीच डॉलर के विरुद्ध रुपया कमजोर हो जाता है या मजबूत हो जाता है, तब थोड़ा घट-बढ़ सकता है वर्ना आज की तारीख में १०० रुपए का जो पेट्रोल हम खरीदते हैं, कच्चे तेल के रूप में वह ३५ से ४० रुपए के बीच आता है। अब इसे रिफाइन करने और ट्रांसपोर्ट करके बिक्री की जगह ले जाने में ८ से १० रुपए खर्च होते हैं यानी ४३ से ५० रुपए बन गए। अब इस बिकनेवाले डीजल और पेट्रोल में तेल कंपनियों का मार्जन ३ से ५ रुपए प्रति लीटर बनता है यानी एक लीटर पेट्रोल ४६ से ५५ रुपए तक की कीमत का हुआ, जो हमें १०० रुपए में मिलता है। सवाल है फिर ४५ से ५४ रुपए कौन ले जाता है? तो इसमें १८ से २० रुपए सीधे केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी के रूप में लेता है और राज्य सरकारें २० से २५ रुपए प्रति १०० रुपए के पेट्रोल-डीजल में अपने मुनाफे के रूप ले लेती हैं। यह भी जान लीजिए हर राज्य का वैट अलग-अलग है। कुछ राज्यों में तो यह ३० फीसदी से भी ज्यादा है।
मुनाफे में कटौती क्यों नहीं?
कहने का मतलब यह कि १०० रुपए का अभी जो हम पेट्रोल खरीदते हैं, उसमें ४६ से लेकर ५४ रुपए तक सरकारों का टैक्स या उनकी उगाही होती है और यह कोई आज की बात नहीं है, यह हमेशा से ऐसा ही रहा है। ऐसे में अगर फिलहाल तेल का जो वैश्विक संकट खड़ा हो गया है, उसमें केंद्र और राज्य सरकारें यदि अपने मुनाफे को आधा भी कर दें तो आम लोगों को न केवल इस जंग की हालात बनने के पहले की कीमत पर डीजल-पेट्रोल मिलता रहेगा बल्कि तब भी केंद्र और राज्य सरकारों को अच्छा खासा मुनाफा भी होता रहेगा।
लेकिन न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारें अपने मुनाफे में किसी तरह की कटौती कतई नहीं करना चाहतीं। ये सब इस आपदा को अवसर के रूप में भुनाने की कोशिश में हैं और इसके लिए वो खुद आगे बढ़कर कुछ नहीं कह रहीं बल्कि तेल कंपनियों के जरिए महंगे तेल की भूमिका बनवा रही हैं। अगर जैसे कि भूमिका बनाई है, तेल कंपनियों ने ४ मई २०२६ जिस दिन ५ राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे के बाद या उसके पहले १० रुपए प्रति लीटर भी डीजल और पेट्रोल में इजाफा कर दिया तो आम लोगों का जीना दूभर हो जाएगा।
आपदा में अवसर की तलाश
क्योंकि तेल और डीजल भले १० रुपए ही महंगा हो, बाकी हर चीज इससे ढ्योढ़ी या दोगुनी महंगी होगी। जब से ईरान जंग शुरू हुई है, तब से रसोई गैस या दूसरी चीजों के महंगे होने के कारण मासिक बजट में ३ से ४ हजार रुपए की बढ़ोतरी हो गई है और अब Dागर यह कहर टूटा तो आम लोगों की तो छोड़िये मध्यवर्ग भी सीधी कमर के साथ खड़ा नहीं रह पाएगा। क्योंकि डॉलर के विरुद्ध रुपया पहले ही ९५ तक पहुंच गया है। इस कारण अप्रत्यक्ष रूप से महंगाई हर क्षेत्र में ८ से १० फीसदी तक बढ़ गई है, जिसका कोई जिक्र ही नहीं हो रहा। अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ी महंगाई और गैस की किल्लत के कारण वैसे भी पिछले तीन महीनों में १५ से २० फीसदी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का शहरों से अपने गांवों की ओर पलायन हो चुका है। क्योंकि गैस की किल्लत भले न हो, लेकिन आम लोगों को जिनके पास सरकारी गैस कनेक्शन नहीं है, उन्हें यह ईरान-अमेरिका के जंग की पहले के मुकाबले दोगुनी कीमत पर मिल रही है। बंगलुरु जैसे शहर में जो आईटी का गढ़ और पढ़े-लिखों का सेंटर माना जाता है, वहां भी जिन लोगों के पास गैस का कनेक्शन नहीं है, उन्हें १२ किलो एलपीजी का सिलेंडर भी दुकानदार बड़ी मुश्किल से ३३-३४ सौ रुपए का दे रहे हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ और भोपाल में पिछले दिनों ५ किलो वाले छोटे गैस सिलेंडर के लिए जो २००० से ३००० रुपए तक की कीमत वसूली जा रही थी, वह सिर्फ अफवाह नहीं थी।
अपने देश में कोई भी आपदा आते ही प्रशासन तंत्र की बांछें खिल जाती हैं, क्योंकि नीचे से लेकर ऊपर तक हर किसी को इस आपदा का फायदा मिलता है। इसलिए कम से कम केंद्र और राज्य सरकारें तो आम आदमियों पर रहम करें। इस मामले में सरकार इतनी भी प्रिडेक्टेबल न बने कि चीख-चीखकर राज्यों के चुनावों के दौरान जो आशंका चुनाव हो जाने के बाद पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ जाने की जताई जा रही थी, उसे बेशर्मी से सही साबित होने दें। क्योंकि चुनाव के दौरान केंद्र सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय से संबंधित नौकरशाह बार-बार यह कह रहे थे कि चुनाव के बाद फिलहाल दाम बढ़ाए जाने की कोई योजना नहीं है। इसलिए कृपया सरकार अपने उस कहे हुए पर कायम रहे, पहले ही महंगाई की मार से दोहरे हो रहे आम लोगों पर और ज्यादती न करें।

(लेखिका विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान, इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में कार्यकारी संपादक हैं)

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