मुख्यपृष्ठस्तंभप्रणवाक्षर : आगे कैसी है विपक्ष की राह

प्रणवाक्षर : आगे कैसी है विपक्ष की राह

प्रणव प्रियदर्शी

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की अपमानजनक हार और बीजेपी की बंपर जीत ने एक बात शीशे की तरह साफ कर दी है कि अब किसी भी अहम चुनावी लड़ाई में बीजेपी को पराजित करना विपक्ष के लिए लगभग नामुमकिन हो चला है। चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका तो संदेह के घेरे में है ही, एजेंसियों का दुरुपयोग और मुख्यधारा मीडिया का मनचाहा इस्तेमाल हालात को और बदतर बनाते हैं। यहां तक कि न्यायपालिका का रुख भी कोई उम्मीद नहीं जगाता।
हारी हुई लड़ाई
ऐसे में स्वाभाविक ही विपक्षी दलों से पूछा जा रहा है कि जब उन्हें पता है कि चुनाव धांधली के बल पर जीते जा रहे हैं तो वे जानते-बूझते हुए यह हारी हुई लड़ाई बार-बार क्यों लड़ रहे हैं? क्यों वे हर चुनाव से पहले ताल ठोकते हैं, चुनाव-प्रचार के दौरान जीत के बड़े-बड़े दावे करते हैं और फिर मुंहकी खाने के बाद बेईमानी का रोना रोते हुए दिखते हैं? इससे उनकी अपनी गरिमा तो कम होती ही है, एक बेईमानी भरी चुनावी प्रक्रिया को हर बार नए सिरे से मान्यता भी मिल जाती है।
विपक्ष की हिचक
मगर विपक्षी पार्टियां हैं कि चुनाव प्रक्रिया को भरपूर कोसते हुए भी इस ‘एक्स्ट्रीम स्टेप’ की ओर बढ़ना टाल देती हैं। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी, जो चुनाव चोरी के आरोप लगाने में सबसे आगे रही है, बहिष्कार का आह्वान करने से बच रही है। आखिर इस हिचक का क्या कारण है? गौर करें तो इसकी कई ठोस वजहें दिखती हैं।
दलों की प्रकृति
अव्वल तो इन दलों का चरित्र ही ऐसा है जो इन्हें सत्ता से पूरी तरह विमुख होने से रोकता है। ये दल सत्ता के साथ सौदेबाजी कर सकते हैं, उसमें ज्यादा हिस्सा पाने के लिए कुछ हद तक रूठना-धमकाना भी कर सकते हैं, लेकिन सत्ता से स्थायी विरोध नहीं पाल सकते। यहां तक कि आजादी की लंबी लड़ाई का प्रतिनिधित्व करनेवाली कांग्रेस भी अपनी प्रकृति में एंटी-इस्टैब्लिशमेंट नहीं रही है। अंग्रेजी शासन का विरोध करते हुए भी यह कभी अंग्रेजों से पूरी तरह विमुख नहीं हुई। इसने उस शासन से भी संवाद और तालमेल बनाए रखा। ऐसे में इस बात की संभावना कम है कि ये दल चुनाव व्यवस्था से पूरी तरह बाहर हो जाना चाहेंगे।
सरकार की मंशा
मौजूदा मोदी सरकार की प्राथमिकता और उसकी रणनीति के हिसाब से देखा जाए तो चुनाव बहिष्कार जैसा कदम उसे खुश ही करेगा। सरकार तो चाहती है कि कांग्रेस जैसे इसके धुर विरोधी दल चुनाव व्यवस्था से बाहर हो जाएं। कांग्रेसमुक्त भारत के नरेंद्र मोदी के आह्वान में इस इच्छा की साफ झलक देखी जा सकती है।
अपनी डफली अपना राग
वैसे भी फिलहाल यह एक्स्ट्रीम स्टेप देशवासियों के बड़े हिस्से को कन्फ्यूज ही करेगा। लोग इस आरोप की गंभीरता और सचाई से वाकिफ नहीं हैं। मतदाताओं को तो छोड़िए विपक्षी दायरे की सभी पार्टियां भी इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुई हैं। अभी हाल तक जब कांग्रेस महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में चुनावी धांधली का सवाल उठाती थी तो उमर अब्दुल्ला और अरविंद केजरीवाल जैसे नेता यह कहते नजर आते थे कि हममें हार स्वीकार करने का धैर्य और साहस होना चाहिए। टीएमसी को भी अभी तक लगता था कि स्थानीय स्तर पर जनता और कार्यकर्ताओं के दबाव के जरिए इस तंत्र को सही आचरण के लिए मजबूर किया जा सकता है।
सदन में विपक्ष
ध्यान रहे, किसी तंत्र को सुधारने के लिए व्यवस्था के बाहर से ही नहीं, उसके भीतर से भी दबाव डालने की जरूरत होती है। विपक्ष संसद में शोर मचाकर, कठिन सवाल उठाकर, तीखी आलोचना कर भी सरकार पर पर्याप्त दबाव डालता है। संसदीय समितियों में भी विपक्षी सदस्यों की अहम भूमिका होती है। संसद में विपक्ष की दमदार मौजूदगी का नौकरशाही के रवैये पर भी असर पड़ता है। सरकार की गलत नीतियों का विरोध कर रहे अफसर खुलकर बयानबाजी भले न करें, विपक्षी सांसदों का मजबूत रुख उन्हें भी मजबूती देता है।
हर मोर्चे पर चुनौती
आज की जरूरत यह है कि पक्षपातपूर्ण चुनावी प्रक्रिया को हर मोर्चे पर चुनौती दी जाए। संसद और सड़क पर तो लोकतंत्र विरोधी तत्वों का शांतिपूर्ण मगर खुला विरोध हो ही, सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के अंदर भी नेतृत्व की गलत नीतियों का विरोध कर रहे तत्वों को पहचाना जाए, उनके साथ तालमेल बनाया जाए, उन्हें ताकत दी जाए और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना की मुहिम में उनका सहयोग लिया जाए। यह नहीं कि जो स्पेस मिला हुआ है, वह भी सत्ता पक्ष के हवाले करके वहां से पीछे हट जाया जाए।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

 

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