महाराष्ट्र सहित देश के कई हिस्सों में छोटी बच्चियों पर यौन अत्याचार का कहर बरपा है, एक लहर उठी है। ऐसे मामलों में महाराष्ट्र का चेहरा काला हुआ है। पुणे के नसरापुर में साढ़े तीन साल की मासूम बच्ची पर अमानवीय अत्याचार कर उसकी हत्या कर दी गई। ऐसी घटनाएं होने पर मुख्यमंत्री अक्सर यह कहते हैं कि `केस फास्ट ट्रैक पर चलाएंगे’ या `आरोपी को फांसी के तख्ते तक ले जाएंगे’, लेकिन समय बीतते ही वे इन सबको भूल जाते हैं। अब मुख्यमंत्री फडणवीस ने एक नई भूमिका पेश की है। वे कहते हैं, `यौन शोषण करने वाले अपराधियों को भविष्य में पैरोल न दी जाए, ऐसे निर्देश दिए गए हैं।’ ऐसा लगता है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का यह मत बन गया है कि अपराधी पैरोल पर छूटते हैं, इसीलिए बच्चियों पर अमानवीय अत्याचार होते हैं। चूंकि वे मुख्यमंत्री हैं, इसलिए उनकी बात सुनकर सिर हिलाना ही पड़ेगा। गृह मंत्रालय भी उन्हीं के पास है। अत: उन्हें यह आंकड़े सार्वजनिक करने चाहिए कि उनके कार्यकाल में कितनी महिलाओं और बच्चियों पर बलात्कार व हत्या जैसे अत्याचार हुए और उनमें से कितने अपराधी पैरोल पर छूटकर आए थे। खरात बाबा और अन्य कई ढोंगी बाबाओं ने महाराष्ट्र में अत्याचार का जो सिलसिला शुरू किया, उन्हें `राजाश्रय’ प्राप्त था। इनमें से कोई भी पैरोल पर बाहर नहीं आया था। `पैरोल’ का मुद्दा अपनी जगह ठीक है, लेकिन पहले यह बताएं कि महिलाओं को सुरक्षा देने वाला और अपराधियों को कठोर दंड देने वाला
शक्ति कानून
अभी तक लागू क्यों नहीं किया गया? महिलाओं के आरक्षण से ज्यादा यह शक्ति कानून महत्वपूर्ण है। अब पैरोल का जो मुद्दा श्री फडणवीस ने उठाया है, वह केवल महाराष्ट्र में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में लागू होना चाहिए। इसके लिए उन्हें अपने दो उप मुख्यमंत्रियों के साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर विस्तृत चर्चा करनी चाहिए। क्योंकि इस प्रकार के अपराधियों को `पैरोल’ पर मुक्त करने का शौक केंद्र की भाजपा सरकार को ही लगा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण जेल में बंद डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम है। राम रहीम को दो शिष्याओं से बलात्कार के आरोप में २० साल की सजा सुनाई गई है और एक पत्रकार की हत्या के मामले में भी उसे दोषी ठहराया गया है। इस बाबा को अब तक १५ बार `पैरोल’ दी जा चुकी है, वह भी चालीस-चालीस दिनों की। पंजाब-हरियाणा में विधानसभा, लोकसभा या स्थानीय निकाय चुनाव आते ही सरकार इस बाबा को निश्चित रूप से जेल से बाहर निकालती है। यह महाशय बाहर आकर अपने आश्रम में रहते हैं और अपने अनुयायियों को बुलाकर भाजपा को जिताने का आदेश देते हैं। यदि यह `पैरोल’ का खेल इसी तरह जारी रहा तो मासूम बच्चियां सुरक्षित वैâसे रहेंगी? कुलदीप सेंगर का `केस’ भी महिला अत्याचार का ही है। उसे न केवल `पैरोल’ मिली, बल्कि सीधे उसकी
सजा ही स्थगित
कर दी गई और लोकसभा में भाजपा सांसदों ने कुलदीप सेंगर का समर्थन किया। ये घटनाएं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के उदात्त विचारों की धज्जियां उड़ाने वाली हैं। बलात्कार जैसे मामलों में भी अपना राजनीतिक लाभ देखने वाली भाजपा संभवत: एकमात्र राजनीतिक पार्टी होगी। यौन अत्याचार के आरोपियों को `पैरोल’ न देने की मुख्यमंत्री की जो भूमिका है, वही उनके केंद्र सरकार की भी होनी चाहिए। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा को बलात्कारी और भ्रष्टाचारी जैसे लोगों को उम्मीदवारी या पद नहीं देने चाहिए। जेल में रहने वाले लोग सीधे भाजपा में शामिल हो जाते हैं और उन्हें विधायक, सांसद, मंत्री या मुख्यमंत्री बना दिया जाता है। इस कारण कानून का डर खत्म हो जाता है। भ्रष्टाचारी वॉशिंग मशीन में जाकर साफ हो जाता है और फिर महिलाओं पर अत्याचार करने वाले भी उसी वॉशिंग मशीन में कूद पड़ते हैं। यह सब हिंदुत्व मजबूत करने के नाम पर होता है, जो कि अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि, `एक पिता और राज्य का मुख्यमंत्री होने के नाते मुझे भी लगता है कि ऐसे दरिंदों को बीच चौराहे पर फांसी दे देनी चाहिए, लेकिन लोकतंत्र में कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई करनी पड़ती है।’ मुख्यमंत्री जी ने बिल्कुल लाख टके की बात कही है, लेकिन भ्रष्टाचारियों और दलालों को भाजपा में प्रवेश देना और उन्हें ‘मंत्री’ बनाना किस कानून के दायरे में आता है, जरा यह भी समझा दीजिए। बाकी आप बोलते रहें और जनता सिर हिलाती रहे, यही तो चल रहा है!
