अनिल तिवारी
मुंबई
उत्तरार्ध
एक महत्वपूर्ण पहल यह भी हो सकती है कि स्कूलों में ‘जूनियर ट्रैफिक वॉलंटियर’ कार्यक्रम शुरू किया जाए। बच्चे स्कूल परिसर के भीतर अनुशासन, बस कतार, हेलमेट जागरूकता, सीटबेल्ट संदेश और नो-हॉर्न अभियान में भाग लें। जब बच्चे अपने माता-पिता से कहेंगे कि ‘पापा, सिग्नल मत तोड़िए’ या ‘मम्मी, हेलमेट पहनिए’, तो उसका असर किसी चालान से ज्यादा गहरा हो सकता है।
ट्रैफिक जाम और दुर्घटनाओं का मुख्य कारण सड़कों पर अनुशासन का अभाव है, जो हमारी सामाजिक सोच की उपज है। इस चुनौती से निपटने के लिए स्कूलों में ‘सड़क-संस्कार’ विकसित करने की आवश्यकता है। ट्रैफिक नियमों को केवल किताबी ज्ञान न मानकर, इसे प्राथमिक से उच्च माध्यमिक स्तर तक अनिवार्य नागरिक शिक्षा और जीवन कौशल के रूप में शामिल करना चाहिए। जब सड़क को व्यक्तिगत सुविधा के बजाय साझा जिम्मेदारी माना जाएगा, तभी एक सुरक्षित और सभ्य समाज का निर्माण संभव है।
मुंबई की ट्रैफिक समस्या का एक बड़ा कारण सड़क पर अनुशासन की कमी है। यह कमी अचानक पैदा नहीं हुई। यह उस सामाजिक सोच का परिणाम है, जिसमें सड़क को सार्वजनिक अनुशासन का क्षेत्र मानने के बजाय व्यक्तिगत सुविधा का माध्यम मान लिया गया है। हमें लगता है कि जहां जगह मिली, वहां वाहन घुसा दो; जहां खाली दिखा, वहां पार्क कर दो; जहां जल्दी हो, वहां नियम तोड़ दो; जहां सिग्नल लाल हो, वहां भी यदि पुलिस न दिखे तो निकल जाओ। यही सोच बड़े होकर चालक बनती है और फिर शहर का ट्रैफिक कल्चर बिगाड़ती है।
सिलेबस में ट्रैफिक शिक्षा मॉडल
इसीलिए अब स्कूलों में ट्रैफिक नियमों का पाठ अनिवार्य किया जाना चाहिए। जिस तरह बच्चों को नागरिक शास्त्र पढ़ाया जाता है, संविधान, अधिकार, कर्तव्य, स्वच्छता और पर्यावरण के बारे में बताया जाता है, उसी तरह सड़क उपयोग, यातायात नियम, सार्वजनिक परिवहन अनुशासन और पैदल यात्री सुरक्षा को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। आधुनिक जीवन में सड़क और यातायात उतने ही जरूरी हैं, जितना भाषा, गणित या नागरिकता का बोध। आज का बच्चा कल का पैदल यात्री, साइकिल चालक, दोपहिया चालक, कार चालक, यात्री, अभिभावक और नागरिक बनेगा। यदि उसे बचपन से यह समझाया जाए कि सड़क केवल उसकी नहीं, सबकी है तो वह भविष्य में नियमों का सम्मान करेगा।
ट्रैफिक शिक्षा का उद्देश्य केवल यह बताना नहीं होना चाहिए कि लाल बत्ती पर रुकना है और हरी बत्ती पर चलना है। उद्देश्य यह होना चाहिए कि बच्चा सड़क को साझा जिम्मेदारी के रूप में समझे। स्कूलों में ट्रैफिक शिक्षा को तीन स्तरों पर लागू किया जा सकता है।
पहला स्तर: प्राथमिक कक्षाओं के लिए हो, जिसमें बच्चों को सड़क पार करने, जेब्रा क्रॉसिंग, फुटपाथ, स्कूल बस अनुशासन, हेलमेट, सीटबेल्ट और ट्रैफिक लाइट के मूल अर्थ सिखाए जाएं। बच्चों को खेल, चित्र, कहानी और छोटे नाटक के माध्यम से बताया जाए कि सड़क पर जल्दबाजी क्यों खतरनाक है।
दूसरा स्तर: माध्यमिक कक्षाओं के लिए हो। इसमें लेन अनुशासन, पैदल यात्री अधिकार, साइकिल सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन में व्यवहार, आपातकालीन वाहन को रास्ता देना, ध्वनि प्रदूषण, मोबाइल फोन का खतरा, ईयरफोन लगाकर सड़क पर चलने की जोखिम और दुर्घटना के समय मदद वैâसे करें, ये विषय शामिल हों। बच्चों को यह भी बताया जाए कि दुर्घटना देखने पर तमाशबीन न बनें, बल्कि सुरक्षित मदद, हेल्पलाइन और प्राथमिक सूचना देने की जिम्मेदारी निभाएं।
तीसरा स्तर: उच्च माध्यमिक कक्षाओं के लिए हो। यहां बच्चों को ड्राइविंग लाइसेंस की तैयारी से पहले सड़क कानून, मोटर वाहन नियम, बीमा, पीयूसी, वाहन फिटनेस, ओवरस्पीडिंग, ड्रंक ड्राइविंग, रफ ड्राइविंग, हिट एंड रन कानून, आपातकालीन प्रतिक्रिया और डिजिटल चालान प्रणाली की जानकारी दी जाए। १६ से १८ वर्ष के छात्रों के लिए प्री-ड्राइविंग अवेयरनेस मॉड्यूल अनिवार्य होना चाहिए। लाइसेंस के लिए आवेदन करने से पहले इस मॉड्यूल का प्रमाणपत्र जरूरी किया जा सकता है।
