प्रभुनाथ शुक्ल, भदोही
पांच गो राज्यन के चुनावी नतीजा आ गइल, आ जनता के मन के मिजाज फेर एक बेर साफ हो गइल कि हम ही असली मालिक बानी, बाकि हमार मिजाज कब बदल जाई, ई खुद हमके भी पता ना रहे।
गांव के चौपाल से लेके शहर के चाय दुकान तक, हर जगह अब एके चर्चा, का सोच के वोट दिहनी, आ का हो गइल! जनता भी बड़ मजेदार चीज ह। चुनाव से पहिले बड़ा-बड़ा सपना देखेला, सड़क चमकी, रोजगार बरसे, महंगाई भागे, बाकि वोटिंग के बाद कहेला, चलऽ, अब पांच बरिस के छुट्टी।
ई चुनाव में जनता के मूड कुछ अइसन रहल कि जइसे बरसात के मौसम में कब धूप, कब छांव, कब मूसलाधार बरखा, कवनो भरोसा ना। नेता लोग त सोचत रह गइल कि हवा किधर बा, बाकि हवा त जनता के मन में बहे ला, आ उ मन कब किधर मुड़ जाला, ई कोई मौसम विभागो ना बता सके।
लोकतंत्र के मजा ही कुछ अउर बा। इहां राजा जनता बनावे ला, आ उहे जनता एक दिन कह देवे ला, अब उतर जा सिंहासन से, बहुत दिन हो गइल!’ जनता के उंगली पर स्याही लगते ही हर आदमी खुद के छोट-मोट सम्राट समझे लागेला। वोट डाल के निकलते ही चेहरा पर अइसन संतोष, जइसे देश के दिशा खुद तय कर दिहनी।
राजनीति भी कम खेल नइखे। चुनाव के टाइम पर हर गली-नुक्कड़ पर मीठ-मीठ बात, वादा के लड्डू, आ भविष्य के रंगीन सपना। बाकि नतीजा आवते ही जनता के दिमाग में घंटी बजे लागेला, ई सब त हम पहिले भी सुनले रहीं।
अब जनता भी धीरे-धीरे समझदार हो रहल बिया। ऊ अब खाली नारा से खुश नइखे, ऊ हिसाब-किताब मांगे लागल बिया। का भइल? कइसे भइल? हमरे जीवन में का बदले?-ई सवाल अब हर जगह गूंजे लागल बा।
बाकि व्यंग्य इहां बा कि जनता खुद भी कबो-कबो भूल जाले। आज जेकरा पर नाराज, काल्हे ओकरा से फेर आस लगा लेले। राजनीति के ई चक्र अइसन बा कि हर पांच बरिस में नया कहानी, नया किरदार, बाकि स्क्रिप्ट लगभग उहे पुरान।
अंत में बस इहे कही जा सकेला, लोकतंत्र एगो बड़ा रंगमंच ह, जनता निर्देशक ह, नेता अभिनेता ह, आ चुनाव ओकरा सबसे बड़ा शो। आ दर्शक? ऊ भी जनता ही ह।
अब देखे के बा कि अगिला शो में जनता का नया ट्विस्ट लेके आवे वाली बा। क्योंकि ई खेल में एके नियम बा, जनता के मन, भगवान भी ना जान सकेला।
!!समाप्त करी!!
