मुख्यपृष्ठस्तंभखटारा गाड़ी बनाम हवाई सपने!

खटारा गाड़ी बनाम हवाई सपने!

लब्बोलुआब यह कि गाड़ी को `खटारा’ से `हाई-स्पीड ट्रेन’ बनाने के लिए केवल नई घोषणाओं वाले चमचमाते पेंट की जरूरत नहीं है, बल्कि उन पुरानी पटरियों को उखाड़कर नए डेटा स्टैंडर्ड्स बिछाने होंगे।

हमारी व्यवस्था का विरोधाभास देखिए एक तरफ हम `डिजिटल महाशक्ति’ बनने का ढोल पीट रहे हैं, और दूसरी तरफ हमारा डेटा सिस्टम अभी भी फाइलों के ढेर में दम तोड़ रहा है। इसे डेटा का बिखराव कहें या प्रशासनिक आलस, हकीकत यही है कि एक ही नागरिक की जानकारी दस अलग-अलग मंत्रालयों में दस अलग रूपों में दर्ज है।
इस अव्यवस्था का सबसे बड़ा प्रभाव है सिस्टम में होने वाली लीकेज और संसाधनों की बर्बादी। जब तक फर्जी लाभार्थियों की फौज आंकड़ों में जिंदा रहेगी, तब तक विकास का पैसा `सिस्टम’ की भूख ही मिटाता रहेगा। सही जमीनी आंकड़ों के बिना नीतियां बनाना वैसा ही है जैसे आंखों पर पट्टी बांधकर रेगिस्तान में रास्ता खोजना। इसे ही कहते हैं अंधेरे में तीर चलाना। लक्ष्य तो बड़ा है, पर कमान ही टूटी हुई है।
अब सवाल उठता है कि क्या वाकई बदलाव मुमकिन है? अगर हम वाकई चाहते हैं कि यह `हवाई सपना’ जमीन पर उतरे, तो हमें डेटा को बुनियादी ढांचे की तरह देखना होगा। अगर डेटा साफ और सटीक हो जाए, तो सटीक लक्ष्यीकरण के जरिए सब्सिडी सीधे असली हकदार की जेब में पहुंचेगी, वरना बिचौलियों का डिजिटल अवतार भी उतना ही घातक होगा। साथ ही, जब अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर हमारे आंकड़े पारदर्शी होंगे, तभी विदेशी निवेशकों का भरोसा जीतेगा।
लब्बोलुआब यह कि गाड़ी को `खटारा’ से `हाई-स्पीड ट्रेन’ बनाने के लिए केवल नई घोषणाओं वाले चमचमाते पेंट की जरूरत नहीं है, बल्कि उन पुरानी पटरियों को उखाड़कर नए डेटा स्टैंडर्ड्स बिछाने होंगे। वरना त्र्५ ट्रिलियन की यह चमक सिर्फ कागजों पर ही दिखेगी, आम आदमी की जेब में तो सिर्फ धूल ही आएगी। आईडीएमओ यानी इंडियन डाटा मैनेजमेंट ऑफिस को लेकर एक डर वाजिब है। क्योंकि हमारे देश में अक्सर समस्याओं का समाधान एक `नई कमेटी’ या `नया विभाग’ बना देना ही मान लिया जाता है। आईडीएमओ के साथ असली चुनौती यह नहीं है कि वह नियम वैâसे बनाता है, बल्कि यह है कि क्या वह पुराने कद्दावर मंत्रालयों की `डेटा छुपाने’ वाली सामंती सोच को बदल पाएगा? डेटा अक्सर `शक्ति’ का प्रतीक होता है और कोई भी विभाग अपनी शक्ति साझा नहीं करना चाहता। अगर आईडीएमओ केवल एक और `अड़ंगा’ डालने वाला विभाग बन गया, तो यह खटारा गाड़ी में एक और भारी पुर्जा जोड़ने जैसा होगा। लेकिन, अगर इसे तकनीकी स्वायत्तता मिली, तो शायद पटरियां सुधर जाएं। हम रॉकेट इंजन (एआई) तो खरीद रहे हैं, लेकिन उसे बैलगाड़ी के पहियों (पुराना डेटा सिस्टम) पर कसने की कोशिश कर रहे हैं।

अन्य समाचार