विजयशंकर चतुर्वेदी
पश्चिम बंगाल में भी ‘डबल इंजन’ के नारे के साथ सत्ता परिवर्तन हुआ है। सब पूछ रहे हैं कि क्या वास्तव में बंगालियों को वह विकास देखने को मिलेगा, जिसका वादा बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा किया गया है?
विकास का मॉडल या
सत्ता का केंद्रीकरण?
‘डबल इंजन’ शब्द पहली नजर में प्रशासनिक समन्वय का विचार लगता है, लेकिन इसके भीतर छिपा राजनीतिक अर्थ कहीं अधिक गहरा है। यह अवधारणा धीरे-धीरे इस धारणा में बदल दी गई कि यदि राज्य में वही दल सत्ता में नहीं है जो केंद्र में है तो विकास बाधित रहेगा यानी जनता को अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दिया गया कि संसाधन, योजनाएं और प्रशासनिक सहयोग राजनीतिक निष्ठा पर निर्भर करेंगे। यह भारतीय संघवाद की मूल भावना के बिल्कुल विपरीत है।
डबल इंजन वाले राज्यों की हकीकत
उत्तर प्रदेश में ‘कानून व्यवस्था’ के दावों के समानांतर बुलडोजर राजनीति, हिरासत हत्याओं, महिलाओं के विरुद्ध अपराधों और सांप्रदायिक तनावों की घटनाएं लगातार राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनी हैं। कई मामलों में न्यायालयों को प्रशासनिक कार्रवाई पर टिप्पणी करनी पड़ी। कानून का शासन धीरे-धीरे दृश्यात्मक शक्ति प्रदर्शन में बदलता दिखाई दिया, जहां न्यायिक प्रक्रिया की जगह त्वरित दंडात्मक छवियां अधिक प्रभावशाली बनाई गईं।
मणिपुर आज तक हिंसा में जल रहा है। वहां बीजेपी का सिंगल इंजन भी काम नहीं कर रहा। हजारों लोग विस्थापित हुए, समुदायों के बीच अविश्वास गहराया, महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाया गया, बलात्कार और हत्याएं हुईं। यह उस मॉडल की सबसे बड़ी विफलताओं का जीवंत उदाहरण है, जिसे ‘स्थिर शासन’ का प्रतीक बताया जाता रहा है। महाराष्ट्र में सत्ता संरचना जिस तरह बदली गई, उसने लोकतांत्रिक जनादेश की नैतिकता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। हरियाणा और गुजरात में सामाजिक ध्रुवीकरण और कॉर्पोरेट निकटता को लेकर लगातार आलोचनाएं होती रहीं। मध्य प्रदेश में व्यापम जैसे घोटालों की स्मृति अब भी सार्वजनिक चेतना में मौजूद है।
कई राज्यों में पेपर लीक, भर्ती घोटाले और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अपराधों की शिकायतें सामान्य होती गईं।
यह एक ऐसा पैटर्न है जहां सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ता है, लेकिन जवाबदेही उसी अनुपात में कम होती जाती है।
अपराध का संस्थानीकरण और सत्ता-संरक्षित तंत्र
भारतीय राजनीति में अपराध और सत्ता का संबंध नया नहीं है, लेकिन बीजेपी की सरकारों में जो सबसे खतरनाक परिवर्तन दिखाई देता है, वह अपराध का संस्थानीकरण है। यौन-अपराध सत्ता-संरचना के भीतर समाहित हो चुका लगता है। स्थानीय वसूली नेटवर्क, भूमि कब्जा, ठेकेदारी, खनन, रियल एस्टेट और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त समूह बीजेपी शासित कई राज्यों में समानांतर शक्ति संरचना की तरह काम करते दिखाई देते हैं।
यही वह बिंदु है जहां ‘डबल इंजन’ का नारा कई बार प्रशासनिक समन्वय से अधिक राजनीतिक कब्जे का उपकरण लगता है। बुलडोजर न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प बन गया है।
बंगाल के सामने वास्तविक खतरा क्या है?
बंगाल की राजनीति टीएमसी के शासन काल में भी हिंसा, कटमनी संस्कृति और राजनीतिक संरक्षणवाद के आरोपों से घिरी रही। प्रश्न यह है कि क्या नई सत्ता इन प्रवृत्तियों को समाप्त करेगी या केवल उनका नया संस्करण सामने आएगा? क्या बंगाल में लोकतांत्रिक संस्थाएं बीजेपी और संघ की उसी केंद्रीकृत राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन जाएंगी, जहां हर असहमति को ‘राष्ट्र-विरोध’ या ‘विकास-विरोध’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है?
बंगाल की ऐतिहासिक पहचान केवल एक राज्य की नहीं; बल्कि सांस्कृतिक प्रतिरोध, बौद्धिक बहस और राजनीतिक चेतना की भूमि के रूप में है। यदि वहां भी राजनीति केवल ध्रुवीकरण, धार्मिक तनाव और केंद्रीकृत शक्ति प्रदर्शन तक सिमटती है तो यह केवल बंगाल का संकट नहीं रह जाएगा।
बंगालियों का फैसला: उम्मीद या चेतावनी?
बंगाल की जनता ने बदलाव चुना है। लेकिन इतिहास गवाह है कि हर बदलाव लोकतांत्रिक गहराई नहीं लाता; कई बार वह केवल सत्ता के केंद्र को बदलता है। अब असली परीक्षा नारों की नहीं, शासन की होगी। क्या डबल इंजन का अर्थ जनता के जीवन में बेहतर शिक्षा, सुरक्षित समाज, निष्पक्ष प्रशासन और आर्थिक न्याय होगा? या उसका अर्थ केवल यह निकलेगा कि केंद्र और राज्य की संयुक्त राजनीतिक शक्ति, बंगाल के संसाधनों की लूट में बिना प्रतिरोध के अधिक आक्रामक ढंग से काम कर सकेगी?
चिंता यह भी है कि यदि आरएसएस की विचारधारा के अनुसार ‘एक राष्ट्र, एक सत्ता, एक राजनीतिक इच्छा’ को लोकतंत्र का नया आदर्श बना दिया जाएगा तो संविधान की संघीय आत्मा निश्चित ही संकट में पड़ जाएगी।
(वरिष्ठ पत्रकार-लेखक विजयशंकर चतुर्वेदी सामाजिक मुद्दों और भू-राजनीतिक मामलों पर नियमित लेखन करते हैं। कविता-संग्रह ‘पृथ्वी के लिए तो रुको’ प्रकाशित।)
