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पॉलिटिका : `विजय’ पथ और `राज’!

एम. एम. एस.

तमिलनाडु की हालिया राजनीतिक हलचल ने एक बार फिर राजभवनों की भूमिका और राज्यपाल के पद की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। २०२६ के विधानसभा चुनावों के बाद टीवीके प्रमुख जोसेफ विजय चंद्रशेखर सबसे बड़े दल के रूप में उभरे हैं, लेकिन उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने में राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर की हिचकिचाहट ने संवैधानिक मर्यादा बनाम केंद्र के इशारों की पुरानी बहस को जीवित कर दिया है।
तमिलनाडु के जनादेश ने विजय की पार्टी को १०८ सीटों के साथ सबसे बड़े खिलाड़ी के रूप में स्थापित किया है। कांग्रेस के समर्थन के साथ यह आंकड़ा ११३ तक पहुंचता है, जो बहुमत ११८ के बेहद करीब है। एस. आर. बोम्मई मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्णय है कि बहुमत का परीक्षण राजभवन के बंद कमरों में नहीं, बल्कि विधानसभा की दहलीज पर होना चाहिए। इसके बावजूद, राज्यपाल द्वारा ४५ मिनट की मुलाकात में स्थिरता का हवाला देना और ११८ विधायकों की सूची मांगना, कई विश्लेषकों की नजर में लोकतांत्रिक परंपराओं का उल्लंघन है। अक्सर राज्यपालों पर केंद्र के एजेंट के रूप में काम करने के आरोप लगते रहे हैं। तमिलनाडु के संदर्भ में कांग्रेस और अन्य दलों का यह आरोप कि भाजपा विजय को मुख्यमंत्री बनते नहीं देखना चाहती, राजभवन की भूमिका को और अधिक संदिग्ध बनाता है। `कठपुतली बेचारी क्या करे, डोर तो किसी दूसरे के हाथ में है!’ यह मुहावरा आज तमिलनाडु की स्थिति पर सटीक बैठता है। जब एआईएडीएमके अपने विधायकों को रिसॉर्ट में छिपा रही हो और डीएमके सशक्त विपक्ष की बात कर रही हो, तब राज्यपाल का विलंब केवल हॉर्स ट्रेडिंग के लिए समय देने जैसा प्रतीत होता है। लोकतंत्र में जनता का जनादेश सर्वोपरि है। यदि विजय सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं, तो उन्हें अवसर देना संवैधानिक संस्कृति का हिस्सा होना चाहिए। राज्यपाल का पद एक रबर स्टैंप या किसी दल विशेष का रणनीतिकार नहीं, बल्कि संविधान का रक्षक होना चाहिए। यदि समय रहते निर्णय नहीं लिया गया, तो यह न केवल तमिलनाडु बल्कि भारतीय संघीय ढांचे के लिए एक खतरनाक मिसाल होगी।

राजभवन का रियलिटी शो
इस पूरे घटनाक्रम को `लोकतंत्र’ का नाम देना दरअसल, उस महान शब्द की तौहीन है। बेहतर होगा इसे `राजभवन का रियलिटी शो’ कहा जाए। जहां संविधान की किताब लाइब्रेरी के किसी धूल भरे कोने में बैठकर अपनी अंतिम सांसे गिन रही है, वहीं राजभवन की दहलीज पर `संवैधानिक विवेक’ के नाम पर जो विलंब हो रहा है, वह असल में नई सत्ता की `डिलिवरी’ का वेटिंग टाइम है। जब तक आप और हम नैतिकता, सिद्धांतों और एस. आर. बोम्मई केस की दुहाइयां देंगे, तब तक व्हॉट्सऐप यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में यह सिद्ध कर दिया जाएगा कि बहुमत संख्या में नहीं, बल्कि `संकल्प’ में होता है!

सत्ता तो `मैनेजमेंट’ के जादू से चलती है
पर्दे के पीछे जो `चाणक्य नीति’ का खेल चल रहा है, वह इतना सूक्ष्म है कि जब तक आम आदमी किंतु-परंतु और संवैधानिक-असंवैधानिक के बीच का अंतर समझेगा, तब तक राजभवन की गैलरी में नई टीम के शपथ ग्रहण की मिठाइयां बंट चुकी होंगी। आखिर राज्यपाल को भी तो उस शुभ मुहूर्त का इंतजार है, जिसकी स्क्रिप्ट किसी और दफ्तर में लिखी गई है! याद रखिए, आज की राजनीति में जमीर और ईमानदारी वैसी ही पुरानी चीजें हैं जैसी कभी `लैंडलाइन फोन’ हुआ करते थे। अब तो बस `रिमोट कंट्रोल’ का जमाना है। आप बस दर्शक दीर्घा में बैठकर तालियां बजाते रहिए, क्योंकि इस नौटंकी के अंत में जीत जनता के जनादेश की नहीं, बल्कि उसी मदारी की होगी जिसके हाथ में कठपुतली की डोर है। सही और गलत की बहस अब केवल किताबी कीड़ों के लिए है, असली सत्ता तो `मैनेजमेंट’ के जादू से चलती है। इसे सीरियसली मत लीजिए… हो सकता है `विजय’ उसी की हो जिसे `जनादेश’ मिला है!

 

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