कविता श्रीवास्तव
लोकप्रिय पार्श्वगायिका उषा मंगेशकर ने हाल ही में बेहद भावुक शब्दों में कहा है कि अपनी दो बहनों लता मंगेशकर और आशा भोसले के चले जाने के बाद वे स्वयं को बहुत अकेला महसूस करती हैं। उन्होंने बचपन से अपना पूरा जीवन अपनी बहनों के साथ बिताया। साथ खेलना, साथ सीखना, संघर्षों के दिनों में एक-दूसरे का सहारा बनना और फिर सफलता की ऊंचाइयों को साथ देखना। यह रिश्ता सिर्फ खून का नहीं था, बल्कि जीवन के हर पड़ाव का साझेदार था। यही समयचक्र है। जीवन में मिलन होता है, साथ बनते हैं, यादें संजोई जाती हैं और फिर एक दिन बिछड़ने की घड़ी आती है। यह प्रकृति का अटल सत्य है। जो आया है, उसे एक दिन जाना है। लेकिन कुछ लोग अपने कार्यों, अपनी विरासत और स्मृतियों के रूप में हमेशा जीवित रहते हैं। भारतीय संगीत के इतिहास का जब-जब जिक्र होगा मंगेशकर परिवार का नाम हमेशा सम्मान से लिया जाएगा। उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा। यह केवल एक संगीत परिवार नहीं, बल्कि भारतीय भावनाओं, संस्कृति और सुरों की जीवंत विरासत है। लेकिन जीवन का एक ऐसा पक्ष भी है, जिसे कोई भी प्रसिद्धि, सम्मान या उपलब्धि बदल नहीं सकती, वह है अपनों के बिछड़ने का दर्द। मंगेशकर परिवार की संघर्ष यात्रा आसान नहीं रही। पिता दीनानाथ मंगेशकर के निधन के बाद परिवार पर कठिन समय आया। उस दौर में लता मंगेशकर ने बड़ी बहन होने का दायित्व निभाया और पूरे परिवार को संभाला। उनके साथ आशा भोसले, उषा मंगेशकर, मीना खाडिलकर और हृदयनाथ मंगेशकर ने भी संगीत की साधना को आगे बढ़ाया। इन भाई-बहनों का रिश्ता सिर्फ पारिवारिक नहीं था, बल्कि सुरों के माध्यम से एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ था। उषा मंगेशकर के मन की बात बहुत स्वाभाविक है। क्योंकि जब कोई व्यक्ति बचपन से जीवन का हर पल अपने भाई-बहनों के साथ बिताता है, तब उनके जाने के बाद जो खालीपन आता है, उसे शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं होता। उषा मंगेशकर का यह कहना कि अब वे स्वयं को अकेला महसूस करती हैं, हर उस व्यक्ति की भावना है जिसने अपने जीवनसाथी जैसे भाई-बहनों को खोया हो। मंगेशकर परिवार की विरासत भी ऐसी ही है। आज भले ही परिवार के कुछ स्वर मौन हो गए हों, लेकिन उनके गीत आज भी करोड़ों भारतीयों के दिलों में गूंजते हैं। हर बार जब लता दीदी का कोई गीत सुनाई देता है, वह केवल एक मधुर धुन नहीं होती, बल्कि उस पूरे परिवार के प्रेम, संघर्ष और साथ की कहानी कहती है। आशा भोसले की खनखनाती आवाज उस परिवार की कुशल कला साधना को परिभाषित करती है। आज उषा मंगेशकर का अकेलापन हमें यह याद दिलाता है कि जीवन में रिश्तों की सबसे बड़ी पूंजी साथ बिताए गए पल होते हैं। यही पल समय बीत जाने के बाद स्मृतियों का सहारा बनते हैं और यही रिश्तों की अमरता है।