स्थानीय चुनौतियां और व्यावहारिक प्रशिक्षण
मुंबई जैसे शहरों में स्कूल ट्रैफिक शिक्षा को स्थानीय परिस्थितियों से जोड़ा जाना चाहिए। बच्चों को बताया जाए कि ऑटो-रिक्शा का अचानक लेन बदलना क्यों खतरनाक है, दोपहिया का फुटपाथ पर चढ़ना पैदल यात्रियों के लिए कितना जोखिमपूर्ण है, बस स्टॉप पर अनुशासन क्यों जरूरी है, स्कूल के बाहर अभिभावकों की गलत पार्विंâग वैâसे दूसरों के बच्चों की सुरक्षा खतरे में डालती है और हॉर्न बजाना समस्या का समाधान नहीं है। हर स्कूल में वर्ष में कम से कम दो बार ट्रैफिक जागरूकता सप्ताह आयोजित होना चाहिए। ट्रैफिक पुलिस, आरटीओ अधिकारी, एंबुलेंस सेवा, फायरब्रिगेड और सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों को बुलाकर बच्चों से संवाद कराया जाए। बच्चों को केवल भाषण न दिए जाएं, बल्कि सड़क सुरक्षा सिम्यूलेशन, मॉडल जंक्शन, मिनी ट्रैफिक पार्क और प्रेक्टिकल डेमो दिखाए जाएं। कई शहरों में बच्चों के लिए ट्रै्रफिक पार्क बनाए गए हैं। मुंबई में एेसे पार्कों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।
अभिभावकों और ‘जूनियर ट्रैफिक वॉलंटियर’
स्कूल बसों को भी इस शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। स्कूल बस ड्राइवरों और अटेंडेंट्स की ट्रेनिंग अनिवार्य हो। बस बच्चों को ठीक बस स्टॉप पर उतारे, सड़क के बीच नहीं। बच्चे बस से उतरकर पीछे से सड़क पार न करें, यह उन्हें सिखाया जाए। अभिभावकों को भी स्कूल गेट के बाहर डबल पार्विंâग न करने, बच्चों को सड़क की विपरीत दिशा में न उतारने और स्कूल जोन में धीमी गति रखने के लिए जिम्मेदार बनाया जाए।
ट्रैफिक शिक्षा को परीक्षा का बोझ नहीं, जीवन कौशल का विषय बनाया जाए। इसमें छोटे प्रोजेक्ट हो सकते हैं, अपने घर से स्कूल तक सुरक्षित मार्ग का नक्शा बनाना, गलत पार्विंâग के प्रभाव पर रिपोर्ट बनाना, हेलमेट उपयोग पर सर्वे करना, अपने मोहल्ले की जेब्रा क्रॉसिंग की स्थिति पर प्रस्तुति देना या सड़क सुरक्षा पर पोस्टर बनाना। इससे बच्चे अपने आसपास की सड़क को समझेंगे और जिम्मेदार नागरिक बनेंगे। इसमें एक महत्वपूर्ण पहल यह भी हो सकती है कि स्कूलों में ‘जूनियर ट्रैफिक वॉलंटियर’ कार्यक्रम शुरू किया जाए। बच्चे स्कूल परिसर के भीतर अनुशासन, बस कतार, हेलमेट जागरूकता, सीटबेल्ट संदेश और नो-हॉर्न अभियान में भाग लें। जब बच्चे अपने माता-पिता से कहेंगे कि ‘पापा, सिग्नल मत तोड़िए’ या ‘मम्मी, हेलमेट पहनिए’, तो उसका असर किसी चालान से ज्यादा गहरा हो सकता है।
संस्कार से सुरक्षित भविष्य
आज पाठ्यक्रम में कई ऐसे विषय शामिल हैं जिनका व्यावहारिक जीवन से सीमित संबंध है। इसके विपरीत ट्रैफिक शिक्षा हर दिन उपयोग में आनेवाला ज्ञान है। यह बच्चों की सुरक्षा, परिवार की सुरक्षा और शहर की व्यवस्था से जुड़ा हुआ विषय है। इसे ‘अतिरिक्त गतिविधि’ नहीं, बल्कि अनिवार्य नागरिक शिक्षा माना जाना चाहिए। मुंबई को यदि भविष्य में बेहतर ट्रैफिक कल्चर चाहिए, तो शुरुआत पुलिस चौकी से नहीं, स्कूल कक्षा से करनी होगी। सड़क पर अनुशासन केवल जुर्माने से नहीं आता; वह संस्कार से आता है। जो बच्चा बचपन से सड़क की मर्यादा सीखेगा, वही बड़ा होकर जिम्मेदार चालक बनेगा। इसलिए समय आ गया है कि स्कूलों में ट्रैफिक नियमों का पाठ पढ़ाया जाए क्योंकि सड़क-संस्कार बचपन में बोया गया वह बीज है, जो भविष्य में सुरक्षित, अनुशासित और सभ्य शहर का वृक्ष बन सकता है।
दंड से नहीं, संस्कार से सुधरेगा ट्रैफिक
बेहतर ट्रैफिक कल्चर के लिए शुरुआत पुलिस चौकी के जुर्माने से नहीं, बल्कि स्कूल की कक्षा में बोए गए संस्कारों से होनी चाहिए।
