मुख्यपृष्ठस्तंभउत्तर की बात : खाने की थाली पर बीजेपी की राजनीति!

उत्तर की बात : खाने की थाली पर बीजेपी की राजनीति!

रोहित माहेश्वरी
लखनऊ

उत्तर प्रदेश सरकार की ‘एक जिला एक व्यंजन’ योजना का उद्देश्य प्रदेश की स्थानीय पहचान, खानपान संस्कृति और छोटे कारोबारियों को मंच देना बताया गया है। लेकिन इस सूची से मांसाहारी व्यंजनों को बाहर रखना कई सवाल खड़े करता है। जब किसी प्रदेश की संस्कृति की बात होती है तो उसमें केवल एक वर्ग की पसंद नहीं, बल्कि समाज के हर तबके की परंपराएं और स्वाद शामिल होते हैं। लखनऊ का कबाब, रामपुर का मटन कोरमा, बरेली और कानपुर की कई प्रसिद्ध नॉनवेज डिशेज केवल भोजन नहीं, बल्कि शहरों की ऐतिहासिक पहचान हैं। इन्हें सूची से बाहर रखना उस सांस्कृतिक विविधता को नजरअंदाज करना है, जिसने उत्तर प्रदेश को देश-दुनिया में अलग पहचान दिलाई। सरकार यदि वास्तव में स्थानीय व्यंजनों को बढ़ावा देना चाहती है, तो उसे किसी भी खानपान को विचारधारा के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। यह पैâसला यह भी संकेत देता है कि सरकार सांस्कृतिक विरासत के चयन में संतुलन खो रही है। एक ओर पर्यटन और रोजगार बढ़ाने की बात होती है, दूसरी ओर उन्हीं व्यंजनों को किनारे किया जा रहा है जो वर्षों से प्रदेश की पहचान और अर्थव्यवस्था का हिस्सा रहे हैं। भोजन को राजनीति का विषय नहीं, संस्कृति और रोजगार का माध्यम माना जाना चाहिए।
लोकतंत्र के
भरोसे पर संकट!
पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव का बयान राजनीतिक हमला नहीं, बल्कि देश की चुनावी व्यवस्था पर उठते गंभीर सवालों की ओर इशारा है। जब एक बड़े विपक्षी दल का नेता खुले मंच से यह कहता है कि ‘आज वोट की लूट हो रही है, कल आरक्षण की लूट होगी’, तो यह बयान लोकतंत्र के भीतर बढ़ती बेचैनी को दर्शाता है। भाजपा पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि वह चुनाव को केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं रहने देना चाहती, बल्कि सरकारी तंत्र और संस्थाओं के सहारे विपक्ष को कमजोर करने की रणनीति अपनाती है। पश्चिम बंगाल चुनाव में हिंसा, केंद्रीय बलों की भूमिका, मतगणना को लेकर विवाद और बूथ प्रबंधन पर उठे सवाल पहले भी चर्चा में रहे हैं। अखिलेश यादव ने इन्हीं घटनाओं को आधार बनाकर भाजपा की कार्यशैली पर हमला बोला है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर होता दिखाई दे रहा है। जब विपक्ष लगातार मतगणना की पारदर्शिता, सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने और एजेंसियों के दुरुपयोग की बात उठाता है, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। भाजपा हर आलोचना को विपक्ष की हार की हताशा बताकर खारिज कर देती है, लेकिन लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का असली आधार निष्पक्षता, पारदर्शिता और जनता का भरोसा होता है।

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