कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिपुलेख मार्ग को लेकर नेपाल की आपत्ति पर भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि यह कोई नई व्यवस्था नहीं है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, वैâलाश मानसरोवर यात्रा १९५४ से इसी मार्ग से संचालित होती रही है इसलिए इसे अचानक किया गया बदलाव या किसी नए समझौते का परिणाम बताना सही नहीं है। भारत ने नेपाल के दावों को ‘एकतरफा और कृत्रिम विस्तार’ बताते हुए कहा है कि ऐसे दावे ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित नहीं हैं।
दरअसल, नेपाल ने लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को अपने क्षेत्र का हिस्सा बताते हुए भारत-चीन के बीच वैâलाश मानसरोवर यात्रा की व्यवस्था पर आपत्ति जताई है। नेपाल का तर्क है कि यह क्षेत्र सुगौली संधि के आधार पर उसका है, जबकि भारत लंबे समय से इस दावे को अस्वीकार करता आया है। ताजा विवाद इसलिए उठा क्योंकि २०२६ की वैâलाश मानसरोवर यात्रा जून से अगस्त के बीच दो मार्गों, सिक्किम के नाथू ला और उत्तराखंड के लिपुलेख से संचालित करने की घोषणा की गई है।
भारत का रुख यह है कि सीमा सहित सभी लंबित मुद्दों पर बातचीत के लिए वह तैयार है, लेकिन सार्वजनिक बयानबाजी या एकतरफा नक्शों के आधार पर क्षेत्रीय दावा स्वीकार्य नहीं हो सकता। विदेश मंत्रालय ने संकेत दिया है कि यदि नेपाल को कोई आपत्ति है, तो उसका समाधान कूटनीतिक संवाद के माध्यम से ही निकलेगा। यह विवाद केवल तीर्थयात्रा का नहीं, बल्कि भारत-नेपाल संबंधों में भरोसे, सीमा-निर्धारण और क्षेत्रीय संवेदनशीलता का प्रश्न बन चुका है इसलिए दोनों देशों के लिए सबसे उचित रास्ता टकराव नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण बातचीत है।
