नासिक के श्री कालाराम मंदिर पर धर्मध्वजा फहराने का उत्सव बुधवार को मनाया गया। यह उत्सव धर्म का कम और भाजपा का राजनीतिक उत्सव अधिक प्रतीत हुआ। जिन्हें श्री कालाराम मंदिर की सीढ़ियों के संघर्ष और सामाजिक लड़ाई का इतिहास ज्ञात है, उन्हें यह बात निश्चित रूप से खटकेगी। इसलिए धर्मध्वजा समारोह को एकपक्षीय होते देख समाज के अनेक घटकों को निश्चित ही वेदना हुई होगी। कालाराम मंदिर संघर्ष भारतीय सामाजिक इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और भावनात्मक अध्याय है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के नेतृत्व में २ मार्च १९३० को नासिक के पंचवटी स्थित कालाराम मंदिर में प्रारंभ हुआ ‘मंदिर प्रवेश सत्याग्रह’ ऐतिहासिक है। यह मात्र मंदिर में प्रवेश पाने की लड़ाई नहीं थी, बल्कि अस्पृश्यता, जाति व्यवस्था और सामाजिक विषमता के विरुद्ध एक व्यापक संघर्ष था। डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में हजारों दलित बंधु मंदिर के बाहर सत्याग्रह हेतु एकत्रित हुए थे। हिंदू मंदिर सभी जाति-धर्म के लोगों के लिए खुले होने चाहिए, यही इस लड़ाई का मुख्य उद्देश्य था, जो सफल हुआ। उस समय मंदिर पर हिंदुओं की राष्ट्रीय एकता की जो धर्मध्वजा फहरी, वह गौरव का विषय था; किंतु बुधवार को हिंदू एकता का यही अभिमान एकपक्षीय समारोह में परिवर्तित हो गया और ‘हिंदुओं के ठेकेदार हम ही हैं’ यह मानकर धर्मध्वजा फहराने का कार्यक्रम संपन्न किया गया। इस समारोह के लिए डॉ. आंबेडकर, महात्मा फुले और कोल्हापुर के शाहू महाराज के परिवारों की वर्तमान पीढ़ी को विशेष निमंत्रण देना आवश्यक था। भारतीय जनता पार्टी को जिन्होंने शुद्ध हिंदुत्व के प्राथमिक पाठ पढ़ाए और महाराष्ट्र सहित पूरे देश में
हिंदू जागृत किया
उन हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे की आज की पीढ़ी को भी इस धर्मध्वजा समारोह में आमंत्रित नहीं किया गया। यदि कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं को बुलाया जाता, तो यह धर्मध्वजा और भी तेजस्वी होती; परंतु भारतीय जनता पार्टी ने पूर्व राष्ट्रपति कोविंद, मुख्यमंत्री फडणवीस, मंत्री महाजन और अन्य ‘वैâबिनेट’ मंत्रियों की उपस्थिति में ही इसे फहराया। अगले वर्ष नासिक में सिंहस्थ कुंभ मेला आयोजित होनेवाला है, उसी के उपलक्ष्य में मंदिर पर नवीन ध्वज फहराने का यह कार्यक्रम आयोजित किया गया। कालाराम मंदिर सकल हिंदू श्रद्धा का केंद्र है। रामायण काल से संबंधित यह मंदिर १७वीं शताब्दी में स्थापित हुआ था। विठू माऊली के समान ही मंदिर में श्रीराम की प्रतिमा श्याम वर्ण (काली) है, जिससे यह राम और भी आकर्षक, तेजस्वी और ‘अपने’ प्रतीत होते हैं। इस ‘अपने’ राम को यदि कोई ‘भाजपा’ का राम बनाने का प्रयास करेगा तो कालाराम मंदिर के सम्मुख भक्तों को पुन: सत्याग्रह करना होगा। बुधवार को फहराई गई भव्य धर्मध्वजा पर हनुमान जी की प्रतिमा और सूर्य देवता का ‘ॐ’ अंकित है और यह धर्मध्वजा सभी को प्रेरणा देने का कार्य करती रहेगी। अयोध्या के श्रीराम मंदिर पर भी गत वर्ष धर्मध्वजा फहराई गई थी, जिस पर वृक्ष का चिह्न अंकित है; परंतु उस धर्मध्वजा का भी कोई सम्मान नहीं रखा गया। देशभर में अंधाधुंध जंगल और वृक्षों की कटाई जारी है। सरकार के उद्योगपति मित्रों को वनों में खनिज संपदा प्राप्त हो सके, इसके लिए धर्मध्वजा पर अंकित उन्हीं वृक्षों की निरंतर बलि दी जा रही है। हिंदू परंपरा में धर्मध्वजा निश्चित रूप से धर्म का प्रतीक है, किंतु यह त्याग, शौर्य और प्रजा की रक्षा का भी प्रतीक है। आक्रांताओं के विरुद्ध इसी ध्वजा ने लड़ने की प्रेरणा दी थी। औरंगजेब के शासनकाल में मंदिर तोड़े गए, परंतु हिंदुओं की धर्मध्वजा को कोई आक्रांता झुका नहीं सका। अत: ‘हम ही हिंदुओं के
एकमात्र तारणहार
और धर्मध्वजा के मालिक हैं’, इस भ्रम में कोई न रहे। महाराष्ट्र जैसे राज्य आध्यात्मिक और धार्मिक होने के साथ-साथ प्रगतिशील विचारों की ‘ध्वजा’ लेकर देश का मार्गदर्शन करते रहे हैं। अब धर्म-अध्यात्म के लिए मंत्रियों और सत्ताधारी दल ने खरात बाबा जैसे लोगों को खड़ा किया और जब वे नियंत्रण से बाहर हुए तब उन पर कार्रवाई की गई। जब महाराष्ट्र में धर्मध्वजा फहराई जा रही है, उसी समय किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और पूरे राज्य में ‘नारी’ जाति पर अत्याचार हो रहे हैं। धर्मध्वजा फहरते समय मासूम बच्चियों के साथ दुष्कर्म और हत्याएं हो रही हैं, जो उस धर्मध्वजा को कदापि स्वीकार्य नहीं है। नासिक एक अत्यंत पवित्र नगर है, जहां गोदावरी प्रवाहित होती है और जिसके तट पर सिंहस्थ कुंभ का आयोजन होगा। कुंभ मेले के लिए सरकार ने ३५ हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया है, परंतु यह विशाल धनराशि वास्तव में कुंभ के पवित्र कार्यों पर व्यय होगी या इसका बड़ा हिस्सा गुजरात के ठेकेदारों की जेब में जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं दे सकता। देश में पिछले कुछ वर्षों में धर्म के नाम पर भ्रष्टाचार व्याप्त है और भाजपा ऐसे भ्रष्टाचारियों का ‘मेला’ बन गई है। वे ही कुंभ मेला मनाएं और वे ही कालाराम मंदिर पर धर्मध्वजा फहराएं, इसे हिंदू समाज का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। धर्मध्वजा संयम, शौर्य और त्याग का प्रतीक है, परंतु वर्तमान में राज्य में द्वेष, स्वार्थ और कपट की राजनीति व्याप्त है। नासिव्ाâ की धर्मध्वजा के नीचे मात्र ‘एक दल’ एकत्र हुआ, जिसमें राष्ट्र नहीं था, महाराष्ट्र नहीं था और न ही सकल हिंदू समाज था। उसमें फुले, आंबेडकर और शाहू तो नहीं ही थे।। फिर भी, कालाराम मंदिर पर फहरी उस धर्मध्वजा को हमारी सादर मानवंदना।
