अनिल तिवारी
पश्चिम बंगाल और असम विधानसभा के नतीजों ने केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता की वापसी की कहानी नहीं लिखी है, बल्कि सिकुड़ती क्षेत्रीय राजनीति पर एक बार फिर मुहर लगा दी है। पिछले कुछ वर्षों के नतीजे साफ बताते हैं कि असम-बंगाल सहित देश के तमाम राज्यों में भाजपा अब केवल बाहरी या केवल राष्ट्रीय दल नहीं है, बल्कि उसने तमाम राज्यों की सामाजिक, जातीय व क्षेत्रीय राजनीति के भीतर या तो गहरी पैठ बना ली है या फिर वहां जीत का ‘सिस्टम’ समझ लिया है।
पिछले १०-१२ वर्षों में क्षेत्रीय दलों के सामने राजनैतिक संकट पैदा किया गया है। भारतीय जनता पार्टी की यही नीति भी है। कभी असम आंदोलन की उपज मानी जाने वाली असम गण परिषद राज्य में राजनीति की धुरी हुआ करती थी, लेकिन अब वह भाजपा की छाया में कनिष्ठ सहयोगी है। येन-केन-प्रकारेण कई पुराने क्षेत्रीय दलों को कमजोर किया गया है। भले ही वे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हों, लेकिन उनका जनाधार, सीटें, सत्ता और निर्णायक प्रभाव घटाने का पुरजोर प्रयास तो हुआ ही है। ओडिशा में बीजू जनता दल का वर्चस्व कम कर दिया गया। करीब २४ वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे नवीन पटनायक हाशिए पर हैं। तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति का भी वही हाल किया गया। जो पार्टी कभी तेलंगाना आंदोलन की प्रतीक थी, उसका मुख्यमंत्री था, उसे २०२४ के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली। यही हाल तमिलनाडु में जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके का हो रहा है, जो कभी दक्षिण भारत की सबसे ताकतवर क्षेत्रीय पार्टियों में से एक थी। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का पतन उत्तर भारत की राजनीति की सबसे बड़ी कहानी है। मायावती नेपथ्य में हैं। शिरोमणि अकाली दल पंजाब में अपनी जमीन खो चुका है। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को साम-दाम-दंड-भेद के आधार पर कमजोर किए जाने का लगातार प्रयास जारी है। आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी भी निशाने पर है। जनता दल यूनाइटेड को बिहार में प्रेम से निपटा दिया गया है। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और नेशनल काॅन्फ्रेंस जनाधार ढूंढ़ रही हैं। बंगाल, त्रिपुरा और केरलम से लेफ्ट पार्टियां विदा हो चुकी हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी नामशेष है तो पंजाब में उसे निपटाने के प्रयास जारी हैं। हां, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का क्षेत्रीय वर्चस्व अभी बरकरार है, लेकिन उसे भी ‘कमजोर’ तो किया ही जा चुका है।
कुल मिलाकर लगभग हर एक क्षेत्रीय दल को कमजोर करने का प्रयास हो रहा है। इसमें वो दल भी शामिल हैं, जिन्होंने भाजपा के संघर्ष के दिनों में मजबूती से उसका साथ निभाया था। लेकिन जब २०२४ में भाजपा २४० सीटों पर सिमटी और उसे सरकार बनाने के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ा, तो उसने क्षेत्रीय दल खत्म करने की मुहिम और तेज कर दी। साफ शब्दों में कहें तो क्षेत्रीय दलों के घटते जनाधार में ही भाजपा की विजय छिपी है, यह विचारधारा पार्टी में तेजी से मजबूत हुई। उस पर समय-समय पर विपक्ष ने भी उसे मौके दिए। झारखंड मुक्ति मोर्चा की हालिया भूमिका इसका ताजा उदाहरण है। असम में आदिवासी मतदाताओं के बीच जगह बनाने की कोशिश में हेमंत सोरेन ने २१ सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए। हालांकि, वह १६ सीटों पर ही लड़ पाई और एक भी सीट नहीं जीत सकी, लेकिन इसका नकारात्मक असर कई सीटों पर कांग्रेस सहित क्षेत्रीय राजनीति पर पड़ा। यहां कांग्रेस की भी चूक है। केवल पांच सीटों की पेशकश थी पर बात नहीं बनी।
गठबंधन में अगर क्षेत्रीय दलों को बराबरी का सम्मान नहीं मिलता, तो वही दल वोट काटेंगे और भाजपा के लिए रास्ता खोलेंगे ही। असम में भी वही हुआ। यह स्थिति कांग्रेस के लिए सबक है। आज विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी भाजपा नहीं, बल्कि खुद ही के भीतर अविश्वास, सीटों की खींचतान और नेतृत्व का अहंकार है। बहरहाल, भाजपा अपना राष्ट्रीय विस्तार चाहती है और कांग्रेस को बेहद कमजोर देखना चाहती है। उसने अपनी जीत का एक नया चुनावी मॉडल बना लिया है। स्थानीय मुद्दे अब भाजपाई नैरेटिव के सामने गौण हैं। चुनाव अब मुद्दों से नहीं नैरेटिव से ही जीते जाते हैं, यह राष्ट्रीय राजनीति की बदलती दिशा के लिए एक आईना है। आईना इस बात का भी कि राजनीति में अहंकार अक्सर हार का दरवाजा खोलता है।
